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मूल्यबोध / वरना न तो देश बचेगा और न पत्रकारिता!

मूल्यबोध तो भारत की पत्रकारिता की आत्मा है। इसके बिना तो भारत की पत्रकारिता का विचार ही नहीं किया जा सकता। मूल्यबोध भारतीय पत्रकारिता का अंतनिर्हित तत्व है। हालाकि, व्यावसायिक हितों की होड़ ने मीडिया के मूल्यबोध को क्षति पहुंचाई है।

पत्रकारिता भारतीय जन के विश्वास का बड़ा आधार है। भारत की पत्रकारिता पर जन का विश्वास है। इस विश्वास को बचाकर रखना है तो हमें मूल्यबोध को जीना होगा।

प्रो. बल्देवभाई शर्मा

जब हिन्दी के पहले समाचारपत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन हुआ तो उसका ध्येय वाक्य था, ‘हिंदुस्थानियों के हित का हेत’। इस वाक्य में भारत की पत्रकारिता का मूल्यबोध स्पष्ट दिखता है। पत्रकारिता का उद्देश्य या कहें मूल्यबोध भारतीय जनों के हितों की रक्षा होना चाहिए। भारत के उन्नयन के ध्येय को लेकर भारत में पत्रकारिता की शुरुआत हुई। अपनी लंबी यात्रा में मीडिया ने इस बात को साबित किया है कि वह सही मायनों में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।

आज मीडिया के क्षेत्र में ऐसे लोग भी आ गए हैं जो अपने व्यावसायिक हितों के लिए मूल्यों का गला घोंट रहे हैं। यदि मुनाफा ही कमाना है तो उन्हें मीडिया के व्यवसाय को छोड़कर अन्य किसी व्यवसाय को अपनाना चाहिए। पत्रकारिता एक ध्येय निष्ठ उपक्रम है, उसे कलंकित नहीं करना चाहिए। जब हम पत्रकारिता में अपने स्वार्थ साधते हैं, तो मीडिया के मूल्यों का क्षरण होता है।

जब हम अपनी लालसा बढ़ा लेते हैं, तो पतन का रास्ता खुल जाता है। इस दौर में पत्रकारिता को मूल्य आधारित बनाए रखने की बहुत आवश्यकता है। वरना न तो देश बचेगा और न पत्रकारिता बचेगी।

स्वाधीनता से पहले पत्रकारिता का उद्देश्य देश की स्वतंत्रता था, उसी तरह अब मीडिया का लक्ष्य देश का नवनिर्माण होना चाहिए। मीडिया के सामने सामाजिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का लक्ष्य होना चाहिए। निराशा से जूझते हुए मन को ताकत देने की पत्रकारिता होनी चाहिए। लोकतंत्र के बाकी के स्तम्भ जहां भी भटकते दिखाई दें, वहां उन्हें चेताने का काम मीडिया को करना चाहिए।

यह हम तभी कर पाएंगे, जब हमारे मन में स्पष्ट होगा कि पत्रकारिता का धर्म क्या है? उन्होंने कहा कि मानवीय चेतना खत्म होने पर पत्रकारिता की आत्मा मर जाती है। इसलिए मानवीय संवेदना प्रत्येक पत्रकार के भीतर होनी चाहिए। यह मानवीय संवेदना ही हमें पथभ्रष्ट होने से बचाती है।

हम बड़ी-बड़ी बातें करके मीडिया के मूल्यबोध को बचाकर नहीं रख सकते। उसके लिए व्यवहार आवश्यक है। हमें अपने जीवन से संदेश देना होगा। राष्ट्र को जीवंत बनाए रखना, लोक जागरण करना, पत्रकारों के लिए सूत्र वाक्य है।

पत्रकारिता का मुख्य काम है लोक शिक्षण, जिसे हम धीरे-धीरे भूल रहे हैं। लोक शिक्षण के लिए आवश्यक है कि हम आत्मशिक्षण भी करें। समाज की दृष्टि और बौद्धिक चेतना राष्ट्र के अनुकूल बनाए रखना भी पत्रकारिता का दायित्व है।

साभार
कुलपति व्याख्यानमाला
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल।
विचार : प्रो. बल्देवभाई शर्मा, कुलपति, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)।

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