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अति-महत्वाकांक्षा / क्या होगा ‘भारतीय जनता पार्टी’ का भविष्य?

चित्र : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

देश में कोरोना की दूसरी लहर का संक्रमण थम नहीं रहा है, मौजूदा केंद्र और राज्य सरकार तीसरी लहर आने पर स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य सुविधाओं का प्रबंध करने में युद्ध स्तर पर प्रयास कर रही है। कोरोना की दूसरी लहर आने के पहले और जब यह जारी थी उस समय मौजूदा सरकार ने काफी लापरवाही बरती जिसका नुकसान आम आदमी को हो रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सामने, पिछले साल 2020 के लॉकडाउन की तरह राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन पर संबोधन देने से बच रहे हैं। हालांकि राज्यों के मुख्यमंत्री लोगों को कोविड के दौरान एहतिहात बरतने का संदेश दे रहे हैं। प्रधानमंत्री राहत कोष से स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बड़े पैमाने पर उपकरण खरीदे जा रहे हैं। विदेशों से भी मदद आ रही है, लेकिन यह मदद काफी देर से भारत को मिल रही है, यह मदद तब मिल रही है, जब भारत में त्रासदी का विकराल रूप पीक से नीचे आना शुरू हो गया है, लेकिन हालात अभी भी चिंताजनक हैं।

भारत से पहले, कुछ इसी तरह की त्रासदी, दुनिया के दो देश इटली और फ्रांस में देखी गई, जिनसे सीख लेते हुए दुनिया के कुछ देशों ने स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर किया और जब वहां दूसरी लहर आई तो स्थितियों को काफी हद में नियंत्रित कर लिया गया। लेकिन भारत जैसे विशाल देश में, मौजूदा सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। विधानसभा और उत्तरप्रदेश में पंचायती चुनाव ने कोरोना के गणित को तो बिगाड़ा ही, साथ ही सत्तारु़ढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। वो बंगाल हार गए, जिसके लिए भाजपा जरूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी थी।

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भारत में जब कोराना महामारी अपने चरम पर थी, तब पांच राज्यों में 15 करोड़ से ज्यादा लोगों ने मतदान किया। अकेले पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 बार दौरे किए, जिसमें कुछ समर्थकों के साथ किराए की भारी भीड़ देखी गई। यूपीए सरकार के घोटालों से त्रस्त जब जनता ने पहली बार मोदी सरकार को चुना तो उन्होंने सुशासन का दावा करते हुए सत्ता हासिल की। सुशासन और विकास हुआ या नहीं, यह आप जानते हैं? लेकिन एक बार फिर देश की जनता ने मोदी सरकार पर विश्वास किया और मोदी सरकार 0.2 को मौका दिया लेकिन उन्होंने शक्तियों का केंद्रीकरण कर दिया।

मोदी सरकार ने आधुनिकीकरण के लिए काम किया है, लेकिन उनकी कार्यशैली ब्रिटिश शासन काल की तर्ज पर कार्य कर रही है, उनका अपना कोई नवाचार नहीं। राज्यों की कई एजेंसियों का मॉडल सन् 1800 के बाद का है और हेल्थकेयर का मॉडल सन् 1940 के करीब का है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं, जिसमें डॉक्टर्स, नर्स, महिला डॉक्टर्स और तकनीकी स्टाफ की भारी कमी है, प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना जैसी तय राशि तक निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं लोगों को मिल रही हैं लेकिन जब, जनता ज्यादा, स्वास्थ्यकर्मी कम हैं तो निःशुल्क सुविधाओं में भी लेट-लतीफी और चुनौतियां होना लाजमी है।

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यदि आप पिछले 7 साल में मोदी सरकार की कार्यशैली की हर पहलू पर ध्यान दें तो पाएंगे कि वो उन्होंने राज्यों में सुधार करने के बजाय देश के लोकतांत्रिक इतिहास में राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण कर दिया है, जोकि देशहित में हानिकारक है। मोदी सरकार की योजनाओं पर ग़ौर किया जाए तो योजनाएं बेहतर थीं लेकिन उनका क्रियान्वयन बेहतर ढंग से नहीं किया गया। डिजिटल इंडिया बनाने की वो बात करते हैं लेकिन आज इंटरनेट की पहुंच देश के कई गांव में नहीं है, जहां पहुंची है वहां इंटरनेट मौजूद नहीं है या वो 100 साल के वृद्ध व्यक्ति के धड़कते दिल की तरह चलता है।

स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया की बात किए बिना बात अधूरी होगी यह मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। वो लोगों को स्किल्ड बनाने की बात कर रहे थे, लेकिन बिना स्किल्ड किए आत्मनिर्भर भारत जैसी एक नई योजना सामने लाए जो विफलता के पायदान पर है, यही हाल मेक इन इंडिया का है। केंद्र सरकार भले ही अपनी इन योजनाओं का वैचारिक और आंकड़ों में महिमामंडन करे लेकिन हक़ीकत लोगों के सामने हैं।

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पिछले 7 साल में मोदी सरकार ने ऐसी कई योजनाएं शुरू कीं, और उन्हें अधर में छोड़ एक नई योजना, फिर एक नई योजना शुरू की गई, जिसका क्रियान्वयन यदि समय पर, सुनियोजित तरीके से होता तो कोरोना महामारी के दौरान लोगों को अपनी नौकरी, बिजनेस और कई तरह से समाजिक प्रतिष्ठा को दांव पर नहीं लगाना पड़ता।

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