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समाज / कहीं धर्म परिवर्तन तो कहीं अपने मूल धर्म में वापिस आते वो लोग

प्रतीकात्मक चित्र।

धर्म परिवर्तन एक ऐसा मुद्दा है जो सदियों से हैं, और सदियों तक रहेगा! लेकिन ये क्यों है? इस सवाल के कई उत्तर हो सकते हैं। कई विवादास्पद तो कई तर्क पर आधारित। तो कई ऐसे सवाल जो एक सभ्य समाज जहां धर्म लोगों को जोड़े रखने का काम करता है वहां विखंडित कर विवाद की जहरीली हवाएं उन्हें तहस-नहस कर सकती है!

ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों गुजरात में विजयादशमी पर हुआ। गुजरात के विभिन्न हिस्सों के लगभग 500 दलितों ने अहमदाबाद शहर, मेहसाणा और साबरकांठा जिले तीन अलग-अलग कार्यों में बौद्ध धर्म अपना लिया था। इंडियन एक्सप्रेस की खबर बताती है कि गुजरात के विभिन्न हिस्सों के लगभग 1,500 दलितों ने अहमदाबाद के शाहीबाग इलाके में सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय स्मारक में आयोजित एक समारोह में बौद्ध धर्म का पालन करने का संकल्प लिया।

एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संगठन, बुद्ध के लाइट इंटरनेशनल एसोसिएशन (BLIA) के गुजरात चैप्टर द्वारा आयोजित समारोह की अध्यक्षता BLIA के धार्मिक प्रमुख, हेसिन बाउ और ताइवान के बौद्ध भिक्षु ने की थी। इस मौके पर गुजरात अध्याय के पूर्व BLIA अध्यक्ष और दासदास निर्वाचन क्षेत्र के वर्तमान कांग्रेस विधायक नौशाद सोलंकी और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद रतिलाल वर्मा शामिल थे।

बीएलआईए के गुजरात चैप्टर के वर्तमान अध्यक्ष तुषार श्रीपाल ने कहा कि लगभग 1,400 लोगों ने कार्यक्रम के लिए खुद को पंजीकृत कराया। गुजरात में बीएलआईए के एक बुजुर्ग सलाहकार सोलंकी ने कहा कि 1,400 लोगों में कई लोग थे जिन्होंने पहली बार बौद्ध धर्म का पालन करने का संकल्प लिया था।

सौराष्ट्र के सुरेंद्रनगर की रहने वाली मंजुला मकवाना, जिन्होंने समारोह में अपने पति घनश्याम मकवाना और तीन बच्चों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया, ने कहा, ‘समानता ही हमारे लिए बौद्ध धर्म अपनाने का एकमात्र कारण है। हिंदुओं के रूप में हमें समानता नहीं मिली हम अनुसूचित जाति (दलित) के लोगों के खिलाफ बहुत भेदभाव और अत्याचार देख रहे हैं।’

ये तो बात हुई गुजरात की छत्तीसगढ़ में भी कुछ ऐसा ही है लेकिन बीबीसी की 16 अक्टूबर 2019 की रिपोर्ट में ‘आरोप’ शब्द का उपयोग किया गया है। गढ़चिरौली महाराष्ट्र का आदिवासी बहुल इलाक़ा है जहां की बड़ी आबादी जंगलों में रहती है। पिछले कुछ सालों से ईसाई मिशनरी यहां काम करते आ रहे हैं। अब उन पर आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराने का आरोप लग रहा है।

गढ़चिरौली जिले का सुदूर बिजयपार गांव। कुछ आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है। इसके बाद बिजयपार की ग्रामसभा ने ईसाई बनने वालों का सामाजिक बहिष्कार करना शुरू कर दिया। अब न तो कोई इन परिवारों के घर जाता है और न ही अपने घर बुलाता है। यहां तक कि सामाजिक आयोजनों में भी इन परिवारों को शामिल होने की अनुमति नहीं है।

दुलाराम पहाड़ सिंह कुमरे बिजयपार ग्रामसभा के सचिव हैं। वो बीबीसी को बताते हैं कि उनके गांव में आदिवासियों के कुल 12 ऐसे घर ऐसे हैं जिनके सदस्यों ने अपना धर्म त्याग दिया है और ईसाई बन गए।

ये तो बात हुई हमारे उस भारत की जिसे हम अमूमन अनेकता में एकता के स्वरूप के नाम से संबोधित करते हैं। अब बात उत्तरी इराक की जहां पर कुछ दिन पहले अंतराष्ट्रीय मीडिया में यह विषय छाया रहा कि कुर्द अपना धर्म छोड़ कर पारसी बन रहे हैं।

ये क्यों बन रहे हैं जर्मनी की एक वेबसाइट डॉयचे वेली की रिपोर्ट कहती है कि उत्तरी इराक के एक प्राचीन लेकिन उजड़े हुए मंदिर में एक उत्सव के दौरान फैजा फुआद कुर्दों की उस जमात में शामिल हो गईं जो इस्लाम को छोड़ कर अपने पूर्वजों के जरथुष्ट यानी पारसी धर्म को अपना रहे हैं। इस्लामिक स्टेट के जिहादी गुटों के साथ कई सालों से चली आ रही हिंसा के कारण बहुत से लोगों का इस्लाम से मोहभंग हुआ है।

भारत में मुंबई से 200 किलोमीटर दूर गुजरात के उद्वदा में पारसियों का एक पुराना मंदिर है। कहते हैं कहा जाता है कि यहां दुनिया की सबसे पुरानी आग जल रही है। सदियों पुराने इस धर्म को मानने वालों की तादाद पूरी दुनिया में अब महज 2 लाख के आसपास है। इसमें एक बड़ी तादाद भारत के महाराष्ट्र और गुजरात में हैं। भारत में यह समुदाय यानी पारसी कारोबार की दुनिया में काफी प्रभावशाली है। धर्म के नियमों के मुताबिक सिर्फ पारसी मां-पिता की संतान ही जरथुष्ट हो सकती है। (ऐसा ही कुछ हिंदू धर्म के बारे में कहा जाता है कि हिंदू जन्म लेता है और हिंदू ही मरता है। ये मान्यताएं और आस्था का विषय है।) इनमें से अगर कोई एक दूसरे धर्म का हो तो संतान को धर्म में शामिल नहीं किया जा सकता। तो फिर सवाल है कि कुर्द कैसे पारसी धर्म में शामिल हो रहे हैं?

मध्यपूर्व मामलों के जानकार फज्जुर रहमान डॉयचे वेली को बताते हैं, ‘मुमकिन है कि दूसरे इलाके के पारसियों ने धर्म में आंतरिक सुधार किया हो। एक सच्चाई यह भी है कि कुर्द अपनी कबीलाई संस्कृति से पूरी तरह अलग नहीं हुए हैं और सुन्नियों ने चूंकि कभी उन्हें पूरी तरह से अपनाया नहीं बल्कि उनका दमन किया इसलिए वे वापस अपनी जड़ों की ओर जा रहे हैं।

जरथुष्ट धर्म (पारसी धर्म) की नींव प्राचीन ईरान में कोई 3500 साल पुराना है। हजारों साल तक यह ताकतवर पारसी साम्राज्य का आधिकारिक धर्म रहा लेकिन सन 650 में अंतिम जरथुष्ट राजा की हत्या और इस्लाम के उदय ने इसे लंबे समय के लिए अंत की ओर धकेल दिया। हालांकि दमन की तमाम कोशिशों के बावजूद भी धर्म जिंदा रहा। ईरान में इस्लाम का असर बढ़ने के बाद मुट्ठी भर पारसी भाग कर भारत आ गए और फिर यहीं के हो कर रह गए. यही वजह है कि भारत में इस धर्म को फलने फूलने का मौका मिला।

यहां तीन उदाहरण है जो कि अलग-अलग अखबार या वेबसाइट की खबरों में प्रकाशित हो चुके हैं। लेकिन एक सवाल वो ये कि लोग धर्म परिवर्तन क्यों कर रह हैं? गुजरात में ‘समानता’ छत्तीसगढ़ में जाहिर तौर पर ‘धन’ और उत्तरी इराक में अपनी ‘परंपराओं के प्रति भावनात्मक’ होकर लौटते कुर्द लोग जो थे वहीं बन रहे हैं। यहां एक बात समान है और वो यह कि यदि आप जिस धर्म में है वहां कि विसंगतियों को अपसी समझबूझ के साथ मिटाते हैं। तो धर्म परिवर्तन जैसे विषय का सवाल ही नहीं उठता। फिर यदि कोई धर्म परिवर्तन करता है या करवाता है तो यह उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी होगी जो धर्म परिर्वतन कर रहा है। वो क्यों और किसलिए कर रहा है? उसका परिणाम क्या होगा इसके लिए वही खुद जिम्मेदार है ना कि वो लोग जो उसके साथ परिवार में साथ है।

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