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बड़ा सवाल / …तो क्या सकारात्मक सोच के साथ नकारात्मक रहना भी है जरूरी?

जब आप सकारात्मक सोच की बात कर रहे हैं तो, एक अर्थ में, आप वास्तविकता से दूर भाग रहे हैं। आप जीवन के सिर्फ एक पक्ष को देखना चाहते हैं और दूसरे की उपेक्षा कर रहे हैं। आप उस दूसरे पक्ष की उपेक्षा कर सकते हैं लेकिन वह आपको नजरअंदाज नहीं करेगा।

सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं कि सारी दुनिया में बहुत सारे लोग ‘सकारात्मक सोच’ के बारे में बात करते हैं। जब आप सकारात्मक सोच की बात कर रहे हैं तो एक अर्थ में आप वास्तविकता से दूर भाग रहे हैं। आप जीवन के सिर्फ एक पक्ष को देखना चाहते हैं और दूसरे की उपेक्षा कर रहे हैं। आप तो उस दूसरे पक्ष की उपेक्षा कर सकते हैं, लेकिन वो आप को नजरअंदाज नहीं करेगा।

अगर आप दुनिया की नकारात्मक बातों के बारे में नहीं सोचते तो आप एक तरह से मूर्खों के स्वर्ग (अवास्तविक दुनिया) में जी रहे हैं और जीवन आप को इसका सबक अवश्य सिखाएगा। मान लीजिए आकाश में गहरे काले बादल छाए हैं। आप उनकी उपेक्षा कर सकते हैं मगर वे ऐसा नहीं करेंगे। जब वे बरसेंगे तो बस बरसेंगे। आप को भिगोएंगे तो भिगोएंगे ही।

‘अगर आप जीवन को वैसा देखते हैं जैसा वह है तो वह हमेशा समान रूप से सकारात्मक और नकारात्मक होता है। यदि आप उसको वैसा ही देखें जैसा वह है तो कुछ भी आप पर हावी नहीं हो सकेगा, न सकारात्मकता न नकारात्मकता।’

आप इसे नजरअंदाज कर सकते हैं और सोच सकते हैं कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। इसकी थोड़ी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रासंगिकता हो सकती है पर अस्तित्व, वास्तविकता की दृष्टि से यह सुसंगत नहीं होगा। यह सिर्फ एक सांत्वना होगी। वास्तविकता से अवास्तविकता की ओर बढ़ते हुए, आप अपने आप को सांत्वना, धीरज दे सकते हैं।

इसका कारण यह है कि आप को कहीं पर ऐसा लगता है कि आप वास्तविकता को संभाल नहीं सकते और शायद आप नहीं ही संभाल सकते, अतः आप इस सकारात्मक सोच के वशीभूत हो जाते हैं कि आप नकारात्मकता को छोड़ना चाहते हैं और सकारात्मक सोचना चाहते हैं। या, दूसरे शब्दों में कहें तो आप नकारात्मकता से दूर जाना, उसका परिहार करना चाहते हैं।

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आप जिस किसी चीज का परिहार करना चाहें, वही आप की चेतना का आधार बन जाती है। आप जिसके पीछे पड़ते हैं, वह आप की सबसे ज्यादा मजबूत बात नहीं होती। आप जिससे दूर जाना चाहें वो ही आप की सबसे मजबूत बात हो जाएगी। वो कोई भी, जो जीवन के एक भाग को मिटा देना चाहता है और दूसरे के ही साथ रहना चाहता है, वह अपने लिए सिर्फ दुःख ही लाता है।

‘यदि आप जीवन को वैसा देखना नहीं चाहते जैसा वह है तो फिर आप इस बारे में कुछ भी नहीं कर सकते, एक कदम भी नहीं चल सकते। आप कुछ भी नहीं कर सकेंगे। आप सिर्फ मानसिक रूप से मजेदार बातें करेंगें जो थोड़ी देर आप का मनोरंजन तो करेंगी, लेकिन आप को कहीं ले नहीं जाएंगीं।’

सारा अस्तित्व ही द्वंद्वों के बीच होता है। आप जिसे सकारात्मक और नकारात्मक कहते हैं, वो क्या है? पुरुषत्व और स्त्रीत्व, प्रकाश और अंधकार, दिन और रात। जब तक ये दोनों न हों, जीवन कैसे होगा? यह कहना वैसा ही है जैसे आप कहें कि आप को सिर्फ जीवन चाहिए, मृत्यु नहीं।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। मृत्यु है इसीलिए जीवन है। अंधेरा है इसीलिए प्रकाश है। बात ये है कि आप नकारात्मकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहते। आप दोनों को रहने दें और फिर देखें कि कैसे दोनों का ही उपयोग कुछ अच्छा बनाने में आप कर सकते हैं।

अगर आप जीवन को वैसा देखते हैं जैसा वह है तो वह हमेशा समान रूप से सकारात्मक और नकारात्मक होता है। यदि आप उसको वैसा ही देखें जैसा वह है तो कुछ भी आप पर हावी नहीं हो सकेगा, न सकारात्मकता न नकारात्मकता। चूंकि वे दोनों समान प्रमाण में हैं इसीलिये वह सब उस ढंग से हो रहा है जैसे वो हो रहा है। आप को दोनों का उचित उपयोग करते हुए वह सब बनाना है जो आप बना सकते हैं।

प्रकाश का बल्ब इसलिए जलता है, प्रकाश देता है क्योंकि बिजली में धनात्मकता और ऋणात्मकता दोनों हैं। बिजली बहना, प्रकाश होना, ये सकारात्मक बात हो रही है अतः हम ऋणात्मकता की चिंता नहीं करते। जब एक स्त्री और पुरुष मिल कर आनंद की अनुभूति कराते हैं तो हम चिंता नहीं करते कि पुरुष है या स्त्री। अगर ये बहुत सारी समस्याएं लाने लगें, नकारात्मक परिणाम देने लगें तो फिर हम उन्हें एक समस्या के रूप में देखते हैं। सकारात्मकता या नकारात्मकता अपने आप में कोई समस्या नहीं हैं। उनसे आप को क्या परिणाम मिल रहे हैं, वह महत्वपूर्ण है।

आप को सकारात्मकता या नकारात्मकता का विरोध नहीं करना चाहिए, आप को इन दोनों में से एक सकारात्मक परिणाम लाना चाहिए, जो आप की योग्यता पर निर्भर है। अगर हम इस जीवन के बारे में विचारशील हैं तो यह अधिक महत्वपूर्ण है कि हम उस बारे में सत्यवादी हों जो हम वास्तव में हैं।

तब ही हम एक यात्रा पूरी कर सकते हैं। सकारात्मक सोच के आग्रह के कारण पहले ही बहुत सी संभावनाओं को लोगों ने नष्ट कर दिया है। सकारात्मक सोच कुछ ऐसी है जो एक सकारात्मक सोचने वाले की इस कविता में है…

यदि आप जीवन को वैसा देखना नहीं चाहते जैसा वह है तो फिर आप इस बारे में कुछ भी नहीं कर सकते, एक कदम भी नहीं चल सकते। आप कुछ भी नहीं कर सकेंगे। आप सिर्फ मानसिक रूप से मजेदार बातें करेंगें जो थोड़ी देर आप का मनोरंजन तो करेंगी, लेकिन आप को कहीं ले नहीं जाएंगीं।

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