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मुद्दा / सरकार की इस गलत नीति का आम आदमी को होता है सीधा नुकसान

प्रतीकात्मक चित्र ‘आम आदमी’।

भारत में शिक्षित बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि यदि केंद्र सरकार लाखों पद पर किसी विभाग में वेकेंसी निकाले तो फिर भी कई करोड़ शिक्षित युवा बेरोजगार ही रहेंगे। इसकी कई वजह हैं। सरकार और आला दर्जे के अधिकारी कहते हैं कि युवाओं में स्किल्स की कमी है, युवा कहते हैं देश में पढ़ाई उस स्तर की नहीं और उनके स्किल्स के मुताबिक काम नहीं मिलता है। कारण कई हैं। समाधान कम हैं, लेकिन बेरोजगारी है और बहुत ज्यादा है और यह बात केंद्र/राज्य सरकार जानती हैं। जमीनी स्तर पर क्या किया जा रहा है। यह जनता जानती है। यह वही जनता है, जिसने केंद्र सरकार को भारी मतों से जीत दिलाई, जिसका जिक्र हालही में पीएम नरेंद्र मोदी ने अमेरिका की एक महासभा में किया था।

रोजगार देना सरकार की उन नीतियों में शामिल है, जो बेहद जरूरी है। सरकार यदि इस नीति में विफल होती है तो इसका सीधा नुकसान आम आदमी को होता है, वो आम आदमी जो पहले अपने बच्चों को पढ़ाता है। पढ़ाने के बाद जब वो योग्य और शिक्षित हो जाते हैं, तो उन्हें नौकरी नहीं मिलती ‘बिजनेस का रिस्क’ हर युवा नहीं ले सकता। ऐसे में वो बच्चे शिक्षित बेरोजगार बनकर वो सभी काम करते हैं, जो वो नहीं जानते हुए भी कर रहे होते हैं, फिर मंत्री और आला अधिकारियों द्वारा कहा जाता है कि युवाओं में स्किल्स की कमी है। वो आम आदमी जो वोट देता है। सरकार चुनता है। जिंदगी भर अपनी पूंजी बनाने के लिए जद्दोजहद में काम और सिर्फ काम करता है। बच्चों को पढ़ाता है और जब उसके बच्चों को काम ही ना मिले तब यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

तो क्या सरकार की नीतियां बेहतर नहीं

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 2018 की बेरोजगारी दर 3.5 प्रतिशत थी। साल 2018 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.86 करोड़ थी। तो वहीं, 2019 में 1.89 करोड़ तक बढ़ जाने का अनुमान लगाया गया है। दुनिया के ऐसे कई देश हैं जहा बेरोजगारी आम समस्या बनती जा रही है भारत अव्वल है। यहां जनसंख्या ज्यादा है, केंद्र और राज्य सरकार की नीतियां बेहतर नहीं।

आलम यह है कि भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय देश की 11 फीसदी आबादी बेरोजगार है। यह वे लोग हैं जो काम करने लायक हैं, लेकिन उनके पास रोजगार नहीं हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के लगभग 12 करोड़ लोग बेराजगार हैं।

नेता ईमानदार होते हैं?

स्किल इंडिया बनाने के लिए दावे किए जा रहे हैं, हकीकत कुछ ओर है। अगस्त 2019 में अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर नरेंद्र मोदी की सरकार को बड़ा झटका लगा। जहां चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून तक भारत की आर्थिक विकास दर घटकर महज 5 प्रतिशत रह गई थी। बीते वित्तीय वर्ष की इसी तिमाही के दौरान विकास दर 8 प्रतिशत थी। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मौजूदा विकास दर पिछली 25 तिमाही में सबसे कम है। इससे पहले की तिमाही (जनवरी-मार्च) में विकास दर 5.8 प्रतिशत रही थी। इससे पहले, सबसे कम विकास दर वित्तीय वर्ष 2012-13 की अंतिम तिमाही (जनवरी-मार्च) में दर्ज की गई थी जो महज 4.3 प्रतिशत थी।

आर्थिक मामलों के जानकार कहते हैं कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की कमजोर नीतियों का परिणाम है कि भारत में बेरोजगारी का स्तर इतना बढ़ रहा है, जबकि इसे कम किया जा सकता था। आर्थिक मोर्चे पर कमजोर प्रदर्शन के पीछे, नोटबंदी और जीएसटी लागू करने जैसे फैसले के बारे में काफी चर्चा हो चुकी है और ये बड़े कारण है। क्योंकि कालधन बाजार से गया लेकिन फिर जहां था वहां पहुंच गया। दिलचस्प बात यह रही है कि जब नोटबंदी हुई तो कालाधन ऐसे बहुत कम नेता थे, जिनके घर से कुछ भी कालाधन नहीं निकला। यानी हम ये मान लें कि हमारे देश के नेता ईमानदार हैं? जो कभी हो ही नहीं सकते, ‘हां’ कुछ अपवाद हो सकते हैं।

अर्थव्यवस्था की हालत चिंताजनक

बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला कहते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे उद्यमों को ख़त्म कर दिया या फिर दबाव में डाल दिया है। वे कहते हैं, ‘नोटबंदी और जीएसटी की नीतियों का असर तत्काल दिखा, लेकिन जैसे बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है, वैसे ही इसने अर्थव्यवस्था को कमजोर करना शुरू कर दिया था।

हालही में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ही चिंताजनक है। सिंह ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार के चौतरफा कुप्रबंधन के कारण अर्थव्यवस्था में मंदी है। सरकार ने दो दिन पहले ही डेटा जारी किया था जिसमें अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछले छह सालों में सबसे निचले स्तर पर आ गई है।

1.76 लाख करोड़ रुपए का क्या हो रहा है?

केंद्र सरकार ने कुछ दिन पहले ही भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के केंद्रीय बोर्ड अपने रिज़र्व से मोदी सरकार को रिकॉर्ड 1.76 लाख करोड़ रुपए देने का ऐलान किया था। हो सकता है अभी तक मिल गए हों। यह पैसा देश को आर्थिक मुश्किलों से निकालने के लिए दिया गया है। इस मुसीबत के लिए काफी हद तक हम खुद जिम्मेदार हैं। इसका वैश्विक हालात से लेना-देना नहीं है। इस रकम से फिस्कल डेफिसिट (सरकार की आमदनी से अधिक खर्च) को काबू में रखने में मदद मिलेगी, जिसके लिए वित्त वर्ष 2019-20 में जीडीपी के 3.3 प्रतिशत का लक्ष्य तय किया गया है। यह कितनी कारगर होगी ये वक्त बताएगा।

इंटरव्यू में आम आदमी की नहीं, ‘आम’ की बात

भारत सरकार और राज्य सरकार ने संयुक्त रूप से पिछले 5 साल में ऐसे निर्णय लिए जिसके कारण बेरोजगारी घटने की वजह बढ़ती गई। फैसले सही थे, लेकिन उनका जमीनी स्तर पर लागू करने पर क्या नुकसान होंगे इस बारे में नीति निर्माताओं ने ध्यान देना भी मुनासिब नहीं समझा। जैसे कि भारत में स्कूली शिक्षकों को डीएड-बीएड करना जरूरी है जब वो किसी स्कूल में पढ़ा सकते हैं। सरकारी स्कूलों तक यह प्रक्रिया बेहतर है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों में भी यह नियम लागू कर दिया गया। अलग-अलग राज्यों में यह डिग्री किसी अन्य नाम की भी हो सकती है। इसको पूरा करने की प्रक्रिया सरल नहीं है और फीस ज्यादा है। आम आदमी फीस का खर्च नहीं उठा सकता। ऐसे में वो युवा जो शिक्षित हैं, वो स्कूल में पढ़ाकर भले ही कम सैलरी पर कार्य करें, लेकिन अपना खर्च उठा सकते थे। लेकिन प्राइवेट स्कूलों में डीएड-बीएड जरूरी होने पर वो भी बेरोजगार हैं।

प्राइवेट फर्म कम लोगों से ज्यादा काम करवाने में विश्वास रखते हैं। यहां सरकार का कोई दखल नहीं। कोई कानून नहीं। शोषण ज्यादा, पैसा कम। ऐसे अनगिनत कारण हैं, जो बेरोजगारी का कारण हैं। यह वो उदाहरण हैं जो आम हैं। इतने आम हैं कि प्रधानमंत्री जी का इंटरव्यू जब अक्षय कुमार लेते हैं तो पीएम मोदी सिर्फ आम की बात करते हैं। आम आदमी की क्या समस्याएं हैं वो सिर्फ चुनावी भाषणों में करते हैं, ताकि वो लोगों का मत, मतदान के समय पार्टी को जीत दिलाने के लिए कर सकें। यहां कई वायदे किए जातें हैं जो क्या वाकई में पूरे होते हैं। यह आप बेहतर से जानते हैं। 

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