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जिज्ञासा / जीवन की अनिश्चितताओं के लिए खुद को इस तरह करें तैयार

यदि आप अपने प्रश्नों को जीवित रखते हैं तो आप स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिक जिज्ञासु हैं। आप किसी प्रश्न को बिना उत्तर जाने कैसे छोड़ सकते हैं? आप के जीवन के बारे में कोई भी प्रश्न हो, उसका जवाब मिलना ही चाहिए। आप का मन और आप की बुद्धि इन्हें जीवित नहीं रख पाएगें। कुछ समय बाद ये आपके साथ चालाकी करेगा, आप जानते हैं। आप दस साल की उम्र में जैसे थे, उसकी तुलना में अब आप ज्यादा चालाक हो गए हैं।

आध्यात्मिक प्रक्रिया का अर्थ यह है कि आप जिज्ञासु बन गए हैं, और समाधान खोज रहे हैं। एक धार्मिक व्यक्ति का मतलब है कि वह सिर्फ विश्वास कर लेने वाला व्यक्ति है। दुर्भाग्यवश, आज तो शिक्षाविद् और वैज्ञानिक भी विश्वास करने वाले बनते जा रहे हैं, लेकिन एक विद्यार्थी का आध्यात्मिक जिज्ञासु होना बिलकुल सही जुगलबंदी है, क्योंकि कोई भी चुस्त जीवन एक स्वाभाविक आध्यात्मिक जिज्ञासु होता है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं दुर्भाग्यवश, जब तक आप तीस साल के हो जाएंगे, आप और भी ज्यादा चालाक बन जाएंगे। आप यह भी कहना शुरू कर देंगे, ‘ईश्वर ने ये सारा ब्रह्माण्ड बनाया है’। जब कि आप को कुछ भी मालूम नहीं है।

युवावस्था में आप को खुद को ऐसे तैयार करें कि आप अनिश्चितताओं को संभाल सकें। इसके लिए आप को एक आध्यात्मिक प्रक्रिया की जरूरत है। सामान्य रूप से, इस दुनिया में, लोग यह समझते हैं कि जब आप वयस्क हैं तो आप सब कुछ जानते हैं जो आप नहीं जानते। एक वयस्क व्यक्ति ऐसा ही नाटक करता है कि वह सब कुछ जानता है, जो वास्तव में वह नहीं जानता, लेकिन मैं चाहता हूं कि आप इस तरह से रहें कि, ‘मैं जो जानता हूं, जानता हूं, जो नहीं जानता, वो नहीं जानता’।

आप की उम्र में आप को पर्याप्त शारीरिक और आध्यात्मिक साधना करनी चाहिये, जिससे सही समय आने पर जब जीवन आप को कुछ करने का अवसर दे, तो आप का शरीर और मन रूकावट न बने। अपनी मृत्यु शैय्या पर भी आप को बहुत सी बातें पता नहीं होंगीं। क्या यह ठीक है, या आप सिर्फ अपनी मान्यताएं बनायें रखेंगे?

बहुत सारे लोग जो सारी ज़िन्दगी नास्तिक रहते हैं, मृत्यु पास आने पर प्रार्थना करना शुरू कर देते हैं। वे अब कुछ निश्चिततायें चाहते हैं, लेकिन आध्यात्मिक प्रक्रिया का अर्थ है कि आप अनिश्चिततओं का उत्सव मनायें। हम जानते हैं कि ये जीवन अनिश्चित है, और हम यह प्रयास कर रहे हैं कि अनिश्चितताओं को संभालने के लिये हम अपने आप को तैयार करें, बजाय इसके कि हम निश्चितता की एक झूठी समझ बनाएं।

सभी लोग ऐसे ही निश्चितता का एक झूठा दिलासा देते हैं। ‘अरे, ईश्वर है, तुम चिंता मत करो, ईश्वर सब कुछ ठीक कर देगा’, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। आप ने जो ठीक किया, वो ठीक हुआ और जो ठीक से नहीं किया, वहां गड़बड़ हो गयी। लेकिन अनिश्चिततायें इतनी ज्यादा हैं कि हम चाहे सब कुछ ठीक करें, कल सुबह हम मर सकते हैं। ऐसा संभव है।

अनिश्चितताओं से भरा यह ब्रह्मांड, आप को जीवन में अनिश्चितताओं को संभालने के लिए निश्चितता का झूठा दिलासा दिए बिना, आशा, विश्वास एवं विचारधाराओं के साथ तैयार करेगा। निश्चितता की कुछ ख़ास समझ लाने के लिए आप अपनी सीमाओं को काटना, कम करना शुरू कर देंगें। लोग अपने आप को ज्यादा से ज्यादा छोटा बनाना शुरू कर देते हैं क्योंकि जगह जितनी छोटी होती है, निश्चितता उतनी ही ज्यादा होती है।

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आप अगर अपने कमरे में ही रहते हैं तो वहां 90% बातें आप की इच्छा के अनुसार ही होंगी, बाकी की 10% तिलचट्टे, झिंगुर और अन्य जीव अपनी चीज़ें करेंगे, लेकिन अगर आप अपना इलाका सारे नगर को बना लेते हैं तो 50% आप के अनुसार होगा और बाकी 50% अनिश्चित। अगर आप सारे संसार को अपना लें तो 10% भी आप के हिसाब से नहीं होगा और 90% से ज्यादा अनिश्चित ही होगा।

निश्चितता की खोज करने के लिए युवावस्था सही समय नहीं है। इस समय तो आप को अपने आप को अनिश्चितताओं को संभालने के लिए तैयार करना चाहिए। इसके लिए आप को एक आध्यात्मिक प्रक्रिया की ज़रूरत है।

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