Press "Enter" to skip to content

आपदा / उत्तराखंड के कई गांव में ‘जल संकट’, क्या रेल परियोजना है जिम्मेदार?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि काम शुरू होने के कुछ महीने बाद उन्होंने यहां से एक पनचक्की चलाने लायक पानी बाहर निकलते देखा, तब से लगातार पानी बह रहा है। सभी चित्र : त्रिलोचन भट्ट

त्रिलोचन भट्ट

  • उत्तराखंड में तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों के मद्देनजर आवागमन को सुगम बनाने के लिए चमोली जिले के कर्णप्रयाग तक रेल लाइन बिछाने का काम तेजी से चल रहा है। इसे 2025 तक पूरा कर लिए जाने का लक्ष्य है।
  • पहाड़ी ढलान की वजह से इस रेल लाइन का बड़ा हिस्सा सुरंग के रास्ते गुजरने वाला है जिसके लिए बड़े पैमाने पर खुदाई हो रही है और सुरंग बनाये जा रहे हैं।
  • जिन इलाकों में सुरंग की खुदाई हो रही है वहां के गांव में पानी की किल्लत होने लगी है। गांव वालों का आरोप है कि सुरंग की खुदाई की वजह से इस क्षेत्र के जल स्रोत सूख रहे हैं।
  • विशेषज्ञ इसे एक गंभीर मामला मानते हैं और उन क्षेत्रों में जलस्रोतों के अध्ययन की जरूरत पर बल देते हैं जहां सुरंग बनाये जा रहे हैं। पहले भी सुरंग खोदे जाने की वजह से ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।

तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों के मद्देनजर आवागमन को सुगम बनाने के लिए उत्तराखंड के पहाड़ों में तेजी से रेल पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि 2025 तक चमोली जिले के कर्णप्रयाग तक रेल पहुंच जाएगी। इसके लिए जोर शोर से सुरंग खोदी जा रही है। पर इस वजह से एक दूसरी चुनौती सामने आ खड़ी हुई है। इस क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों की मानें तो उनके गांवों में पानी का संकट खड़ा हो गया है। इसके लिए लोग सुरंग खुदाई को जिम्मेदार मानते हैं।  

लगभग 126 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन के ठीक ऊपर पहाड़ों पर बसे ऐसे सैकड़ों गांव हैं, जिनके प्राकृतिक जलस्रोत या तो पूरी तरह से सूख गये हैं या फिर उनमें पानी 50 फीसदी तक कम हो गया है।

सुरंगें खोदने से प्राकृतिक जलस्रोतों पर कैसे और क्यों असर पड़ सकता है, इसे समझने से पहले एक नजर इस रेल लाइन के आकार पर डालनी होगी। फिलहाल उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के चार जिलों टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग पहुंचने के लिए अंतिम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। इन जिलों में चार प्रसिद्ध तीर्थस्थल- बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री भी हैं। उत्तराखंड पर्यटन निगम के आंकड़े बताते हैं कि यहां हर वर्ष लाखों की संख्या में तीर्थयात्री आते हैं।  इस क्षेत्र में औली और फूलों की घाटी जैसे पर्यटक स्थल हैं, जहां हजारों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। इन स्थानों पर पहुंचने के लिए ऋषिकेश से सड़क मार्ग से सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है।

इस लंबी यात्रा को सुगम बनाने के लिए सरकार की तरफ से इस महत्वाकांक्षी रेल परियोजना की शुरुआत हुई। इस रेल परियोजना को इस दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र के सामारिक महत्व से भी जोड़ा जा रहा है। इस परियोजना के तहत निर्मित 125.20 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का 84.27 प्रतिशत यानी 105.47 किलोमीटर हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा। बाकी हिस्सा पुलों के ऊपर होगा। पूरे रेल मार्ग पर 17 सुरंगों और 35 पुलों का निर्माण किया जा रहा है। इनमें एक सुरंग 20.81 किलोमीटर लंबी होगी। पांच ऐसी सुरंगें बनायी जा रही हैं, जिनकी लंबाई नौ किलोमीटर से ज्यादा होगी। कुछ रेलवे स्टेशन भी भूमिगत होंगे। जाहिर है इन सब कामों के लिए पहाड़ों के एक बड़े हिस्से को खोखला किया जाना है।

बढ़ रही इस क्षेत्र में पानी की समस्या

इस रेल मार्ग का निर्माण कार्य दो वर्ष पहले शुरू हुआ था। अब तक जिन क्षेत्रों में सुरंग बनाने का काम पूरा हो चुका है, वहां लोगों के सामने पानी का संकट खड़ा हो चुका है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण टिहरी जिले का दोगी पट्टी है। यह पूरा क्षेत्र उस दुर्गम पहाड़ी हिस्से में फैला है, जिसके ठीक नीचे रेलवे लाइन का काम चल रहा है। इस क्षेत्र में दर्जनों गांव हैं। सरकारी योजनाओं का अभाव या ऐसी योजनाओं के असफल हो जाने के कारण इस पूरे इलाके के लोग पानी के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों पर निर्भर हैं। लेकिन, पिछले एक वर्ष के दौरान इस क्षेत्र के ज्यादातर प्राकृतिक जलस्रोत या तो सूख गये हैं, या उनमें पानी 50 प्रतिशत से कम रह गया है। इन प्राकृतिक जलस्रोतों से गांवों तक जो पेयजल योजनाएं बनाई गई थी, वे ठप हो गई हैं।

 उत्तराखंड में चमोली जिले के कर्णप्रयाग तक लगभग 126 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन बिछाई जा रही है।

इस क्षेत्र के जल संकट से प्रभावित लोड़सी गांव में ग्रामीणों ने बताया कि सरकार पेयजल योजनाओं के तहत गांवों में पाइप-लाइन बिछा रही है, लेकिन जलस्रोतों का पानी तेजी से सूख रहा है। ऐसे में पेयजल लाइनें बिछाने का कोई लाभ गांव वालों को नहीं मिल पा रहा है। गांवों में कुछ जगहों पर हैंडपंप लगाये गये हैं, लेकिन अब ज्यादातर हैंडपंपों पर भी पानी नहीं आ रहा है।

इस गांव के ग्राम प्रधान अनिल चैहान के अनुसार दोगी पट्टी के गांवों में पीने की समस्या पहले भी थी। लेकिन, पहले केवल गर्मी के दो महीनों मई और जून में पानी की कमी होती थी। इस बार जनवरी में ही पानी कम हो गया था। वे कहते हैं कि कई गांवों में पाइप लाइन के जरिये आसपास के प्राकृतिक जलस्रोतों का पानी पहुंचाया गया है, लेकिन अब इन स्रोतों पर पानी कम हो जाने के कारण पाइप लाइनों में पानी नही आ पा रहा है।

चमेली गांव की जैंता देवी के अनुसार इस गांव के दो प्राकृतिक जलस्रोत सूख गये हैं और एक में अब पहले की तुलना में आधा से कम पानी आ रहा है। एक जलस्रोत से पाइप लाइन आ रही है, लेकिन अब स्रोत पर पानी इतना कम है कि पाइप लाइन में पानी नहीं आ रहा है। यह जलस्रोत गांव से पांच किलोमीटर दूर है। गांव वाले स्रोत से ही पानी के बर्तन भरकर ला रहे हैं। चमोली के आसपास के दर्जनभर दूसरे गांवों में भी लगभग यही स्थिति है। कई गांवों में लोग दूर-दूर के जल स्रोतों और अलकनंदा नदी से खच्चरों से पानी ले जा रहे हैं।

काकड़सैंण गांव के मोर सिंह पुंडीर प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखने के लिए निर्माणाधीन ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराते हैं। वे गांव के ठीक नीचे पहाड़ी नाले पर बन रहे रेलवे पुल को दिखाते हुए कहते हैं नाले के दोनों ओर पहाड़ियों पर सुरंग के मुहाने हैं। पुल से इन सुरंगों को जोड़ा जाएगा। सुरंग वाली दोनों पहाड़ियों के ऊपर दर्जनों गांव हैं। जमीन का जो पानी पहले पहाड़ियों ऊपरी हिस्से में जलस्रोत के रूप में बाहर निकलता था, वह पहाड़ के अंदर खुदाई हो जाने के कारण नीचे चला गया है और रेलवे लाइन के निकास द्वार से वहां बाहर निकल रहा है।

मोर सिंह पुंडीर के इस दावे की पुष्टि दोगी पट्टी की तलहटी में बदरीनाथ हाईवे पर ढिंगणी नामक जगह पर बनाये गये रेलवे के एग्जिटपॉइंट पर हुई। एग्जिटप्वाइंट वह जगह होती है, जहां से सुरंग खोदने में निकलने वाले मलबे को बाहर निकाला जाता है। इसके साथ ही इस जगह से सुरंग के अंदर जरूरी सामान पहुंचाया जाता है। सुरंग में काम करने वाले मजदूर से इसी एग्जिटपॉइंट से अंदर जाते हैं। इसके अलावा सुरंग में ऑक्सीजन का स्तर बनाये रखने के लिए यहीं से वेंटिंलेशन की व्यवस्था ही जाती है। इस एग्जिटपॉइंट को चारों ओर से टीन की चद्दरों से कवर किया गया है। इस चहारदीवारी पर एक जगह से करीब आठ इंच पानी लगातार बाहर निकल रहा है।

इस एग्जिटपॉइंट पर लगी एक सूचना चौंकाती है। इस सूचना में इसे ब्लास्ट वाला क्षेत्र बताते हुए लोगों को दूर रहने की चेतावनी दी गई है। उल्लेखनीय है कि पहाड़ों में निर्माण कार्यों में ब्लास्ट करने पर पूरी तरह पाबंदी है। लेकिन, यह सूचना संकेत करती है कि सुरंगें बनाने के लिए पहाड़ों के भीतर ब्लास्ट भी किये जा रहे हैं।

पर्यावरणविद् जयसिंह रावत कहते हैं कि यह सूचना यदि सिर्फ लोगों का डराने के लिए है तो भी खतरनाक है, यह गंभीर मामला है और इसकी जांच की जानी चाहिए। इस जगह से करीब दो किलोमीटर दूरी पर मालाखुंटी गांव में प्रदीप सिंह मिलते हैं। एग्जिटपॉइंट से आ रहे पानी के बारे में पूछने पर बताते हैं कि यहां पर करीब डेढ़ वर्ष पहले काम शुरू हुआ था। काम शुरू होने के कुछ महीने बाद हमने यहां से एक पनचक्की चलाने लायक पानी बाहर निकलते देखा, तब से लगातार पानी बह रहा है।

तो क्या ये एक्वीफर पंक्चर है?

इस संबंध में वीरचंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक डॉ एसपी सती ने बताया कि आमतौर पर खुली सड़क पर चलने वाले ट्रैफिक की तुलना में सुरंगों के अंदर चलने वाला ट्रैफिक पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल होता है। सुरंग ने पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाया, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सुरंग किस तकनीक से खोदी गई है। सुरंगें खोदे जाने के बाद ऊपर के पहाड़ी हिस्सों में प्राकृतिक जलस्रोत सूखने अथवा उनमें पानी कम हो जाने के बारे में वे कहते हैं कि वास्तव में ऐसा कुछ हुआ है, इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। यदि इस तरह की आशंका जताई जा रही है तो यह गंभीर मामला है और इसका अध्ययन करवाया जाना चाहिए।

रेलवे परियोजना के तहत जिन क्षेत्रों में सुरंग बने हैं वहां जलसंकट उत्पन्न हो गया है। इलाके के हैंडपंप सूखने लगे हैं। 

डॉ सती के अनुसार यह मामला एक्वीफर पंक्चर का हो सकता है और यदि ऐसा है तो मामला बेहद गंभीर है। वे कहते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में बारिश का पानी पहाड़ी दरारों से जमीन के भीतर जाता है। जमीन के भीतर एकत्रित हुए पानी के स्टोरेज को एक्वीफर कहा जाता है। यही एक्वीफर पूरे पहाड़ में भूमिगत जलस्तर का संतुलित रखता है और जगह-जगह प्राकृतिक जलस्रोत के रूप में बाहर आता है। ये प्राकृतिक जलस्रोत उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी जलापूर्ति का प्रमुख साधन हैं।

इनके अनुसार अवैज्ञानिक तरीके अथवा लापरवाही से पहाड़ के अंदर की जा रही खुदाई से एक्वीफर के पंक्चर होने की पूरी संभावना रहती है। यदि किसी क्षेत्र में एक्वीफर पंक्चर हो जाता है तो पानी भारी मात्रा में पंक्चर वाली जगह से बाहर निकलने लगता है। इससे प्राकृतिक स्रोतों को पानी नहीं मिल पाता और वे सूख जाते हैं।

हिमालयी मामलों के जानकार प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक और इसरो के सेवानिवृत्त वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल कहते हैं कि सुरंगें खोदे जाने से ऊपरी क्षेत्रों में जलस्रोतों के सूखने और निचले क्षेत्रों में अचानक पानी आने के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। जोशीमठ के सुनील क्षेत्र का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं निचले क्षेत्र में सुरंग बनाये जाने से सुनील इलाके के प्राकृतिक जनस्रोतों में पानी बहुत कम हो गया था।

दोगी के मामले में वे कहते हैं कि बिना अध्ययन के यह कह पाना मुश्किल होगा कि इस क्षेत्र में पानी के स्रोत सूखने का कारण वास्तव में रेलवे लाइन की सुरंग है या कुछ और। उनका कहना है कि 2020 में नीति आयोग ने इस मामले को उठाया था और जोर देकर कहा था कि सुरंग बनाने के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि संबंधित क्षेत्र में प्राकृतिक जलस्रोतों पर इसका असर न पड़े। वे जोर देकर कहते हैं कि न सिर्फ दोगी क्षेत्र बल्कि हर उस इलाके में प्राकृतिक जलस्रोतों का अध्ययन किया जाना चाहिए जहां सुरंगे बनाई गई हैं।

डॉ. जुयाल कहते हैं कि सुरंगों के कारण जलस्रोत सूखने की संभावना तब बन सकती है, जबकि सुरंग बनाते समय ब्लास्ट किये जाएं। ऐसे में जमीन के अंदर की दरारें चौड़ी हो जाती हैं और इनसे पानी रिसने लगता है। इसे वाटर पायरेसी कहा जाता है। ऐसी स्थिति में यह पानी प्राकृतिक जलस्रोतों तक नहीं पहुंचता है और दूसरी अनपेक्षित जगहों से बाहर आने लगता है।

दूसरी तरफ रेल विकास निगम के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी ओम प्रकाश मालगुड़ी दावा करते हैं कि ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन की सुरंगें पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीके से बनाई जा रही हैं। टनलबोरिंगमैथड से खोदी जा रही सुरंगों में स्वास्थ्य, पर्यावरण और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। ये सुरंगें बाढ़ और भूकंप जैसी घटनाओं से निपटने में पूरी तरह से सक्षम हैं। भूस्खलन से सुरंगों को बचाने के लिए पोरलस्टेबलाइजेशन किया गया है।

आईआईटीरुड़की के विशेषज्ञों ने इस योजना की पेसिफिक स्पेक्ट्रम स्टडी की है। विश्व के अनेक विशेषज्ञों से भी इस संबंध में समय-समय से सलाह ली जा रही है। ऐसे में इस परियोजना का पर्यावरण या जलस्रोतों पर किसी तरह का प्रभाव पड़ने की कोई संभावना नहीं है।

आप हमें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और लिंक्डिन पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।

More from सोशल हलचलMore posts in सोशल हलचल »

Be First to Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *