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महाराष्ट्र / तो क्या उद्धव ठाकरे 5 साल तक मुख्यमंत्री रह पाएंगे!

Photo courtesy: HT/Facebook

महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की महागठबंधन वाली सरकार बन चुकी है। पिछले दिनों जो भी हुआ वो राजनीति थी। राजनीति ऐसी ही होती है, जो लोग इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अभी भी संशय में हैं उन्हें चाणक्य नीति और राजनीति की पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए।

बहरहाल, मुंबई के शिवाजी पार्क में गुरुवार को काफी हुजूम देखा गया। यहां शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर तशरीफ रखने वाले वो ठाकरे खानदान के पहले सदस्य और महाराष्ट्र के 18वें मुख्यमंत्री बन चुके हैं। शपथ ग्रहण समारोह में कई बड़े, छोटे और उनसे भी छोटे नेता मौजूद थे।

सामने है चुनौतियों का अंबार: में मंदी का दौर है। ऐसे में 59 साल के उद्धव के लिए महाराष्ट्र में पनप रही चुनौतियों को पटरी पर लाना आसान नहीं होगा। लोगों को उनसे अपेक्षाएं हैं और उनके सामने है दो पार्टियों को 5 साल तक साथ लेकर चलने की उम्मीद।

थोड़ा पीछे जाएं तो एक वो समय भी रहा है जब कर्नाटक में कुमारस्वामी और कांग्रेस ने सरकार तो बना ली थी, लेकिन पार्टी को सहेज नहीं पाए और उसका हश्र सबके सामने था। कर्नाटक के अलावा भी कई राज्यों में टूट-फूट हो चुकी है। सरकार चलाने के साथ ही तीनों दलों को अपने असंतुष्ट गुट को मनाकर रखना होगा।

चित्र: महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और सीएम उद्धव ठाकरे।

इस तरह के गठबंधन में सबसे बड़ी समस्या आती है कि सरकार में फैसला कौन लेगा। हालांकि गठबंधन के नेताओं का कहना है कि उन्होंने हर चीज पहले से साफ कर ली है। लेकिन भविष्य में क्या होगा इस पर संशय बना रहेगा। यहां एक सवाल यह भी है कि संजय राउत इस बात की ओर इंगित कर रहे हैं कि इस गठबंधन का राष्ट्रीय राजनीति पर असर पड़ेगा।

महाराष्ट्र में साथ आने के बाद तीनों घटक इस दोस्ती को राष्ट्रीय राजनीति में किस तरह आगे जाएगें यह देखना दिलचस्प होगा, ऐसे में महाराष्ट्र में नेतृत्व कर रहे उद्धव पर यह बड़ी चुनौती होगी। यदि सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले 5 साल में शिवसेना राष्ट्रीय पार्टी बनने की पूरी कोशिश करेगी।

इस गठबंधन में कई दिग्गज नेताओं के अलावा तीन पूर्व मुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस से पृथ्वीराज चौहान और अशोक चह्वान तो एनसीपी से शरद पवार। इन तीनों की राज्य में पकड़ रही है। गवर्नेंस में इन नेताओं के ईगो को नियंत्रण में रखना भी गठबंधन के लिए आसान नहीं होगा।

कांग्रेस-एनसीपी सेकुलर राजनीति का प्रतिनिधित्व करती रही हैं, तो शिवसेना की पहचान आक्रामक हिंदुत्व की है। ऐसे में इनके बीच हो सकता है कि भविष्य में किसी मुददे पर टकराव जैसी स्थिति बने लेकिन ऐसा नहीं होता है तो यह राजनीतिक इतिहास में एक बड़ी घटना साबित होगी।

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