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सलाह / बड़ा सवाल कितने घंटे सोना चाहिए? कम शब्दों में यहां है उत्तर

शरीर को आखिर कितनी नींद की जरूरत है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी शारीरिक गतिविधि किस तरह की है। आपको अपनी नींद या खाने को तय करने की कोई जरूरत नहीं है। ‘मुझे रोज कितनी कैलोरी खानी चाहिए, मुझे रोज कितना सोना चाहिए?’ जीवन को संभालने का यह मूर्खतापूर्ण तरीका है। आप अपने शरीर को ही तय करने दीजिए कि आज कितना खाना… खाना है। आज आपकी गतिविधि का स्तर कम था, इसलिए आपने कम खाया। कल आपके कामकाज का स्तर बहुत ऊंचा होगा तो आप ज्यादा खाएंगे। यही बात नींद पर भी लागू होती है। अगर आप खूब सहज व आरामदेह स्थिति में रहते हैं, तो आप जगे हुए रहेंगे।

सदगुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं आप अपने शरीर को तय करने दीजिए कि आज कितना खाना खाना है। आज आपकी गतिविधि का स्तर कम था, इसलिए आपने कम खाया। कल आपके कामकाज का स्तर बहुत ऊंचा होता है तो आप ज्यादा खाएंगे। यही बात नींद पर भी लागू होती है। अगर आप खूब सहज व आरामदेह स्थिति में रहते हैं, तो आप जगे हुए रहेंगे।

अलार्म से जागने की जरूरत नहीं

आपके शरीर को किसी अलार्म से जागने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। एक बार शरीर जब पूरी तरह से रिलैक्स हो जाए तो फिर यह अपने आप जग जाएगा। अगर जीवन जीने की ललक है तो आपके सिस्टम को ऐसा ही होना चाहिए। और अगर यह बिस्तर को एक कब्र के रूप में देख रहा है तो यह उससे बाहर नहीं आना चाहेगा। अगर आपको इस मौत से बाहर निकालने के लिए किसी की जरूरत पड़ती है तो यह खुद में एक समस्या है। आपको अपने शरीर और मन को ऐसा रखना चाहिए, जिससे इनमें हमेशा जीने की चाहत बनी रहे, उनमें जिंदगी से भागने की चाहत नहीं होनी चाहिए। यह सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि आप जीवन को किस तरह से ले रहे हैं। अगर आप एक खास तरह की मानसिक स्थिति में हैं, जहां आप जीवन से बचना चाहते हैं, तो नींद एक अच्छा जरिया बन जाती है। तब आप ज्यादा से ज्यादा खाना और सोना चाहेंगे।

आप चाहे जो कुछ भी खाएं, सोने से कम से कम दो घंटे पहले आपका खाना हो जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है, तो आपका खाना बेकार चला जाता है, क्योंकि अगर आप खाना पचाना चाहते हैं तो आपकी मेटाबॉलिक क्रिया काफी ऊंची होनी चाहिए, जबकि सोने के लिए कम स्तर के मेटाबॉलिक क्रिया की जरूरत होती है। अगर आप खाते ही सो जाते हैं तो शरीर को समझ ही नहीं आता कि वह क्या करे। उस स्थिति में या तो शरीर आपको सोने नहीं देता या फिर यह खाए हुए भोजन को हजम नहीं कर पाता।

सवाल फिर वही है कि कितना सोया जाए?

अगर आप खाने के दो घंटे या उससे कम समय के भीतर सो जाते हैं तो आपके द्वारा खाए हुए भोजन का 80 प्रतिशत हिस्सा बेकार चला जाता है। सोने से पहले पाचन का काम पूरा हो जाना चाहिए। लेकिन आजकल होता ये है कि लोग खाना खाते हैं, और सीधे सोने चले जाते हैं, क्योंकि फिर उसके बाद वे सो नहीं सकते। लोग आज ऐसी मानसिक अवस्था में पहुंच चुके हैं जहां उन्हें तब तक नींद ही नहीं आती, जब तक वे खाने से अपना पेट भर नहीं लेते और शरीर को शिथिल नहीं बना देते। अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो आपको इस बारे में ध्यान देने की जरूरत है। अगर आप भी बिना पूरा पेट भरे सो नहीं सकते, तो समझ लीजिए कि आपको तुरंत कोई कदम उठाने की जरूरत है। यह मामला नींद से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह एक खास तरह की मानसिक अवस्था है।

तो सवाल फिर वही है कि कितना सोया जाए? इसका जवाब होगा… बस जितनी शरीर को नींद की जरूरत है। नींद और खाने के बारे में अपने बजाए शरीर को फैसला लेने दीजिए, क्योंकि आप इनके बारे में सही फैसला नहीं ले सकते। भोजन और नींद दोनों के बारे में शरीर को ही तय करने दीजिए। क्योंकि यह सब कुछ शरीर से ही जुड़ा हुआ है।

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