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अयोध्या / श्रीरामजन्म भूमि पर ‘मंदिर’ का निर्माण इसलिए है जरूरी

  • क्षितिज पाण्डेय, लेखक लखनऊ में रहते हैं, वह स्वतंत्र पत्रकार हैं।

रघुकुल शिरोमणि मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम का दिव्य-भव्य मंदिर अयोध्या में बनेगा। देश की सर्वोच्च अदालत के इस निर्णय ने रामभक्तों को आह्लाद से परिपूर्ण कर दिया है। लगभग पांच सदी से यह प्रकरण भारत की अन्तरात्मा में एक घाव सरीखा था। एक ऐसे राष्ट्र में जहां कोटि-कोटि हृदयों में प्रभु श्री राम का भव्य मंदिर देखने की अभिलाषा हो, वहां अधीरता होनी स्वाभाविक ही है, किंतु प्रभु श्री राम का आदर्श हमें शिक्षा देता है कि अधीरता का अर्थ विवेकहीन होना नहीं है।

हमारा राष्ट्र बंधुत्व और सह-अस्तित्व के जिन स्तम्भों पर खड़ा है उनमें भेदभाव रहित, ऊंच-नीच की भावना से परे, जाति-पांति के बंधन से मुक्त सामाजिक समरसता का आदर्श प्रमुख तत्व है। प्रभु श्री राम का आचरण हमें सामाजिक सौहार्द और समरसता के सिद्धान्त की अनुपालना को प्रेरित करता है। प्रभु श्री राम सच्चे अर्थों में सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं। अयोध्या प्रकरण सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद देश ने इसी भावना को प्रस्तुत किया है।

सामाजिक समरसता के मानक प्रभु श्री राम

श्री राम जन्मभूमि प्रकरण के सर्वमान्य और शांतिपूर्ण निस्तारण पर आज बरबस ही पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की छवि स्मृति-पटल पर कौंधती है। पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज के लिए प्रभु श्री राम नायक थे, आदर्श थे, पथ-प्रदर्शक थे। वंचित, पीड़ित और दलित जन की पीड़ा की समानुभूति करते हुये, उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने जो प्रयास किये वह निश्चित ही प्रभु श्री राम के चरित्र की प्रेरणा थी।

प्रभु श्री राम पूरे प्रेम से भीलनी शबरी के जूठे बेर खाते हैं, निषादराज गुह्य को अपना सखा मानकर गले लगाते हैं, गिद्धराज जटायु के उद्धारक और वनवासी हनुमान को भरत समान प्रिय कहते हैं, ऐसे प्रभु श्री राम हमारे आदर्श हैं।

शिवावतारी महायोगी गुरु गोरक्षनाथ जी के आशीर्वाद और ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के मार्गदर्शन से पुष्पित-पल्लवित हो रहा नाथ-पंथ का मूल चरित सामाजिक समरसता का है। मंदिर आंदोलन की अगुआई करने वालों के शीर्षस्थ लोगों में शामिल पूज्य  ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज अपने हर प्रवचन में प्रभु श्री राम के इस उदात्त चरित्र के जरिये समाज को सामाजिक समरसता का संदेश देते रहे। अयोध्या में जब उनकी मौजूदगी में प्रतीकात्मक रूप से भूमि पूजन हुआ तो उनकी पहल पर पहली शिला रखने का अवसर 35 वर्षीय श्री कामेश्वर चौपाल जी को मिला।

एक हरिजन से ऐसा करवाकर उन्होंने पूरे समाज को सामाजिक समरसता का संदेश दिया। भूमि पूजन की खोदाई के लिए पहला फावड़ा खुद पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने चलाया था। भूमि पूजन कराया था स्वामी श्री वामदेव जी ने और वास्तु पूजा का काम पंडित श्री महादेव भट्ट जी और पंडित श्री अयोध्या प्रसाद जी ने संपन्न कराया था।

वास्तव में यह एक प्रयास था समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाने का। प्रभु श्री राम से प्रेरित होकर ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के आशीर्वाद से आजीवन सामाजिक सद्भाव, समरसता, बंधुत्व और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की स्थापना के लिए समर्पित भाव से प्रयास किया। पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज सामाजिक समरसता के प्रश्न पर सदैव स्पष्टवादी रहे।

उन्होंने इस प्रश्न पर धर्माचार्यों, संत-महात्माओं, राजनीतिज्ञों, किसी को भी क्षमा नहीं किया, यदि वे हिन्दू समाज की एकता के विरुद्ध अथवा अस्पृश्यता के पक्ष में खड़े हुए। पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज एकबार अपने प्रिय एवं पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द जी सरस्वती के खिलाफ भी तब तनकर खड़े हो गये जब उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित समारोह में एक विदुषी महिला को वेदपाठ करने पर रोक दिया।

पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह कृत्य कहीं से भी न तो न्यायसंगत है और न ही धर्मानुसार उचित है। यह कृत्य महिला समाज का अपमान करता ही है इससे हिन्दुत्व भी लांछित होता है। कोई भी समझदार व्यक्ति ऐसे कृत्य का समर्थन नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि आज जबकि जातिवाद, ऊंच-नीच, छूत-अछूत आदि विकृतियों को शह देकर हिन्दू समाज को बांटने एवं कमजोर करने का षड्यन्त्र चल रहा है, जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा महिलाओं के वेदपाठ पर आपत्ति न तो धर्मानुकूल है और न ही युगानुकूल।

पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने अपने जीवन का उत्तरार्द्ध पूर्णतः सामाजिक समरसता, हिन्दू समाज के पुनर्जागरण और श्री राम जन्मभूमि मुक्ति अभियान को समर्पित कर दिया। उन्होंने 1980 के बाद से ही हिन्दू समाज से अस्पृश्यता उन्मूलन एवं श्री राम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर निर्माण को अपने जीवन का मिशन बना लिया और जीवन के अन्त तक महाराज जी के बातचीत के केन्द्र बिन्दु यही दो मुद्दे रहे।

हिन्दू समाज में अस्पृश्यता एवं ऊंच-नीच जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ देश भर में जन-जागरण अभियान पर निकलकर गोरक्षपीठाधीश्वर पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने सर्वप्रथम धर्माचार्यों के बीच अपने-अपने मत-श्रेष्ठतावाद का खण्डन किया और भारत के लगभग सभी शैव-वैष्णव इत्यादि धर्माचार्यों को एक मंच पर खड़ा किया था। परिणामतः जब श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ-समिति का गठन हुआ तो 21 जुलाई, 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में सर्वसम्मति से महन्त जी को अध्यक्ष चुना गया।

तब से आजीवन श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज अध्यक्ष रहे और उनके नेतृत्व में भारत में ऐसे जनान्दोलन का उदय हुआ जिसने भारत में सामाजिक-राजनीतिक क्रान्ति का सूत्रपात किया। भारत सहित दुनिया के इतिहास में श्री राम जन्मभूमि आन्दोलन और उसके प्रभाव एवं परिणाम का अध्याय पूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज का उल्लेख हुए बिना अधूरा रहेगा।

आज का समय वह सौभाग्य का समय है जब कोटि-कोटि हृदयों की अभिलाषा ‘अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण’ का मार्ग प्रशस्त हो गया है। प्रभु श्रीराम के आशीर्वाद से यह सुसंयोग बना कि जब भी कभी श्री रामजन्मभूमि प्रकरण में कोई महत्वपूर्ण अवसर आया, श्री गोरखनाथ मंदिर उसमें प्रमुखता से सहभागी रहा। पूज्य ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने जिस यज्ञ को प्रारम्भ किया था और जिसे ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने जनक्रांति में परिवर्तित किया, आज वह अपनी पूर्णाहुति की ओर अग्रसर है।

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