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आत्म ज्ञान / ध्यान करते समय ऐसे करें ‘मन पर नियंत्रण’

अध्यात्म की राह पर चलने वाले खास कर इस बात से परेशान रहते हैं कि उनका मन बहुत भटकता है। मन में उठने वाले तरह-तरह के विचार उन्हें परेशान करते हैं। तो अपने मन में उठने वाले विचारों पर नियंत्रण कैसे किया जाए? यह जानना बेहद जरूरी है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं जब आप क्रिया कर रहे होते हैं तो आप इस बात की परवाह नहीं करते कि आपकी किडनी काम कर रही है या नहीं, आपका दिल धडक़ रहा है या नहीं। शरीर के भीतर होने वाली बाकी दूसरी क्रियाओं की भी आपको कोई परवाह नहीं होती। लेकिन आप यह जरुर चाहते हैं कि आपका मन काम न करे। कई लोगों की यह धारणा होती है कि अगर आप कुछ आध्यात्मिक काम कर रहे हैं तो आपके मन को काम करना बंद कर देना चाहिए। यह धारणा बिल्कुल गलत है।

क्या है विचारों और आत्म-ज्ञान की प्रकृति?

आपके विचार गंध की तरह हैं वे या तो खुशबूदार हैं या उनमें से बदबू आती है यह उस पर निर्भर करता है कि आपके भीतर क्या बसा है। कुछ भी नया नहीं उगता। अगर आप अपने भीतर जमा उस चीज़ को अपने दिमाग में नहीं जाने देते, तो दिमाग अद्भुत रूप में काम करेगा। यह ऐसे काम भी कर सकता है, जिनकी आपने कभी कल्पना तक नहीं की थी। अभी तो यह आपके ही अपने कचरे से भरा है यही तो संघर्ष है, तभी तो आप इसे रोकना चाहते हैं।

यह दिमाग आपके जीवन का ताज बनने की बजाए, आपके जीवन में कचरे का डिब्बा बन गया है। जबकि भौतिक रूप से, यह आपका ताज है। योग के प्रतीक के रूप में, सहस्रार को एक हजार पंखुड़ियों वाले कमल के समान माना जाता है ‘एक हजार’ को शाब्दिक अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए, पर यह कुछ ऐसा है जो असंख्य है। अगर आपका मस्तिष्क किसी तरह अस्तित्वपरक प्रक्रिया से जुड़ जाता, तो असंख्य संभावनाएं आपके सामने आ जातीं।

शिक्षा और आत्म-ज्ञान के बीच क्या है अंतर

शिक्षा और आत्म-ज्ञान के बीच भी केवल यही अंतर है। आप स्वयं को एक, दस  पुस्तकों के साथ शिक्षित कर सकते हैं, पर कहीं न कहीं यह पुस्तकें समाप्त होंगी। आत्म ज्ञान पाने का अर्थ है कि आपने स्वयं को पुस्तकों के माध्यम से शिक्षित नहीं किया। आप केवल वहां उपस्थित रहे और यह एक अंतहीन प्रक्रिया है।

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