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आस्था / यहां हैं वो स्थान जहां होता है ईश्वर से साक्षात्कार

मन से दूर रहकर निराकार ईश्वर की आराधना या ध्यान करने के स्थान को मंदिर कहते हैं। हम मंदिर के बाहर जूते-चप्पल उतारकर प्रवेश करते हैं, उसी तरह मन और अहंकार को भी बाहर छोड़ दिया जाता है। मंदिर में जहां देवताओं की पूजा होती है उसे ‘देवरा’ या ‘देव-स्थल’ कहा जाता है। जहां प्रार्थना होती है, उसे प्रार्थनालय कहते हैं। वेदों के जानकार मानते हैं कि भगवान पूजा की अपेक्षा, प्रार्थना से प्रसन्न होते हैं।

मंदिर में प्रार्थना करने की सबसे बेहतर जगह है प्रार्थनास्थल, ये प्रार्थना स्थल मंदिर में देवी-देवता की मूर्ति के ठीक सामने होते हैं। जहां से निरंतर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह आपकी ओर बहता रहता है और जब हम ध्यान यानी प्रार्थना की अवस्था में होते हैं, तो यही ऊर्जा आपके अंदर प्रवेश कर उस परमशक्ति से आपका साक्षात्कार करवाती है, लेकिन यह तभी संभव है जब शरीर की पांचों इंद्रियां सक्रिय हों।

अगम शास्त्र के दिव्य नियम

मंदिर बनाने के लिए हमेशा से ही ऐसा स्‍थान चुना जाता रहा है, जहां सकारात्‍मक ऊर्जा का भंडार हो। एक ऐसा स्‍थान जहां उत्‍तरी छोर की ओर से स्‍वतंत्र चुंबकीय और विद्युत तरंगों का प्रवाह हो। अमूमन ऐसे ही स्‍थान का चयन करके विधिवत मंदिर का निर्माण करवाया जाता है, ताकि लोगों के शरीर में ज्यादा से ज्यादा सकारात्‍मक ऊर्जा का संचार हो।

मंदिर में भगवान की मूर्ति को गर्भगृह में या मंदिर के बिल्‍कुल मध्‍य स्‍थान पर स्‍थापित की जाती है। यह स्थान सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र होता है। भारत में मंदिरों का निर्माण अगम शास्त्र में दिए गए नियमों को ध्यान में रखकर किया गया है। अगर आप स्वास्थ्य चाहते हैं तो आप एक खास मंदिर में जाएंगे और आप भौतिकता चाहते हैं, तो दूसरे मंदिर में जाएंगे हर एक मंदिर का निर्माण जीवन के अनेक पहलुओं को संबोधित करने के लिए किया गया है। इन मंदिरों में शिवलिंगों की प्रतिष्ठा संभंवतः एक या दो चक्रों को लेकर की गई है और उसी के अनुसार लोगों को लाभ भी प्राप्त होते हैं।

ऐसे रखी गई ध्यानलिंग मंदिर की नींव

सदियों से बुद्ध पुरुषों ने एक ऐसा सपना देखा कि पृथ्वी पर एक ऐसा शिवालय होना चाहिए जहां सात चक्रों वाला शिवलिंग हो और सभी चक्रों तक प्राण प्रतिष्ठा की गई हो यानी एक ‘ध्यानलिंग मंदिर’। एक ऐसा मंदिर बनाना जो दूसरे मंदिर बनाने की तुलना में सबसे ज्यादा जटिल काम है और ये काम इतना कठिन है कि कभी हो ही नहीं पाया था।

लगभग 1000 साल पहले मध्यप्रदेश के भोजपुर नामक स्थान में इस तरह का ध्यानलिंग बनाने का सबसे नजदीकी प्रयास किया गया था, लेकिन निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी थी। अब केवल एक ऐसा स्थान है जहां ध्यानलिंग मौजूद है। यह वेल्लिंगिरी पहाड़ी पर मौजूद है। जहां इसकी स्थापना आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने की। दरअसल, ध्यानलिंग मंदिर एक योगी मंदिर है जो कोयम्बटूर, तमिलनाडु से 30 किमी दूर स्थित है। मंदिर को 24 जून, 1992 में सद्गुरु जग्गी वासुदेव द्वारा पवित्र किया गया था।

मंदिर में ध्यान के अनुकूल बनाता वातावरण

मंदिर में प्रज्वलित होते दीपक, ऊष्मा का संचार करते हैं और ये शंख-घंटियां की ध्वनि के जरिए मन में प्रवेश करते हैं। मंत्रोच्चार से एक ब्रह्मांडीय नाद बनता है जो मन और मस्तिष्क को नियंत्रित कर ध्यानपूर्ण बना देता है। मंदिर में मंत्रमुग्ध हो जाने के यही कारण हैं। इसके अलावा मंदिरों में तांबे के एक पात्र में तुलसी और कपूर-मिश्रित जल भरा होता है, जिसका सेवन करने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, वहीं इससे ब्रह्म-रन्ध्र में शांति मिलती है।

मंदिर में ऊंचे शिखर होते हैं। शिखर की भीतरी सतह से सकारात्मक ऊर्जा की तरंगे टकराकर व्यक्ति के ऊपर पड़ती हैं। ये परावर्तित तरंगें मानव शरीर की आवृत्ति बनाए रखने में सहायक होती हैं। इस तरह मनुष्य असीम सुख का अनुभव करता है।

इसका सबसे जीवंत उदाहरण है मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित ‘महाकाल मंदिर’ जहां महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के गर्भगृह में यह सब कुछ आप महसूस भी कर सकते हैं। उज्जैन का महाकाल मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है। ऐसे सकारात्मक ऊर्जा के केंद्र पर जब व्यक्ति मंदिर में नंगे पैर जाता है, तो इससे उसका शरीर अर्थ हो जाता है और उसमें एक ऊर्जा प्रवाह दौड़ने लगती है। वह व्यक्ति जब ज्योतिर्लिंग के सामने हाथ जोड़ता है, तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है।

जब वह व्यक्ति सिर झुकाता है तो ज्योतिर्लिंग से परावर्तित होने वाली पृथ्वी और आकाशीय तरंगें मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तिष्क पर मौजूद आज्ञा चक्र पर असर डालती हैं। इससे शांति मिलती है और सकारात्मक विचार आते हैं। यही आध्यात्मिक ऊर्जा है, जिसे महसूस भी किया जा सकता है।

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