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नोबेल अवार्ड / भारत में गरीबी कम करने के लिए कौन करता है मदद

चित्र: अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी एस्टेयर ड्यूफ़्लो।

अभिजीत बनर्जी, एस्टेयर ड्यूफ़्लो और माइकल क्रेमर को गरीबी मिटाने के प्रयासों के लिए अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। यह चर्चा का विषय है और होना भी चाहिए उस देश में जहां गरीबी मिटाने के लिए सिर्फ सियासी लोक लुभावने वादे किए जाते हैं। इससे पहले अमर्त्य सेन को भी गरीबी उन्मूलन की दिशा में काम करने के लिए नोबेल सम्मान मिला था।

इस बीच, अभिजीत बनर्जी का कहना है कि, ‘लोग गरीबी के बारे में बहुत बातें करते हैं, हमेशा बड़े और बुनियादी सवाल उठाते हैं, मसलन, गरीबी की मूल वजह क्या है, क्या विदेशी अनुदान से गरीबी हटाई जा सकती है, या फिर ये कि सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका क्या होनी चाहिए। इस तरह गरीबी बड़ी बहसों में उलझी रहती है। होना यह चाहिए कि गरीबी को सुलझाने लायक टुकड़ों में तोड़ा जाए।’

नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए साक्षात्कार में अभिजीत बताते हैं कि, ‘मुझे उम्मीद है कि देश में गरीबी को कम करने के लिए भारत में राज्य सरकारों के एक समूह के साथ हमारी बहुत अच्छी भागीदारी है। हम आम तौर पर भारत में संघीय सरकार के साथ काम नहीं करते हैं क्योंकि यह इतना क्रियान्वयन नहीं करते हैं। हमारे कनेक्शन राज्य सरकारों के साथ अधिक हैं और हम तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, पंजाब, हरियाणा, बिहार, राजस्थान, ओडिशा के साथ काम करते हैं। राज्य सरकारों का एक समूह है। इसलिए ऐसा नहीं है कि सरकार में हमारा कोई संबंध नहीं है, लेकिन जाहिर है कि हम हर किसी या हर चीज से जुड़े नहीं हैं।’

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में गरीबी एक्शन लैब के सह-संस्थापक बनर्जी ने स्कूली बच्चों की सीखने में सुधार के एनजीओ प्रथम के प्रयासों पर छह अध्ययन किए हैं। उन्होंने ‘सही स्तर पर शिक्षण’ की रणनीति को अपनाया है यानी, जो पिछड़ रहे हैं उनके लिए विशेष शिक्षण प्रभावी होना चाहिए।

प्रथम सर्वे में स्कूली बच्चों का सर्वेक्षण किया और एक वार्षिक शिक्षा रिपोर्ट (एसर) की स्थिति सामने लाई, जिसमें उन छात्रों का प्रतिशत शामिल है जो पाठ पढ़ने में असमर्थ हैं या अपने से कम ग्रेड के लिए अंकगणितीय उपयुक्त हैं।

द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक अभिजीत मानते हैं कि यदि आप सीखने के परिणामों की समस्या के साथ हल करने का प्रयास करते हैं, तो यह उतना कठिन नहीं है। सरकारी स्कूलों में ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से थे जिनका शिक्षा का इतिहास या परंपरा बहुत कम था। बच्चे घर पर कुछ भी नहीं सीखते हैं और बाद में स्कूल छोड़ देते हैं। क्या आप उन शिक्षकों से सवाल पूछते हैं कि वो आपके बच्चे को कैसे पढ़ा रहे हैं?

निजी स्कूलों में स्थिति बहुत अलग नहीं है, वहां के शिक्षकों ने भी पाठ्यक्रम पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया है। यहां तक ​​कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम भी पाठ्यक्रम को पूरा करने पर जोर देता है।

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