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योजना / ‘मेक इन इंडिया’ विफल अब ‘मेक फॉर वर्ल्ड’ का सहारा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2020 को आत्मनिर्भर भारत की अपनी परिकल्पना को विश्व-कल्याण से जोड़ते हुए ‘मेक इन इंडिया’ के साथ ‘मेक फॉर वर्ल्ड’ का नया नारा दिया। यह परिकल्पना देश को वैश्विक विनिर्माण श्रृंखला के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभारने का संकल्प देती है। ‘मेक फॉर वर्ल्ड’ की रूपरेखा क्या होगी। इसके बारे में सरकार ने अभी तक कोई प्रमाणिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। लेकिन बात ‘मेक इन इंडिया’ की जाए तो इसकी सफलता और विफलता के बारे में जानना चाहिए।

यहां हम बात ‘मेक इन इंडिया’ की की जाए तो मौजूदा पार्टी की ही केंद्र सरकार ने जब साल 2014 में विनिर्माण को प्रोत्साहित करने और विनिर्माण के जरिए अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के उद्देश्य से ‘मेक इन इंडिया’ की शुरूआत की थी। समय आगे बड़ता रहा और ‘मेक इन इंडिया’ विफल होता रहा। सरकार सफल बताने की कोशिश करती रही, लेकिन जमीनी हक़ीकत इससे काफी अलग रही।  

‘मेक इन इंडिया’ शुरुआत 25 सितंबर, 2014 को देशव्यापी स्तर पर विनिर्माण क्षेत्र के विकास के उद्देश्य से की गई थी। उस दौरान अर्थव्यवस्था में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए विकास दर को 12-14 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया। कहा गया कि 2022 तक अर्थव्यवस्था में विनिर्माण क्षेत्र से संबंधित 100 मिलियन रोज़गारों का सृजन किया जाएगा।

यह आज तक पूरा नहीं हुआ। उस समय यह सुनिश्चित किया गया कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान वर्ष 2025 (जो कि संशोधन से पूर्व वर्ष 2022 था) तक बढ़कर 25 प्रतिशत हो जाए इसे भी पूरा होने में इससे ज्यादा वक्त लग सकता है।

सफल कम,  विफल ज्यादा

‘मेक इन इंडिया’ पहल में अर्थव्यवस्था के 25 प्रमुख क्षेत्रों जैसे- ऑटोमोबाइल, खनन, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि पर ध्यान केंद्रित किया गया। लेकिन कुछ समय तक इन सारे क्षेत्रों पर चीन में बने उत्पाद ज्यादा प्रभावी देखे जा सकते थे। हालांकि चीन को लेकर भारत का रुख अब अलग है। 8 नवंवर 2016 को हुई नोटबंदी ने पूरे देश की अर्थव्यवस्था को हिला दिया। ‘मेक इन इंडिया’ के लिए जिस लक्ष्य के लिए कोशिश की गई वो इसके कारण उसकी गति धीमी पड़ गई।

हालांकि इस दौरान यह बिल्कुल नहीं था कि सब कुछ ठीक नहीं हो रहा हो। ‘मेक इन इंडिया’ की थोड़ी बहुत सफलता में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि योजना की शुरुआत के कुछ समय बाद ही साल 2015 में भारत ने अमेरिका और चीन को पीछे छोड़ते हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में शीर्ष स्थान प्राप्त कर लिया था।

भारत एक कृषि प्रधान देश है और भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। विश्लेषकों का मानना है कि इस पहल का सबसे नकारात्मक प्रभाव भारत के कृषि क्षेत्र पर पड़ा है। इस पहल में भारत के कृषि क्षेत्र को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया है।

हालाकि ‘मेक इन इंडिया’ मुख्य रूप से विनिर्माण उद्योगों पर आधारित है, इसलिये यह विभिन्न कारखानों की स्थापना की मांग करता है। आमतौर पर इस तरह की परियोजनाएँ बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों जैसे पानी, भूमि आदि का उपभोग करती हैं।

विफलता के तीन सबसे बड़े कारण

पहला, इसने विनिर्माण क्षेत्र को प्राप्त करने के लिए बहुत महत्वाकांक्षी विकास दर निर्धारित की। औद्योगिक क्षेत्र की क्षमता से परे 12-14% की वार्षिक वृद्धि दर अच्छी तरह से है। ऐतिहासिक रूप से भारत ने इसे हासिल नहीं किया है और इस तरह की क्षमताओं का निर्माण करने की उम्मीद करना शायद सरकार की कार्यान्वयन क्षमता का एक बहुत बड़ा आधार है।

दूसरा, घरेलू अर्थव्यवस्था के तुलनात्मक लाभों की किसी भी समझ से रहित नीति के रूप में देखा गया। तीसरा, वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता और बढ़ती व्यापार संरक्षणवाद को देखते हुए यह योजना पहल विफल रही।

‘मेक इन इंडिया’ एक नीतिगत पहल है जिसमें अंदरुनी विसंगतियां हैं। विरोधाभासों का समूह तब सामने आता है जब हम विदेशी पूंजी के साथ किए जा रहे प्रयासों में स्वदेशी ’उत्पादों की गुणवत्ता की जांच करते हैं। इसने एक ऐसे परिदृश्य को जन्म दिया है, लेकिन निवेश अभी भी आना बाकी है।

विनिर्माण गतिविधि को बढ़ाने के लिए अर्थव्यवस्था को नीति और दुनिया के लिए दरवाजे खुले रखने की बेहद जरूरत है। सरकार को यह विचार करना चाहिए कि संसद में बिलों की एक श्रृंखला और निवेशकों की बैठक की मेजबानी से औद्योगीकरण को शुरू नहीं किया जा सकता है। हालांकि केंद्र सरकार के बास अब ‘मेक इन इंडिया’ के साथ नया विकल्प ‘मेक फार वर्ल्ड’ है।

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