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संरक्षण / यहां जानें, ‘चाय की प्याली’ से क्या है ‘हाथियों का कनेक्शन’

जिंग बोडोसा के चाय बागान को एलीफेंट फ्रेंडली टीम टी सर्टिफिकेट मिला हुआ है। चित्र : सर्टिफाइड एलिफेंट फ्रेंडली टीम टी प्रोग्राम

– साहना घोष।

  • असम में जंगल से निकलकर हाथी विशाल चाय बागानों में शरण ले रहे हैं। चाय बागान में इंसानी आवाजाही होती है ऐसे में हाथी और इंसान के बीच टकराव की संभावना बढ़ रही है।
  • इंसानी आबादी में प्रवेश से पहले हाथी चाय बागानों में आराम फरमाते हैं। इस इलाके में रहने वाले लोग हाथियों की वजह से आए दिन नुकसान झेलते हैं। इलाके की फसल को भी हाथी नुकसान पहुंचाते हैं।
  • चाय बागानों के संचालन के तरीके में बदलाव कर इसे हाथियों के लिए अनुकूल बनाया जा रहा है। उद्देश्य है कि न हाथी को नुकसान हो और न ही चाय के उत्पादन में कोई कमी आए। हाथियों को सुरक्षित रखने के लिए बागानों में गड्ढे की खुदाई या खतरनाक बाड़बंदी नहीं करने की सलाह दी जा रही है।

भारत और भूटान की अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगा 40-एकड़ में फैला है तेंजिंग बोडोसा का चाय बागान। इसे पहली नजर में देखकर असम के तमाम चाय बागानों जैसा एक और चाय बागान समझने की भूल हो सकती है। पर ऐसा है नहीं। यह चाय बागान कई खूबियों से भरा हुआ है।

दूर-दूर तक घनी हरियाली ओढ़े चाय के पौधों के बीच अगर गौर से देखें तो आपको हाथी नजर आ सकते हैं। हाथी दिखे भी क्यों न, इस बागान को विश्व के पहले हाथियों के लिए सुरक्षित बागान का खिताब जो हासिल है। एलिफेंट फ्रेंडली टीएम टी प्रोग्राम, यूनिवर्सिटी ऑफ मॉन्टाना ब्रॉडर इंपेक्ट ग्रुप और वाइल्डलाइफ फ्रेंडली एंटरप्राइज नेटवर्क के साथ साझेदारी के तहत इस बागान को हाथियों के हिसाब से तैयार किया गया है।

एक दशक पहले बोडोसा ने जैविक चाय की खेती की तरफ रुख किया। इनके बागान में दूसरे बागानों की तरह जल निकासी के लिए नाली या गड्ढे नहीं बने हैं। ऐसे गड्ढे में हाथियों फंस जाते हैं और उन्हें आगे बढ़ने में दिक्कत होती है।

बोडोसा बताते हैं कि मैं बागान में बांस के पौधे, एलिफेंट ग्रास और दूसरे फलदार पौधे लगाकर रखता हूं, ताकि हाथियों को यहां  खाने की चीजें मिल सके। हाथियों के आने के रास्ते में भी मैंने जंगल को सहेजकर रखा है ताकि उन्हें आने में दिक्कत न हो। खेती के दौरान हम रसायनों का प्रयोग नहीं करते जिससे हाथियों को सुरक्षित माहौल मिलता है। दिनभर आराम फरमाने के बाद वे शाम को वापस जंगल लौट जाते हैं।

पूर्वोत्तर में जंगल का इलाका लगातार कम हो रहा है। ऐसे में असम और दार्जिलिंग चाय के बागान हाथियों के लिए दूसरे घर की तरह हो गए हैं। इन बागानों में चाय की खेती के साथ हाथियों के संरक्षण का नायाब तरीका अपनाया जा रहा है। चाय उत्पादन में विश्व में भारत, चीन के बाद, दूसरे स्थान पर है और असम में चाय की खेती की 174 वर्ष पुरानी विरासत है।

चित्र : चाय बागान में हाथी। तस्वीर- अंशुमा बासुमतारी

असम में हाथियों का इलाका 15,050 वर्गकिलोमीटर में फैला है, और 5,719 हाथियों के साथ आबादी में असम कर्नाटक के बाद दूसरे स्थान पर है। हाथियों के रहने का स्थान प्रभावित हुआ है जिस वजह से असम में बीते कुछ वर्षों में हाथी और इंसान के बीच संघर्ष बढ़ा है। चाय के बागानों में भी हाथियों की गतिविधियां बढ़ी हैं।

कुछ साल पहले असम के करीमगंज जिले के पुतनी चाय बागान में एक 40-वर्षीय मजदूर की हाथी के हमले में मौत हो गई। उसी साल सितंबर में तेजपुर के सोनाजुली चाय बागान में हाथियों के झुंड ने कई मजदूरों के घर तबाह कर दिए। हालांकि, हाथी और इंसानों के संघर्ष के बीच तेंजिंग बोडोसा हाथियों के लिए सुरक्षित बागान बनाने पर गर्व करते दिखते हैं।

हाथियों की आवाजाही के लिए सुरक्षित रास्ता

यूनिवर्सिटी ऑफ मोंटाना की संपर्क अधिकारी लिसा मिल्स बताती हैं कि हाथियों के लिए सुरक्षित बागान का सर्टिफिकेट कार्यक्रम उन चाय उत्पादकों की क्षति पूर्ति के लिए है जिनके बागान से हाथी गुजरते हैं और इससे उन्हें नुकसान होता है। सर्टिफिकेट देने से पहले बागान को हाथियों की आवाजाही के अनुकूल बनाया जाता है। उन्हें बिजली, जहर, गड्ढों के खतरों से बचाया जाता है। चाय की बिक्री के बाद जो मुनाफा होता है उन्हें इन बागानों में हाथियों के संरक्षण पर खर्च किया जाता है। इस तरह चाय की प्याली से सीधे हाथियों का संरक्षण जोड़ा गया है, ताकि इंसान और जानवर एक दूसरे के काम आ सकें।

बोडोसा के चाय बागान के अलावा दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी चाय बागान दुनिया का सबसे बड़ा एलिफेंट-फ्रेंडली चाय बागान बना। एक अन्य जैविक चाय बागान संचालन करने वाली सोनिया जब्बार नौ साल पहले इस कार्यक्रम से जुड़ीं। सोनिया बताती हैं कि हमारी कोशिश है कि जब हाथी हमारे बागानों में आएं तो उनके साथ हिंसा न हो। यह देखना काफी दुखदायी होता है जब लोग लाठी-डंडों और घातक हथियार के साथ हाथियों को खदेड़ते हैं। यह रास्ता कभी हाथियों का ही था, लेकिन अब बागान बन गए हैं। बगान में हाथी-साथी मुहीम के तहत बच्चों को हाथियों के बारे में जागरूक किया जाता है। संरक्षणकर्ता कुशल कुंवर शर्मा कहते हैं कि 19वीं सदी में अंग्रेजों ने जंगल को काटकर चाय बागान विकसित किए। उसके पहले यह हाथियों का घर हुआ करता था।

जंगल के साथ चाय बागान भी हाथियों का घर

हाथी जंगल के साथ चाय बागान को भी अपना घर समझते हैं। हालांकि, लोगों को यह समझाना मुश्किल है। कुशल कंवर बताते हैं कि अगर हाथियों के रहने-खाने की व्यवस्था कर दी जाए तो समस्या हल हो सकती है। इस समय हाथी खाली पेट आते हैं और घरों पर सुनामी की तरह हमला करते हैं। अगर उन्हें रहने और खाने की सुविधा मिले तो वे फसल और घर तक आएंगे जरूर, लेकिन नुकसान नहीं करेंगे। वर्ष 2013 में एक शोध के दौरान शोधकर्ता स्कॉट विल्सन ने पाया कि चाय का बागान लगाना भी हाथियों को सुरक्षित घर देने का एक तरीका है।

हाथियों पर चौतरफा संकट

कुशल कंवर ने सवाल उठाया है कि हर साल किसानों के द्वारा बिछाए गए बिजली के तारों से हाथियों की मौत हो रही है। उन्हें जहर दिया जा रहा है। ट्रेन की वजह से भी हाथियों की जान जा रही है। अगर किसी एक जानवर पर हर तरफ से हमला हो तो वह कितने दिन बचेगा आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2006 से 2016 के बीच असम में हाथियों के साथ संघर्ष में 800 लोगों की जान गईं। वहीं, वर्ष 2013-2014 में 72 हाथी मारे गए। वर्ष 2012 में 100 से अधिक हाथियों की जान गई।

असम के जंगल चारों तरफ से अतिक्रमण का दबाव झेल रहे। भारत सरकार के आंकड़े कहते हैं कि जंगल की कमी से चाय बागान का भी नाता है। पर्यावरण मंत्रालय की स्टेट ऑफ द फॉरेस्ट रिपोर्ट 2017 कहती है कि कुछ जिलों में जंगल की कमी हो रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि चाय बागान के विस्तार के लिए जंगल के भीतर तक पौधरोपण किया जाता है। इसके अलावा दूसरे विकास के काम भी इसके जिम्मेदार हैं।

वर्ष 2018 में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक 2029 तक असम और अरुणाचल के हाथियों के इलाके वाले जंगल 9007.14 वर्ग किलोमीटर तक कम हो जाएंगे। इस विश्लेषण में कहा गया है कि असम-भूटान, असम-अरुणाचल प्रदेश में वर्ष 1924 से लेकर 2009 तक 7,590 वर्ग किलोमीटर (17.92 फीसदी) जंगल में कमी देखी गई।

इस दौरान चाय बागान के रकबे में बढ़ोतरी हुई। जंगल को छोड़कर दूसरी गतिविधि वाले इलाके भी बढ़े हैं। अनुमान के मुताबिक चाय बागान का इलाका 2009 में 713.97 वर्ग किमी के मुकाबले 2028 में 720.54 वर्ग किलोमीटर हो जाएगा। पर्यावरण, जंगल और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती हैं कि चाय बागानों में काम से लौटते हुए मजदूरों के साथ भी हाथियों का संघर्ष होता है। जो समुदाय चाय बागानों के अंतिम छोर पर रहते हैं, वहां हाथियों का आरामगाह होता है। इस वजह से उनपर सबसे अधिक खतरा मंडराता है।

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