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श्रमिक कानून / उम्मीदें दिखाने वाले नेता ‘श्रमिक कानून’ लाने पर क्यों रहते हैं चुप

भारत में लॉकडाउन अन्य देशों की तरह नहीं है। यहां कई नियम अन्य देशों से अलग हैं। मसलन जुर्माना और पुलिस प्रशासन का सख्त बर्ताव। जरूरी भी है, लेकिन जहां जरूरी नहीं वहां भी लोगों को अपराधी की तरह ट्रीट किया गया/जा रहा है। लॉकडाउन ने भारत में घरेलू श्रमिकों की दुर्दशा को बढ़ाया है, और उनके अधिकारों की कमी को उजागर किया है।

भारत में, घरेलू काम परंपरागत रूप से सामाजिक स्थिति और संस्थागत अज्ञानता के साथ व्यावसायिक संरचना के सबसे निचले हाशिए पर हैं। राजनीतिक और कानूनी मान्यता की कमी ने घरेलू श्रमिकों को संरचनात्मक रूप से गरीबी की स्थिति में लाकर खड़ा किया है और उनको नौकरी देने वाले लोग जब उत्पीड़न, भेदभाव और शोषण करने पर तब उन्हें चुप रहना पड़ता है।

लंबे समय से चल रहे देश में लॉकडाउन द्वारा आर्थिक गतिविधि की गति के साथ, भारतीय घरेलू श्रमिकों को अब बढ़ी हुई कठिनाइयों और वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कोविड-19 महामारी ने उनकी जिंदगी को अनिश्चितता के चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। जहां से जाएं तो वो कहां जाएं? ऐसे में भारत सरकार को इन घरेलू श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए नए कानून लाने पर विचार करना चाहिए।

कई गुना चुनौतियां

लॉकडाउन के सख्त प्रतिबंध, वायरस का डर और घर जाने के लिए पैदल राह चुनना। श्रमिकों को भोजन, आश्रय और दवा जैसी बुनियादी जरूरत का पूरा ना होना और लगातार कई तरह का संघर्ष करते रहना सरकार द्वारा लॉकडाउन की प्री-प्लानिंग पर सवाल खड़े करता है। सरकार के मना करने के बाद भी श्रमिकों को काम से निकाला गया। किरायदारों ने उनसे किराया वसूला और उनसे मकान खाली करवा लिया, चाहे उनकी परिस्थितियां कैसी भी रहीं हों।

यात्रा करने में असमर्थ, कई घरेलू श्रमिकों को पर्याप्त भुगतान कर नौकरी से निकालना और लॉकडाउन में काम ना करने पर सैलरी में कटौती। हमारे देश में श्रमिक कानून होने के बाद यह स्थितियां बनीं है। बढ़ती बेरोजगारी और आय की कमी के चलते श्रमिकों का जीवन बुरी तरह प्रभावित होने की संभावना है।

देश में ऐसे कई घरेलू श्रमिक हैं जो अनरजिस्टर्ड हैं, जिन्हें सरकारी योजना, खाद्यान्ह, पैसा जैसी कोई सुविधाएं नहीं मिलती हैं, जिस राज्य में मिल रही हैं वहां बेहद सीमित हैं। ऐसे में उनसे सामने आर्थिक और सामाजिक संकट है, जिसके कारण वो शोषण और उत्पीड़न का शिकार हमेशा से होते आए है। इनके लिए भी मौजूदा श्रमिक कानून में कोई खास व्यवस्था नहीं की गई है।

घरेलू काम करने वाले कई श्रमिक खासतौर पर महिलाएं यौन हिंसा, शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं। कई मामलों में ये शिकायतें घर की दहलीज से बाहर नहीं आती हैं। जहां आती हैं तो कसूरवार श्रमिक को ही ठहरा दिया जाता है।

साल 2014, में ऐसे कई केस रजिस्टर्ड किए गए और उन पर जो कार्रवाई की जानी थी, वो या तो अधर में है या उन केस की फाइल को सरकारी रिकार्ड में दफन कर दिया गया है। ये बेहद संवेदनशील विषय है जिसके बारे में सरकारें चुप रहती हैं।

श्रमिक नौकरी जाने के डर से चुप रहता है। प्रशासन आर्थिक तौर पर मजूबत लोगों के खिलाफ केस फाइल नहीं करता यदि कर भी देता है तो मामला आपसी सुलह या दोष श्रमिक पर डालकर उसे कसूरवार ठहरा दिया जाता है। कई मामलों में अपनी निजता और इज्जत को देखते हुए महिला श्रमिक चुप रहकर सहती हैं।

इन कमजोरियों के बावजूद, घरेलू कामगारों के पास कोई सुरक्षा या शिकायत निवारण तंत्र नहीं है।

ठोस कदमों की आवश्यकता

भारत में घरेलू कामगारों की सुरक्षा और अधिकार पर चर्चा बहुत हुई है, लेकिन इस बारे में कुछ भी ठोस नहीं हुआ है। वर्तमान में, घरेलू श्रमिकों के बारे में केवल दो नीतियां हैं, असंगठित श्रमिक अधिनियम 2008 और कार्यस्थल अधिनियम 2013 में महिलाओं का यौन उत्पीड़न के बारे में है, लेकिन कानून के ये दोनों टुकड़े अपर्याप्त हैं।

साल 2011 में, श्रम और रोजगार मंत्रालय ने ‘घरेलू कामगारों के लिए राष्ट्रीय नीति’ का पहला मसौदा जारी किया। हालांकि, यह संसदीय स्थायी समिति में अपना रास्ता आगे नहीं बढ़ा सका और आखिर इसे वापस लेना पड़ा।

उसी साल यानी 2011 में भारत ने ‘अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन’ के ‘घरेलू कामगार कन्वेंशन सी-189’ पर हस्ताक्षर किए, जिसमें यह कहा गया था कि घरेलू कामगार कुछ बुनियादी अधिकारों, जैसे कि उचित मजदूरी, काम के घंटे, समान, अनुबंध की शर्त के बारे में बात की गई, फिर भी, भारत सरकार ने कभी भी इस अधिवेशन की पुष्टि नहीं की, इस बात को यह कहते हुए गुमराह किया गया कि इसके राष्ट्रीय कानून और प्रथाएं अधिवेशन के प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं।

इसके बाद, जून 2019 में, घरेलू श्रमिकों के लिए एक राष्ट्रीय नीति का मसौदा तैयार करने के लिए सरकार द्वारा एक और प्रयास किया गया, जो न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों के भुगतान को सुनिश्चित करेगा। लेकिन, यह कभी भी पूर्ण कानून नहीं बना और इस मुद्दे के संबंध में केंद्र की ओर से उत्तर नहीं आया। मौजूदा मोदी सरकार 2.0 में भी इस तरह के मामलों पर बहुत ज्यादा काम नहीं किया जा रहा है।

जाहिर है, कई प्रयासों के बावजूद घरेलू श्रमिकों के कल्याण को बनाए रखने के मामले में लगातार निष्क्रियता रही है। बहरहाल, लॉकडाउन के साथ आय सृजन और रोजगार के उनके स्रोतों को प्रभावित करने के साथ, एक नए विधायी ढांचे को लाने की आवश्यकता है जो घरेलू श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

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