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यथार्थ / …तो क्या आप हिमालय जाकर ‘ब्रह्मचारी’ बनना चाहेंगे!

ब्रह्मचर्य का अर्थ कोई बड़ा कदम उठाना जैसे कि हिमालय पर जाकर ब्रह्मचारी बन जाना नहीं है, बस उन्हें वैसे ही रहना है जैसा जीवन है, जैसे सृष्टिकर्ता ने आप को बनाया है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ है एक मंद पवन, बयार की तरह होना इसका मतलब है कि आप कहीं पर भी, ठहरते नहीं हैं। हवा हर जगह जाती है लेकिन हम नहीं जानते कि इस समय ये कहां से आ रही है? इसने अभी समुद्र को पार किया और यहां आयी। ये अभी यहां है और अब आगे बह रही है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं कि ब्रह्मचर्य का अर्थ है, बस जीवन होना वैसे जीना जैसे आप जन्में थे बिल्कुल अकेले! अगर आप की मां ने जुड़वां बच्चों को भी जन्म दिया था, तो भी आप तो अकेले ही आए थे। ब्रह्मचर्य का अर्थ है दिव्यता से अत्यंत निकटता से जुड़ना, और वैसे ही जीना।

ब्रह्मचर्य कोई महान कदम नहीं है। यह तो बस वैसे ही रहना है, जैसे जीवन है। शादी, विवाह एक बड़ा कदम है आप कुछ बहुत बड़ा करने का प्रयत्न कर रहे हैं। कम से कम लोगों को तो ऐसा ही लगता है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है, आप ने कुछ नहीं किया, अपने जीवन को आप ने वैसे ही घटित होने दिया जैसे रचनाकार ने आप को बनाया। आप इसमें से कुछ और नहीं बनाते। तो इसमें कोई कदम नहीं उठाना है। अगर आप कुछ नहीं करते तो आप ब्रह्मचारी हैं।

यहां उनकी कोई ज़रूरत नहीं जो

आप अगर एक गोल चक्र में घूमते हैं, चाहे वह कितना भी बड़ा हो, आप हमेशा वापस आते हैं, चाहे कोई आप को वापस न बुलायए। हमें नहीं पता कि ये दुनिया आप का यहां होना पसंद करती है या नहीं, लेकिन आप किसी भी तरह से वापस आ ही जायेंगे, क्योंकि आप एक गोल चक्र में हैं। जो यह महसूस करते हैं कि यहां उनकी कोई ज़रूरत नहीं है, जो एक सीधे रास्ते पर चलना चाहते हैं, उनके लिए यह दिव्य पथ है, ग्रहों के जैसा गोल घूमने वाला प्रक्षेप पथ (ट्रेजेक्ट्री) नहीं।

तो कोई भी इंसान ब्रह्मचर्य को एक प्राकृतिक प्रक्रिया की तरह नहीं बल्कि एक मार्ग और एक अनुशासन की तरह अपनाता है जिससे वे जीवन की चक्रीय गति (जन्म-मरण के चक्कर) में न पड़ें। वे जीवन की चक्रीय गति के आगे झुकना नहीं चाहते।

तो ब्रह्मचर्य में क्या करना होता है?

अगर आप बहुत जागरूक हैं तो इसमें कुछ भी नहीं करना है, यह बहुत सरल है। आप रोज़ सुबह ऐसे उठते हैं जैसे अभी-अभी पैदा हुए हैं, रात में सोने के लिए ऐसे जाते हैं, जैसे आप मरने वाले हैं। बीच के समय में आप वो करते हैं जो लोगों के लिये उपयोगी है। आप ये सब करते हैं क्योंकि अभी आप उस जगह नहीं पहुंचे हैं जहां आप बिना किसी गतिविधि, कार्य के रह सकें… आप को कुछ तो करना है।

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तो इसका मुख्य विचार यह है कि गतिविधि आप के बारे में नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो आप बंधनों में फंस जायेंगे। इसलिए आप लगातार ऐसी गतिविधि करते हैं जिसमें आप के बारे में कुछ नहीं है। आप इतना ज्यादा कार्य करते हैं कि जब आप सोने के लिये बिस्तर पर जायें तो आप के पास एक क्षण भी न हो… आप ऐसे गिरें जैसे मर गये हों। फिर सुबह आप पक्षियों से भी पहले उठ जाते हैं और काम में व्यस्त हो जाते हैं। बाकी सब कृपा संभाल लेती है।

आप को बहुत ज्यादा करने की जरुरत नहीं है, क्योंकि ‘ब्रह्मचारी’ बनाने के लिये हम आवश्यक ऊर्जा लगाते हैं। वैसे तो इसकी कोई ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। अगर वे बिलकुल कुछ न करें, तो वे वहां पहुंच जाएंगे। लेकिन पृथ्वी के गुण आपके अंदर काम करते हैं, क्योंकि आप शरीर को एक तरफ नहीं रख सकते। उसकी अपनी याददाश्त है, उसका अपना कर्मों का एक बड़ा ढेर है, इसलिए उसकी अपनी प्रवृत्तियां या रुझान हैं।

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