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आत्मज्ञान / ‘खुद को जानने के वो आसान तरीके’, जो आप जानना चाहते हैं

प्राचीन एथेन्स के विशाल मंदिर डेल्फी की दीवारों पर यह शब्द मिलते हैं, ‘अपने आप को जानो’ यानी आत्मदीपो भवः। यह वाक्य उस दौर में लोग समझते थे, लेकिन आज हम ये शब्द समझ कर भी नहीं समझ रहे हैं। यह शब्द भारतीय वैदिक ग्रंथों में मिलते हैं। ये पूरी तरह संभव है कि ये वाक्य वैदिक ग्रंथों से यूनान पहुंचे और फिर डेल्फी मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण किए गए।

यह तो बात हुई उन शब्दों की जिनके बारे में विस्तार से जान लेना, स्वयं की आधी से ज्यादा समस्याओं का समाधान खोज लेना जैसा ही है। आध्यात्मिक प्रक्रिया में खुद को जानने पर काफी महत्व दिया जाता है।

‘चिंतन’, चेतना को जागृत करता है इसलिए अध्यात्मिक व्यक्ति हर दिन सुबह उठकर चिंतन और योग करता है। ‘योग’, आत्मदीपो भवः है। योग खुद को जानने की वो सरल प्रक्रिया है, जिसे आप घर पर रहकर भी कर सकते हैं।

अपने आप को जानने का एक ओर सरल तरीका है वो है आपके ‘कर्म’। कर्म आपको बनाते हैं। कर्म से ही ‘पुरुष’ महापुरुष बनता है, लेकिन आप कर्म किस दिशा में कर रहे हैं यह आपके विवेक पर निर्भर करता है। अच्छे कर्म सभी करते हैं, लेकिन सही समय पर किया गया कर्म आपको सफलता हासिल करने के लिए न केवल प्रेरित करता है बल्कि आपको सफल भी बनाता है।

कर्म शब्द संस्कृत शब्द ‘कृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘करना’, व्यक्ति किसी कर्म को करता हो और उस कर्म के फल को पाता है। यह कर्म उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। यह क्रम चलता रहता है अनादि से अनंत काल तक यानी जब तक ये पृथ्वी, दुनिया और मनुष्य है।

अपने आप को जानने की प्रक्रिया में कर्म की भूमिका उस पक्षी की तरह होती है जो उड़ते समय धरती और आकाश दोनों को देखता है और उसे अपना लक्ष्य साफ दिखाई देता है। इसलिए कर्म बहुत सोच-समझकर करना चाहिए यही आपके भविष्य की बुनियाद को मजबूत बनाते हैं और लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता आसान करते हैं।

जब आप खुद को जानने की कोशिश में खुद को पहचानते हैं तो कई तरह के दुःख आपके इर्द-गिर्द मौजूद होते हैं। गौतम बुद्ध ने कहा है, ‘ये संसार दुःखों से भरा है और हर दुःख का एक कारण है।’ आपको वो कारण खोजना होगा और ताकि आप उसका निवारण कर सकें। ये आप और सिर्फ आप ही कर सकते हैं कोई दूसरा नहीं।

दरअसल, दुःख इसलिए हैं क्योंकि हम स्वकेंद्रित हैं, हम स्वहित के बारे में सोचते हैं और वैसा ही करते हैं। यदि आप जनहित के बारे में सोचें तो आपके दुःख नहीं बल्कि शांति और सुख की आत्म-अनुभूति होगी।

संकुचित विचारधारा वाला व्यक्ति हमेशा हम, हमारे और मैं के दायरे में ही उलझा होता है, और दुःखी बना रहता है। यदि आप चीजों को वैसा ही देखें जैसी वो हैं तो आप दुःखी नहीं होंगे। यदि किसी कारण से दुःख आपके सामने आ भी जाता है तो उस दुःख का निवारण अपने विवेक से खोज लेंगे लेकिन यह तभी संभव है जब आप अपने आप को जानेंगे। इसके लिए आपक योग, चिंतन और सद्-कर्म करेंगे।

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