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संस्कृति / हम सदियों से क्यों मना रहे हैं ‘गुरु पूर्णिमा’ उत्सव

जून-जुलाई महीनों में आने वाले भारतीय आषाढ़ माह की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। गुरु पूर्णिमा वह दिन है जब पहले गुरु का जन्म हुआ था यानी भगवान शिव, यौगिक संस्कृति में शिव को भगवान नहीं माना जाता, उन्हें आदि योगी यानी पहले योगी की तरह देखा जाता है। गुरु पूर्णिमा, वो पूर्णिमा का दिन है, जिस दिन पहले योगी ने खुद को आदि गुरु, यानी पहले गुरु के रूप में बदल लिया था।

यह वर्ष का वो समय है, जब 15000 वर्षों से भी पहले, उनका ध्यान उन महान सप्तऋषियों की ओर गया जो उनके पहले शिष्य बने। उन्होंने 84 वर्षों तक कुछ सरल तैयारियाँ की थीं। फिर जब संक्रांति, गर्मियों की संक्रांति से सर्दियों की संक्रांति में बदली, यानि जब पृथ्वी के संबंध में सूर्य की गति उत्तरी गति से दक्षिणी गति में बदली, जिसे इस परंपरा में उत्तरायण और दक्षिणायन कहते हैं, उस दिन आदियोगी ने सप्तऋषियों की ओर देखा और उन्होंने यह महसूस किया कि वे जानने की अवस्था के पात्र बन गये थे, और वे उन्हें और ज़्यादा अनदेखा नहीं कर पाए।

आदियोगी उन्हें ध्यान से देखते रहे, और जब अगली पूर्णिमा आई तो उन्होंने गुरु बनने का फैसला किया। उसी पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। उन्होंने अपना मुख दक्षिण की ओर कर लिया और सात शिष्यों को यौगिक विज्ञान प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू हो गई।

वह दिन जब प्रथम गुरु का जन्म हुआ

यौगिक विज्ञान बस शरीर को मोड़ना, झुकाना या बस सांस रोकना नहीं है। ये तो मानवीय तंत्र की तांत्रिकी को समझने का, इसे विघटित करने का और फिर से एकत्रित करने का विज्ञान है। सृष्टि के स्रोत तथा अस्तित्व का लोगों का जो बोध है या फिर लोग जिस तरह से इसे समझते हैं, उसे आदियोगी एक नए आयाम में ले गए।

उन्होंने अपने आप को सृष्टि और सृष्टि के स्रोत के बीच पुल बना लिया। उन्होंने कहा, ‘तुम अगर इस मार्ग पर चलोगे तो तुम्हारे और जिसे तुम सृष्टिकर्ता कहते हो, उसके बीच कोई अंतर नहीं रहेगा’। ये सृष्टि से सृष्टिकर्ता तक की यात्रा है।

आदियोगी जब बोल रहे थे तो वे धर्म, दर्शन शास्त्र या कट्टर सिद्धांतों के बारे में नही बता रहे थे। वे एक विज्ञान समझा रहे थे – एक वैज्ञानिक पद्धति स्पष्ट कर रहे थे जिसके द्वारा आप उन सीमाओं को तोड़ सकते हैं जिनमें प्रकृति ने मनुष्य जीवन को सीमित किया है।

शुरुआत में, हमारी बनायी हुई प्रत्येक सीमा का उद्देश्य अपनी सुरक्षा होता है। हम अपने घर के चारों ओर एक दीवार इसी सुरक्षा के लिये बनाते हैं। लेकिन जैसे जैसे आप ये दीवार बनाने के कारणों के प्रति अपनी जागरूकता खो देते हैं, वैसे वैसे, सुरक्षा की ये दीवार आप के लिये कैद की दीवार भी बन जाती है। ये दीवारें किसी एक प्रकार की नहीं होती, उनके कई जटिल रूप बन गए हैं।

आदियोगी की पद्धतियों का उत्सव

शिव का कार्य था जागरूकता के वे साधन देना जो आप को इन सीमाओं के परे ले जायें, ऐसे साधन जो आप को अपनी सुरक्षा के किले की दीवारें तब तक रखने दें, जितनी आवश्यकता है और जब ज़रूरत न हो तो आप उन्हें मिटा सकें।

तो ऐसा जादुई सुरक्षा किला कैसे बनाएं, जो केवल आप के लिये खतरनाक सिद्ध होने वाली शक्तियां ही देख सकें, पर आप खुद उसे न देख सकें? यही आदियोगी का कार्य था। प्रकृति के ही मूल, भ्रामक स्वभाव का उपयोग करते हुए, उन्होंने ऐसे कई आश्चर्यजनक, अतुल्य तरीके बताये जिनसे आप ऐसे जादुई किले अपने चारों ओर बना सकें जिनसे हो कर आप तो आसानी से गुजर जायें पर कोई शत्रु उन्हें भेद न सके। गुरु पूर्णिमा इसी उत्सव को मनाती है, जिससे पहली बार मानवता के लिये एक अत्यंत जटिल और अद्भुत बात की शुरुआत हुई।

इसी दिन, मानवता के इतिहास में पहली बार, मनुष्यों को याद दिलाया गया था कि उनका जीवन पहले से तय नहीं है। अगर वे प्रयास करने के लिये तैयार हैं, तो अस्तित्व का प्रत्येक दरवाजा उनके लिये खुला हुआ है।

जाति या पंथ के भेदभाव से परे उत्सव

तो यह दिन पूरी मानव जाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। हमारे देश में कुछ समय पहले तक ऐसा ही माना जाता था। देश में गुरु पूर्णिमा सबसे महत्वपूर्ण उत्सवों, पर्वों में से एक था। लोग इसको जाति या पंथ के किसी भी भेदभाव के बिना मनाते थे, क्योंकि इस देश में धन, संपत्ति सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं थे।

ज्ञान प्राप्त करना या जानना सबसे अधिक मूल्यवान समझा जाता था। समाज में शिक्षक या गुरु को सर्वोच्च सत्ता का दर्जा दिया जाता था क्योंकि जानना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। लेकिन फिर कुछ कारणों से हमने, जानने की बजाय अज्ञानता को महत्व दिया और पिछले 65 वर्षों में गुरु पूर्णिमा का महत्व इसलिए भी कम हो गया है क्यों कि भारत सरकार ने इस दिन को छुट्टी घोषित नहीं की है।

भारत में अंग्रेजों के आने से पहले अमावस्या के आसपास तीन दिन का और पूर्णिमा के आसपास दो दिन का अवकाश रहता था। तो महीने में आप के पास 5 दिन होते थे जब आप मंदिर जाते थे और अपनी आंतरिक खुशहाली के लिये काम करते थे। जब अंग्रेज़ आए तो उन्होंने रविवार को अवकाश का दिन बना दिया।

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