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राजनीति / प.बंगाल और केरल में क्यों हैं एनपीआर को लेकर मतभेद

प्रतीकात्मक चित्र।

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट करने की मंजूरी दे दी है। यह निर्णय उस समय लिया गया जब देश में नागरिकता कानून का विरोध और चल रहा है। हालही में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, ‘जनगणना के लिए 8,754.23 करोड़ के खर्च को मंजूर किया गया है। तो वहीं, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के लिए 3,941.35 करोड़ रुपए के खर्च को सरकार ने मंजूरी दी है।’

जावड़ेकर ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि आजादी के बाद अब तक सात बार जनगणना हो चुकी है और अब आठवीं बार जनगणना होगी। केंद्र सरकार के मुताबिक अगले साल के अप्रैल से सितंबर तक यह काम चलेगा। इस बार टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से इस प्रक्रिया को आसान बनाने का काम किया गया है। इसके लिए सरकार ने ऐप तैयार किया है।

एनपीआर के लिए कोई बायोमीट्रिक डाटा या दस्तावेज देने की जरूरत नहीं है। साथ ही एनपीआर को लेकर सभी राज्यों में कर्मचारियों की ट्रेनिंग का काम चल रहा है। सरकार का दावा है कि एनपीआर के जरिए सरकारी योजनाओं का लाभ असली लाभार्थी तक पहुंचाने में आसानी होगी।

तो वहीं, संशोधित नागरिकता कानून बनने के बाद पश्चिम बंगाल और केरल ने एनपीआर के अपडेशन का काम रोक दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एनपीआर का काम रोकते हुए कहा था कि यह जनहित में लिया गया फैसला है। वहीं केरल के मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि राज्य सरकार ने एनपीआर को स्थगित रखने का फैसला किया है क्योंकि आशंका है कि इसके जरिए एनआरसी लागू की जाएगी।

केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाली सरकार ने इस पर रोक लगाते हुए कहा कि यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि सीएए संवैधानिक मूल्यों से भटक गया है और यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

दूसरी ओर प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि कैबिनेट ने एनपीआर को अपडेट करने की मंजूरी दे दी है। इसके तहत किसी को भी प्रमाण देने की जरूरत नहीं होगी। जो भी भारत में रहता है उसको एनपीआर में शामिल किया जाएगा।

केंद्र सरकार का कहना है कि एनपीआर का काम राष्ट्रीय जनगणना अधिनियम के तहत हो रहा है। फरवरी 2021 में हेडकाउंट होगा। जो भी भारत में रहता है उसकी गणना इसमें होगी। एनपीआर का काम असम छोड़कर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में होगा।

असम में ‘अवैध घुसपैठियों’ की पहचान के लिए पहले ही एनआरसी लागू हो चुकी है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दौरान साल 2010 में पहली बार एनपीआर के लिए डाटा जमा किया गया था। साल 2011 में आखिरी बार देश में जनगणना भी हुई थी। अगली जनगणना साल 2021 में होनी है। ऐसे में केंद्र सरकार एनपीआर और उसके अपडेशन पर जोर दे रही है।

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