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मुद्दा / उसने तब क्यों नहीं कही ये बात?’ #MeToo मूवमेंट पर उठ रहे इन सवालों के ये हैं जवाब

ऐसे कई लोग हैं जो अपनी आपबीती को #MeToo के जरिए बता रहे हैं। इसे बेहतर तरह से समझने के लिए हमें उस हर पहलू के बारे में जानना जरूरी है, जो इस मूवमेंट से जुड़ा है।

#MeToo मूवमेंट 2017 भारत में तब आया जब कानून की पढ़ाई कर रहे छात्र राय सरकार ने भारतीय शिक्षाविद में कथित यौन उत्पीड़कों की एक सूची को कम्पाइल किया, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के कुछ महीनों बाद जब महिलाओं के विचार लिए गए तब महिलाओं ने गुमनाम रूप में ऐसे कई प्रश्न पूछे जिनके जवाब आज भी न्याय की मांग कर रहे हैं।

हालांकि ये बहस उस समय थम गई, लेकिन पिछले दिनों यह बहस सोशल मीडिया के जरिए फिर सामने आई है। जहां संभ्रांत वर्ग की महिलाएं सोशल मीडिया में अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में खुलकर लिख रही हैं। #MeToo के इस नए दौर में, स्टैंड-अप कॉमेडियन, सिनेमा, राजनीति और पत्रकारिता में पुरुषों पर आरोप लगाए गए हैं। यहां कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनके जरिए हम आखिर ये #MeToo क्या है इसे बेहतर तरह से समझ सकते हैं।

1. घटना जब हुई तब उसने बात क्यों नहीं की?

यदि यह सवाल तनुश्री दत्ता द्वारा नाना पाटेकर के बारे में कहा जाए, जिसने #MeToo मूवमेंट को ऊर्जा दी है, तो काफी प्रश्न खड़े करता है? बता दें जब ये घटना हुई तब तनुश्री ने 2008 में भी इसके बारे में बात की थी। उन्होंने पुलिस शिकायत भी दायर की। हालांकि, इससे कुछ हल नहीं निकला और अंजाम ये हुआ कि तनुश्री की कार पर हमला किया गया और उसका वीडियो फुटेज होने के बावजूद तनुश्री द्वारा लगाए गए आरोप को नाना पाटेकर ने एक पब्लिसिटी स्टंट करार कर गोलमाल कर दिया।

तनुश्री का अनुभव बताता है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की घटना होने पर ऐसी कई महिलाएं हैं जो डर से खुलकर बात क्यों नहीं करते हैं? क्योंकि, कोई भी उनका विश्वास नहीं करता है। उनकी परेशानी को  निर्माताओं द्वारा पब्लिसिटी स्टंट कहकर प्रचारित किया जाता है। आखिर वो महिलाएं पितृसत्तात्मक समाज में बोलने की एक बड़ी कीमत चुकाती हैं। जहां उनका करियर, निजी जिंदगी और प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है।

2. वह अब क्यों बोल रही हैं?

#MeToo आंदोलन एकजुटता के बारे में है। आंदोलन का आधार यह है कि बचे हुए लोगों पर विश्वास किया जाएगा और उनकी कहानियों को सहानुभूति के साथ सुना जाए। इस आंदोलन ने ऐसी कई महिलाएं हैं जो कई सालों से चुप थीं, उन्हें अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बात करने का साहस दिया है।

यह आंदोलन न केवल उन जिंदा लोगों के लिए एक सीख है बल्कि उन महिलाएं को भी अपनी आपबीती साझा करने की हिम्मत दे रहा है, जो अभी भी संबंधित व्यक्ति के साथ काम कर रही हैं।

3. जब वह आरोपी का नाम बता रही हैं तो वह क्यों गुमनाम बने रहना चाहती हैं?

ऐसे कई लोग हैं, जिनपर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है, जिनमें से कई लोग जीवित हैं और उस कार्यस्थल पर काफी शक्तिशाली स्थिति में हैं। यदि आप #MeToo आंदोलन में महिलाओं के गुमनाम रहने के कारण प्रश्न खड़ा करते हैं तो हो सकता है आरोपी कार्यस्थल पर महिला सहयोगी को नौकरी से निकाल सकता है, इसलिए वह अपने बारे में प्रचार नहीं चाहतीं वह केवल न्याय चाहती हैं।

4. सबूत कहां है?

#MeToo आंदोलन में कई महिलाओं ने बातचीत और ईमेल के स्क्रीनशॉट साझा किए हैं। ऐसे कई मामलों में, किसी विशेष व्यक्ति के बारे में एक महिला की आपबीती ने दूसरों को भी उसके बारे में बात करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

कुछ मामलों में, उनके साक्ष्य के बारे में उन लोगों द्वारा समर्थन किया गया है जो घटना के बारे में जानते थे। उदाहरण के लिए तनुश्री के मामले में, पत्रकार जेनिस सेकिरा ने घटनाओं की श्रृंखला की पुष्टि की है। AIB ने एक औपचारिक बयान जारी किया है, यह स्वीकार करते हुए कि संगठन अपने सदस्यों में से एक के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों के बारे में जानता था। अनुराग कश्यप ने स्वीकार किया कि वह अपने साथी विकास बहल के साथ यौन संबंध में एक महिला पर हमला करने के बारे में जानते थे। हालांकि अब फैंटम फिल्म्स से सभी पार्टनर अलग हो चुके हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि इनमें से ज्यादातर मामलों में बचे हुए लोग सार्वजनिक रूप से बाहर आने तक कुछ भी नहीं किया गया था और जब #MeToo के बारे में बात की गई तब संगठन को एक्शन लेने पर मजबूर होना पड़ा है।

दरअसल, यौन उत्पीड़न अमूमन तब होता है जब आरोपी पीड़ित के साथ अकेला होता है और बाद में उसके साक्ष्य के लिए कोई सबूत नहीं होता है। लेकिन जैसा हम बता चुके हैं, #MeToo आंदोलन में पहला कदम है जिनके साथ कभी न कभी, कहीं न कहीं गलत हुआ है, उनका विश्वास किया जाए।

5. झूठे आरोपों के बारे में क्या?

#MeToo आंदोलन किसी भी संस्थान द्वारा पूरी तरह व्यवस्थित नहीं है। यह अमूमन एक प्रक्रिया है जहां सोशल मीडिया पर महिलाएं अपने साथ हुए यौन प्रताड़ना के बारे में लिख रही हैं। निश्चित रूप ये संभावना है कि लोग झूठा आरोप भी लगा सकते हैं। हालांकि, इस तथ्य पर विचार करते हुए कि देश में मौजूदा कानूनी प्रक्रियाएं इस बात को गंभीरता से ले रही हैं।

कभी-कभी, लोग सार्वजनिक स्थान पर अपनी आपबीती को गुमनाम रूप से प्रस्तुत करते है। भारत में #MeToo का पहला दौर कानून की पढ़ाई कर रहे छात्र राय सरकार ने शुरू किया था जो साक्ष्य के माध्यम से मीटू आंदोलन में आरोपियों और पीड़ित लोगों से बात की और सूची बनाई। हुआ ये कि पत्रकार संध्या मेनन और ने अन्य पर आरोप लगाए जाने से पहले एक निश्चित जांच प्रक्रिया का पालन किया। हालांकि सरकार ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न न हो इसके लिए सन् 1997 में विशाखा गाइडलाइन जारी की थी, जिसके अनुसार…

फिर भी, यह जान लेना जरूरी है कि यदि कोई महिला किसी पर आरोप लगाती है, तो वह व्यक्ति सोशल मीडिया पर आरोप का खंडन या फिर उन पर लीगल केस कर सकता है।

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