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किसान उवाच / कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में कई खामियां, नुकसान हुआ तो कौन जिम्मेदार?

  • शिवम बघेल। लेखक किसान हैं और वो सिवनी (मध्यप्रदेश) में रहते हैं।

पिछले दो आलेख में आपने पढ़ा कि किस तरह केंद्र सरकार द्वारा कोरोना वैश्विक महामाही के बीच, केंद्र सरकार हाल ही में कृषि अध्यादेश में किसानों का कम, व्यापारियों का फायदा ज्यादा है। आखिरी आलेख में जानेंगे कि किस तरह कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देकर सरकार किसानों को सिर्फ मजदूर बना देना चाहती है।

तीसरा अध्यादेश : फार्मर्स एग्रीमेन्ट ऑन प्राइस इंश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेस ऑर्डिनेन्स

सरकार अब कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देगी। तीसरा अध्यादेश में यह बात विस्तार से बताई गई है, जिसमें बड़ी-बड़ी कम्पनियां खेती करेंगी और किसान उसमें सिर्फ मजदूरी करेंगे। इस अध्यादेश के जरिए किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के रह जाएगा। इस अध्यादेश के जरिए केंद्र सरकार कृषि का पश्चिमी मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है।

हालांकि यह मॉडल हमारे देश में कोई नया नहीं है, देश में पहले से भी कांट्रेक्ट फार्मिंग किसानों से करवाई जा रही है। मध्यप्रदेश में टमाटर और शिमला मिर्च की, महाराष्ट्र में फूलों और अनार की खेती, कर्नाटक में काजू की खेती, उत्तराखंड में औषधियों की खेती इसके उदाहरण है। जो किसानों के लिहाज से ज्यादा फायदेमंद नहीं हैं।

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पुराने मॉडल को ही फिर भी इतने हो-हल्ला के साथ बढ़ावा दिया जा रहा है कि इससे किसानों की पूरी तस्वीर और तकदीर बदल जाएगी, लेकिन सरकार यह बात भूल जाती है कि हमारे किसानों की तुलना विदेशी किसानों से नहीं हो सकती क्योंकि हमारे यहां भूमि-जनसंख्या अनुपात पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है और हमारे यहां खेती-किसानी जीवनयापन करने का साधन है वहीं पश्चिमी देशों में यह व्यवसाय है। अनुभव बताते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों का शोषण होता है।

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पिछले साल गुजरात में पेप्सिको कम्पनी ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था जिसे बाद में किसान संगठनों के विरोध के चलते कंपनी ने वापस ले लिया था। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत फसलों की बुआई से पहले कंपनियां किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं लेकिन बाद में जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कम्पनियां किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं और बाद में किसानों के उत्पाद को खराब बता कर रिजेक्ट कर दिया जाता है।

इस एक्ट में यह ग्यारंटी नहीं है कि किसान का माल कंपनी पूरा खरीदेगी। फिर इसमें सवाल यही उठता है कि किसान मेहनत से 100 केला उगाएगा और कंपनी उसके 25 केले को खराब या छोटा बताकर रिजेक्ट कर देगी तो वह किसान कहां बेचेगा?

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