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रिपोर्ट / …ताकि कम हो ‘स्कूल बैग का वजन’ तो ऐसी होनी चाहिए शिक्षा प्रणाली!

प्रतीकात्मक चित्र।

केंद्र सरकार जल्द ही नई शिक्षा नीति लाने जा रही है। हालही में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि सरकार जल्द ही 33 साल बाद नई शिक्षा नीति लेकर आ रही है। नई नीति ‘ज्ञान, विज्ञान, नवाचार और संस्कार’ पर जोर देती है।

भारत में शिक्षा में सुधार एक बड़ा मुद्दा है, जिसके लिए केंद्र और राज्य सरकार अपने-अपने स्तर पर कोशिश करती हैं। लेकिन शिक्षा का मुद्दा जस का तस बना रहता है। यहां हम सिर्फ शासकीय स्कूलों की बात करें तो मामला शहरों में तो बेहतर है लेकिन आज भी छोटे कस्बों और गांव में गंभीर है। कहीं शिक्षक हैं तो बच्चे नहीं, बच्चे हैं तो शिक्षक नहीं ऐसा अमूमन देखा जा सकता है। सरकार दावे करती है, जमीनी हकीकत कुछ ओर होती है।

उच्च शिक्षा की बात की जाए तो इसकी गंभीरता इसी बात से इंगित करती है कि भारत की प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रमुख लक्ष्य है कि साल 2035 तक उच्च शिक्षा में लोगों का नामांकन कम से कम 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए। हालांकि अभी उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) केवल 26.3 प्रतिशत है, तो अगले 15 साल में इसे बढ़ा कर दोगुना करने की कई चुनौतियां सामने होंगी। इसके लिए योजनाएं बनानी होंगी, शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना होगा और फिर इन कदमों को लागू करने का सतत प्रयास भी करना होगा।

यहां बात भारत में शिक्षा प्रणाली के प्राइमरी एजुकेशन मॉडल की करें तो बेहद संवेदनशील है। बस्ते, बच्चों से ज्यादा भारी हैं। कम उम्र में ज्यादा पढ़ाई का प्रेशर छोटे बच्चे अपने आईक्यू लेवल से फेस कर रहे हैं। लेकिन भारत में प्राथमिक और मध्य (निम्न प्राथमिक (मानक I से V) और उच्च प्राथमिक (मानक VI से VIII) शिक्षा अनिवार्य और मुफ्त है। प्राथमिक शिक्षा 6 साल की उम्र में शुरू होती है। मिडिल/अपर प्राइमरी स्कूल की शिक्षा 14 साल की उम्र में समाप्त होती है। स्कूल की पढ़ाई सरकारी और निजी स्कूलों में की जाती है, हालांकि, निजी और शासकीय स्कूलों तुलना नहीं की जा सकती। चीजें बदल रही हैं। यह कब तक पूरी तरह से जमीनी स्तर पर होंगी। ये कहना मुश्किल है लेकिन बुनियादी सुविधाएं शासकीय स्कूलों में होती हैं। क्षेत्रीय भाषा अधिकांश प्राथमिक स्कूलों के लिए शिक्षा का माध्यम है और अंग्रेजी दूसरी भाषा के रूप में आमतौर पर ग्रेड 3 से शुरू होती है।

सबसे बड़ी और सबसे जटिल शिक्षा प्रणाली

ब्रिटिश कॉंसिल ऑफ इंडिया 2019 की रिपोर्ट कहती है कि भारत 1.5 मिलियन से अधिक स्कूलों में, 8.7 मिलियन से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों और 260 मिलियन से अधिक नामांकन के साथ, कहा गया है कि भारत में दुनिया में सबसे बड़ी और सबसे जटिल शिक्षा प्रणाली है। भारत में स्वतंत्रता के बाद से भारत में शिक्षा का विकास, शिक्षा और गुणवत्ता दोनों की पहुंच बढ़ाने के लिए शिक्षा विभाग को मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) के तहत स्थापित किया गया था।

सन् 1968 में शिक्षा पर पहली राष्ट्रीय नीति के लिए अग्रणी रही। विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि 2000 से 2017 के बीच प्राथमिक विद्यालय में नामांकन में 33 मिलियन से अधिक वृद्धि हुई। 2000-01 में 156.6 मिलियन से बढ़कर 2017-18 में 189.9 मिलियन हो गई। जबकि भारत के 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों के बीच उपलब्धि अलग-अलग है, इनमें से दो-तिहाई ने सार्वभौमिक प्राथमिक नामांकन हासिल करने का दावा किया है।

क्यों खास है फिनलैंड का शिक्षा मॉडल

अंतरराष्ट्रीय स्कूलों की रैंकिंग में लगातार टॉप पर रहने वाले फिनलैंड के स्कूलों की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को आदर्श माना जाता है। पहला कारण है बच्चों को ज्यादा लंबे समय तक बच्चे बने रहने देना। यहां बच्चे करीब सात साल की उम्र में स्कूल जाना शुरु करते हैं जबकि भारत में 3 साल में बच्चे स्कूल जाना शुरू करते हैं। बच्चों को हर घंटे के हिसाब से कम से कम 15 मिनट खेल के मैदान में बिताने ही होते हैं। ऐसा पाया गया है कि खेल के बाद बच्चों का पढ़ाई में काफी ध्यान लगता है। फिनलैंड में बच्चों को लगातार कक्षा में नहीं बैठाया जाता है।

फिनलैंड का राष्ट्रीय शिक्षा बोर्ड बताता है कि ‘शिक्षा का जोर परखने से अधिक सिखाने पर है’। यहां हाई स्कूल में स्कूल छोड़ने के पहले एक अनिवार्य परीक्षा देनी होती है। उसके पहले की क्लासों में शिक्षक बच्चों के असाइनमेंट पर विस्तार से केवल अपना फीडबैक देते हैं, यहां कोई ग्रेड या अंक नहीं होता है।

फिनलैंड में शिक्षकों को नए नए प्रयोग करने की पूरी आजादी होती है। शिक्षक का पेशा इज्जत से देखा जाता है और इसके लिए कम से कम मास्टर्स डिग्री लेना जरूरी होती है। फिनलैंड के किशोर हफ्ते में औसतन 2.8 घंटे ही होमवर्क में लगते हैं। फिनलैंड में 1960 के दशक में नए शिक्षा सुधार लाए गए। यहां हर बच्चे पर ध्यान देकर उसके किसी खास हुनर को पहचानने और उसे बढ़ावा देने पर जोर होता है।

डिजिटल दुनिया के लिए तैयार करना

दुनिया में कुछ ही देशों में बच्चों को डिजिटल युग के लिए ठीक से तैयार किया जा रहा है। फिनलैंड उनमें से एक है क्योंकि 2016 तक ही यहां के सभी प्राइमरी स्कूलों में कोडिंग उनके पाठ्यक्रम का एक मुख्य विषय के रूप में लागू किया गया। कोडिंग की मदद से ही कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, ऐप और वेबसाइट बनाई जाती हैं। इतना ही नहीं, फिनलैंड में केवल स्कूल ही नहीं बल्कि कॉलेज की पढ़ाई भी मुफ्त है। यहां प्राइवेट स्कूल नहीं होते। धीमी गति से सीखने वाले बच्चों के लिए खास संस्थान हैं। सालाना करीब दो प्रतिशत बच्चे इन विशेष संस्थानों में जाते हैं।

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