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नजरिया / जीवन में स्थिरता लाने का ये है सही तरीका

एक स्तर पर देखा जाए तो आध्यात्मिक प्रक्रिया का मतलब है पर्वत की तरह स्थिर हो जाना है। जब किसी इंसान का आधार बहुत स्थिर होता है, केवल तभी वह बहुत सारी चीजें कर सकता है। जीवन में आनंद तभी बिखर सकता है, जब उसमें पूर्ण स्थिरता हो। नहीं तो बहुत ज्यादा खुशी इंसान को पागलपन की ओर ले जा सकती है।

आपने देखा होगा बहुत सारे लोग, जो थोड़े रचनात्मक और थोड़े सक्रिय होते हैं, वह आखिर में जाकर असामान्य या कहें लगभग पागल से हो जाते हैं। दरअसल, स्थिरता के बिना आप नृत्य नहीं कर सकते। यही वजह है कि एक ही समय में शिव का मतलब स्थिरता और शिव का मतलब नृत्य दोनों है। एक ऐसा विस्फोट, जो विध्वंसक न हो, केवल तभी संभव है जब स्थिरता हो।

बुनियादी तौर पर अगर लोग जीवन में सामने की चीजों को भी नहीं देख पाते, तो उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि उन लोगों ने जीवन में बहुत सारी चीजों के साथ अपनी पहचान बना कर रखी है। यह पहचान शरीर के साथ शुरू होती है, फिर आगे जाकर उसमें कई और चीजें जुड़ जाती हैं। जैसे ही आप किसी चीज के साथ पहचान बनाते हैं, आपके पूरे मन को ये समझ आ जाता है, कि इसे सुरक्षित रखने की जरुरत है, और फिर वो पूरी तरह से उसकी सुरक्षा के लिए काम करने लगता है।

चीजों को खत्म करने की जरूरत नहीं

सदगुरु जग्गी वासुदेव इस बात को एक सटीक उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘मैं अपने देश के साथ, अपने धर्म के साथ और अपनी जाति के साथ पहचान कैसे खत्म करूं?’ पहचान खत्म करने के लिए आपको इन सारी चीजों को खत्म करने की जरूरत नहीं है। अगर आप अपने शरीर से अपनी पहचान खत्म कर लेते हैं तो बाकी पहचान अपने आप खत्म हो जाती हैं। हर चीज आपके शरीर की सीमित चारदीवारी के साथ आपकी पहचान का विस्तारित रूप है।

हम लोग स्थिरता के साथ-साथ उल्लास से भरे नृत्य की बात भी करते हैं। यह इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि उनके पास दो से ज्यादा आंखें थीं, तीन तो नहीं, लेकिन दो से ज्यादा आंखें जरूर थीं। इसका मतलब हुआ कि वह आम लोगों से कहीं ज्यादा देख सकते थे। चूंकि वे ज्यादा देख सकते थे, इसलिए स्थिर हो सकते थे।

अगर आप चीजों का एक ही हिस्सा देखेंगे तो आप स्थिर नहीं हो सकते। तो ये सारी कोशिश बेहतर देखने की है। दर्शन का मतलब देखना ही होता है। यह पूरी संस्कृति इसी के बारे में बात करती आई है। आप मंदिर कोई अर्ज़ी देने नहीं, बल्कि दर्शन के लिए जाते हैं, जिससे आप बेहतर देखने के क़ाबिल हो सकें।

जैसे ही आप अपने शरीर के साथ पहचान बनाते हैं, बाकी पहचान अपने आप बढ़ने लगती हैं। यह पहचान काफी तेजी से बढ़ती है। आप जो भी कर रहे हैं, उसमें आपको जितनी ज्यादा सफलता मिलती है, यह पहचान उतनी ही तेजी से गहराती जाती है। जैसे-जैसे यह पहचान बढ़ती है, आपका देखना उतना ही सीमित होता जाता है।

यह कचरा थोड़ा पवित्र हो सकता है

आपके मन की दुनिया में चल रहा नाटक बड़े से बड़े स्तर पर चला जाता है, और आपको कोई चीज देखने ही नहीं देता। आपके अपने विचार और भावनाएं आपको ख़ुद में डुबोए रखती हैं। अफसोस की बात है कि यह दुनिया लोगों को लगातार यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि जो कुछ आपके दिमाग में चल रहा है वह बहुत महत्वपूर्ण है। जबकि मैं लोगों को यह समझाने की कोशिश में लगा हुआ हूं कि आपके दिमाग में जो कुछ भी चल रहा है, वो कचरा है। यह कचरा थोड़ा पवित्र हो सकता है, लेकिन यह भी कचरा ही है, क्योंकि आपके दिमाग में न तो भगवान आ सकता है, न हीं शैतान, न ही देवदूत – वहां केवल विचार आ सकते हैं।

विचारों का आशय आपके मन में भरे पुराने कचरों से है, जो अब रिस रहे हैं। आपको अपने जीने और अस्तित्व के लिए इस बारे में सोचना होगा। लेकिन आपको किसी नई चीज के बारे में जानने के लिए सोचने की जरूरत नहीं है। आप को आत्म-ज्ञानी बनने के लिए सोचने की जरूरत नहीं है। अगर आप सोचेंगे तो क्या सोचेंगे?

आप केवल वही सोचेंगे जो आपके दिमाग में पिछली बातें भरी हुई हैं। हो सकता है कि उन्हीं को आप अलग-अलग तरीकों से सोचें। आपका कचरा चाहे जितने भी अलग-अलग तरीकों से सामने आए, उसकी जीवन में कोई अहमियत नहीं है। हो सकता है कि सामाजिक रूप से थोड़ी बहुत अहमियत हो। जब आप यह सुनते हैं कि ‘वह एक विचारशील नेता है।’ यदि आप उस नेता के बारे में जानते हैं तो सिर्फ आपका जवाब होता है, ‘ओह!’। यानी मेरे दिमाग में कोई विचार ही नहीं है।

बिना संतुलन के उल्लास देता है दुःख

अगर आपको हर चीज दिखाई दे रही है, साफ दिख रहा है, अगर आपकी दृष्टि में आप बाधा नहीं बन रहे हैं, अगर सिर्फ इतना ही हो जाए तो स्थिरता खुद आएगी। तब आपको उल्लास के लिए चिंता नहीं करनी होगी, क्योंकि वह जीवन की प्रकृति है। हर चीज उल्लास से भरी है। उल्लास को घटित होने के लिए स्थिरता की जरूरत होती है। वरना आप अपना उल्लास कम करते रहते हैं, क्योंकि बिना संतुलन के उल्लास दुःख देता है।

अगर आप संतुलन में नहीं है और आप बहुत तेजी से चलते हैं, तो आप खुद को चोट पहुंचाते हैं। फिर चाहे आप साइकिल चला रहे हों या इस ब्रम्हांड की सवारी कर रहे हों, अगर आप संतुलन से बाहर हैं और गति पकड़ लेते हैं तो उस स्थिति में आप खुद को बुरी तरह से नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए संतुलन बहुत जरूरी है।

जो संतुलन किसी चीज को कम करके या रोककर आए, वह संतुलन नहीं होता। एक तरह से यह एक पैकिज्ड मौत है। यह काफी शालीन और गरिमापूर्ण लगती है, क्योंकि मृत्यु हमेशा बहुत ही गरिमामय होती है, क्या आपने ये देखा है? मृत लोगों ने कभी कोई गलत व्यवहार नहीं किया। बुनियादी रूप से हर चीज का मूल नजरिए की स्पष्टता है, और यह स्पष्टता तब तक नहीं आती, जब तक कि आपके व आपके शरीर के बीच में एक दूरी नहीं होती। इस दूरी के न होने पर पहचानों के बढ़ने को रोका नहीं जा सकता।

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