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फानी / तबाही के बाद कुछ सवाल और वो तस्वीरें जो हैरान कर देंगी

  • रविकांत द्विवेदी

बीते दो-तीन दशकों में देश गवाह रहा है कि प्राकृतिक आपदाओं में लाखों लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी है और करोड़ों का नुकसान हुआ है। कुछ की भरपाई तो जैसे-तैसे करने की कोशिश की गई लेकिन कुछ की भरपाई शायद मरते दम तक शायद ना हो सके। देश के अलग-अलग हिस्सों में आए बाढ़, भूकंप, सुनामी, साइक्लोन और सूखे जैसी आपदाओं ने समय-समय पर अपनी मौजूदगी का अहसास बखूबी कराया है।

आपदा का नाम सुनते ही हमारे, आपके, सबके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। इन आपदाओं में लोगों की चीख पुकार, बर्बादी, रोना-धोना सबकुछ या तो इसमें भस्म हो जाता है या फिर मदद की उम्मीद में अपने आप को पुरानी स्थिति में देखने की आस बस आस बनकर ही रह जाती है। नज़ीर के तौर पर अगर आप चाहे सुनामी की बात करें, चमोली के भूकंप को लें या कोसी बाढ़ के तांडव को, केदारनाथ की तबाही को या फिर केरल के जलजले को देखें तो सभी आपदाओं में एक बात तो साफ है कि नुकसान जबर्दस्त हुआ है। कुछ नुकसान की तो ताउम्र भरपाई भी नहीं हो सकती, इसमें ना केवल जान-माल की बर्बादी हुई है बल्कि लोगों के यादों की चिताएं भी जली हैं।

दावे बहुत किए जाते हैं कि हालात सामान्य हो चले हैं और अब कोई दिक्कत नहीं उन प्रभावित इलाको में जबकि सच्चाई इससे काफी उलट होती है। दुख तब और होता है जब मीडिया में खबरें उलट पुलट आती हैं। कुछ मीडिया घरानों के लिए ये सब त्रासदी की खबरें मुख्य धारा की ख़बरों से बाहर होती है। वजह बहुत स्पष्ट होता है कि इन ख़बरों से शायद उनको वो टीआरपी ना मिले जो नंबर वन बनने की होड़ में शामिल करा सके या फिर इन ख़बरों से कोई फायदा (कमर्शियल) तो होगा नहीं फिर वो उसे क्यों लें, आम लोग मर रहें हैं तो मरें चीजें बर्बाद हो रही हैं तो हों।

जब लोग इस तबाही के बाद घर को लौटेंगे

अभी कुछ ही दिन पहले ओडिशा में साइक्लोन ने भयंकर तबाही मचाई लेकिन दुर्भाग्य है कि ये त्रासदी मीडिया की सुर्खियां नहीं बन सकीं। मीडिया के अपने तर्क हैं मसलन यहां लोगों की जाने नहीं गईं, लोगों को पहले ही वहां से सुरक्षित निकाल लिया गया, किसी की मौत नहीं हुई वगैरह वगैरह…

सोचने वाली बात है कि आपने पूरा गांव का गांव रेस्क्यू कर लिया लाखों जाने आपने बचा लीं, लेकिन जब लोग इस तबाही के बाद घर को लौटेंगे और उन्हें वहां उनका आशियाना नहीं मिलेगा तब वे क्या करेंगे? कैसे शुरुआत करेंगे? और पूरी तरह से उजड़ चुके घर को कैसे पहले जैसा खड़ा कैसे करेंगे? क्या उनका मकान एक दो महीने में बनकर तैयार हो जाएगा? क्या उनके पास घर बनाने और रोजमर्रा के लिए पर्याप्त पैसे हैं? क्या उन्हें खाने-पीने की कोई दिक्कत तो नहीं? ये सब सोचने का वक्त शायद किसी के पास नहीं। हमारे और आपके पास भी नहीं…

ये बात तो रही आदम जात की ज़रा बेजुबानो के बारे में सोचिए, इस साइक्लोन ने सैकड़ो की तादाद में घरेलू पशुओं की जीवनलीला खत्म की है। ये वो पशु हैं जिनसे गांव वालों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर जुड़ी होती है। इसकी क्या वजह मानेंगे, क्या वे अपनी दुर्दशा को बयां नहीं पा रहे हैं या उनकी ख़बरों से मीडिया को कोई फायदा नहीं हो रहा या अब चुनाव खत्म हो चुका है, सरकार बन चुकी है फिर काहे की चिंता… जो झेल रहा है वो झेले… कुछ ना कुछ तो है जो हमारी आपकी समझ से परे है।

नज़र जिधर दौड़ रही थी वहां तबाही का मंजर

आपदाओं की इसी कड़ी में ओडिशा साइक्लोन की ज़मीनी हकीकत को करीब से देखने व हालात को बेहतर ढ़ंग से समझने के लिए मैने भुवनेश्वर, पुरी और चिलिका लेक के कोस्टल एरिया का दौरा किया। नज़र जिधर दौड़ रही थी उसी तरफ तबाही का मंजर था। नारियल के लिए मशहूर उड़ीसा के ये इलाके नारियल के पेड़ो तले दबे थे। हज़ारों की तादाद में नारियल के पेड़ उजड़ चुके हैं, हज़ारों की संख्या में लोगों के घर इस साइक्लोन में उड़ चुके हैं, गांव वालों की गायें कहां है किसी को पता नहीं, बिजली के ट्रांसफार्मर और अनगिनत खंभे ऐसे गिरे हैं जैसे प्लास्टिक के टूटे खिलौने।

इलाके के लोगों के जीविकोपार्जन का एक बड़ा जरिया नारियल के पेड़ होते हैं जो थोक के भाव में उखड़े पड़े हैं, स्थानीय बताते हैं कि नारियल की बदौलत उनका पूरा परिवार जीवन बसर करता है। लेकिन, अब जीने के लाले पड़े हैं। पूछने पर पता लगा कि नारियल के पेड़े को दुबारा लगाकर उनसे नारियल की पैदावार होने में करीब तीन से चार साल का वक्त लगता है ऐसे में वो अब क्या करेंगे, समझ से बाहर है। दूसरा जीने का सहारा खेती है जो पूरी तरह से बर्बाद है, पान की खेती जड़ से खत्म है वहीं बहुत सारे स्कूल की छतें नदारद हैं। यहां के स्कूल किसी फिल्मी सीन के खंडहर जैसे दिख रहे हैं और यहां साइक्लोन पीड़ित लोगों का आशियाना बना पड़ा है।

रात के अंधेरे में डूबा रहता है पूरा शहर

ओडिशा में पुरी जिले के रेबनानुआ गांव के एक स्कूल की हालत ऐसी है कि वहां केवल पंखा लटका दिखाई दे रहा है पूरी की पूरी छत गायब है। इसी गांव के रहने वाले अजीत बताते हैं कि यहां पिछले 10 दिनो से बिजली नहीं आ रही है, आएगी भी कैसे पूरे ट्रांसफार्मर और बिजली के खम्भे जो नेस्तनाबूत है। जिन्हें ठीक होने में करीब दो से तीन महीने का वक्त लगेगा। लोग बाईक में पेट्रोल डलवाने के लिए लंबी लाईन लगा रहें हैं, इन रिमोट इलाको में पेट्रोल व डीज़ल की दिक्कत बनी हुई है, गांव की हालत तो अपने जगह पर है पुरी और भुवनेश्वर जैसे इलाके में अभी भी बिजली का समुचित इंताजाम नहीं हो सका है, पूरा शहर रात के अंधेरे में डूबा रहता है। गिने चुने होटल है जहां किसी तरह से आधे घंटे के इंतजार के बाद रात का खाना मिल सका।

ये उन शहरों व इलाको के हालत है जिनपर किसी की नज़र नहीं है, खासकर हमारे समाज और मीडिया की। कुछ एकाध संस्थान को अगर छोड़ दें तो कहीं भी इस भयानक स्थिति की रिपोर्ट नहीं हो रही है। पुरी के इन क्षतिग्रस्त इलाको में भ्रमण के दौरान एक जाना पहचाना चेहरा दिखाई दिया, नाम है अंशु गुप्ता जो स्वयंसेवी संस्था गूंज के संस्थापक हैं।

उनको देखकर मैं थोड़ा हैरान हुआ, पूछने पर पता लगा कि वो इस बदतर हालात से पहले से वाकिफ हैं और इन इलाको के बारे में अपनी टीम से जानने की बजाय वो खुद इलाके का जायजा लेने आए हैं। मुझे थोड़ा अटपटा लगा लेकिन मैने उनसे बातचीत शुरु की, सहसा ही पूछ पड़ा कि मीडिया, सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं तो दिख नहीं रही फिर आपको आने की क्या जरुरत पड़ी। उनका जवाब था, देखिए आग, पानी और हवा का तांडव किसी से भेदभाव नहीं करता है वो सबको एक ही तरह से लेता है चाहे वो आम हो या ख़ास।

हकीकत में ऐसा होता नहीं है

अंशु ने बताया कि ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस त्रासदी की ओर किसी का ध्यान नहीं है, वो बताते हैं कि बीस सालों में अनगिनत आपदाओं में उन्होने काम किया है लेकिन ये पहला ऐसा मौका है जहां समाज, लोग और यहां तक कि मीडिया ने भी इस ओर ध्यान देना उचित नहीं समझा। बकौल अंशु, लोग समझते हैं कि किसी भी आपदा के तुरंत बाद लोग मान लेते हैं कि अब सब कुछ सामान्य हो गया लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं है। वापस पटरी पर आने में वर्षों लग जाते हैं। ग़ौर करने वाली बात है कि जब आपके घर के बाथरुम के नल का पानी लीक करता है तो उसकी सीपेज ठीक करने में आपको महीनो से अधिक का वक्त लगता है ऐसे में आपदा का असर और पीड़ितों का जन-जीवन इसके तुरंत बाद कैसे ठीक हो सकता है।

ऐसे में हमारी हालत शायद उस शुतुरमुर्ग की तरह होती जा रही है जो रेत के अंदर मुंह घुसाकर मान लेता है कि बाहर सब ठीक है और उसे कुछ नहीं होगा। ये बात केवल हमारी ही नहीं है बल्कि ये हमारे समाज, हमारे बेकार पड़े सिस्टम, बड़े-बड़े ब्यापारिक घराने, हमारी सरकारों के साथ ही जिम्मेदार समझे जाने वाली मीडिया का भी है। क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती कि इस ओर थोड़ी गंभीरता से सोचें, उन लोगों के बारे में सोचें जिनके सिर पर छत, दो जून की रोटी और पहनने के लिए कपड़ा कब नसीब होगा शायद किसी को पता नहीं। एसी के कमरों में बड़ी-बड़ी बैठकें करना और इस कड़वी सच्चाई से खुद को जोड़ के देखना दोनो अलग बात है।

  • लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह नई दिल्ली में रहते हैं और सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं।
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