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आस्था / श्री गणेश को इस तरह करें प्रणाम, छिपा है ये वैज्ञानिक कारण

यदि किसी की बुद्धि को खास तरह से काम करना है तो उसके भीतर जड़ता (अचेतनता/मूर्खता) कम से कम होनी चाहिए। यह जड़ता कितनी कम है, इससे ये तय होता है कि उस व्यक्ति के मन और बुद्धि की एकाग्रता और तीव्रता कैसी होगी। इस आधार पर हमारे विद्वान पूर्वजों द्वारा परंपराएं और नियम बनाए गए, जिन्हें आप जीवन-आचरण कह सकते हैं।

ये अभ्यास, आध्यात्मिक अभ्यास से अलग थे, ये दैनिक जीवन के कामकाज से जुड़े थे, जैसे, कैसे बैठें, कैसे खड़ें हों, कैसे खाएं, क्या खाएं, क्या नहीं खाएं, आप जो भी खाते हैं, उसे कैसे खाएं, उसे किसके साथ खाएं, उसमें आप क्या मिलाएं और क्या न मिलाएं आदि।

निश्चित तौर पर इनका वैज्ञानिक आधार है। समय के साथ इनमें से ज्यादातर नियम बढ़-चढ़ कर अजीबोगरीब हालत तक पहुंच गए, जिन पर गौर किए जाने की जरूरत है। लेकिन इनमें से ज्यादातर नियम इंसान की बौद्धिक क्षमताओं को बढ़ाने की वैज्ञानिक प्रक्रियाएं हैं।

उदाहरण के लिए अगर आप आज भी देखें कि जब लोग मंदिर, खासकर गणपति मंदिर जाते हैं तो वहां भगवान के सामने लोग अपने दोनों हाथों से उलटे कानों को दाहिने हाथ से बाएं कान को और बाएं हाथ से दाहिने कान को पकड़कर उठक-बैठक लगाते हैं। हालांकि समय के साथ यह आंडबर का रूप लेता गया, लेकिन अगर आप इसे ठीक तरीके से करेंगे तो इसका असर होता है।

‘जब आप कुछ बोल कर लिखवाना शुरू करें तो आप बीच में एक पल के लिए भी नहीं रुकेंगे, अगर आप बीच में रुक गए तो मैं फिर आगे आपके लिए काम नहीं करूंगा।’

आज इसे लेकर बहुत सारे अध्ययन हुए हैं, खासकर येल यूनिवर्सिटी ने इसे लेकर काफी अध्ययन करके यह दिखाने की कोशिश की है कि अगर आप इस तरह से कानों को पकड़ेंगे और इस दौरान कोई गतिविधि को तेजी से करेंगे तो दाएं और बांए दिमाग में आपस में संचार काफी बढ़ जाएगा।

आपको एक बात समझनी होगी कि यह प्रक्रिया गणपति के सामने की जाती है। गणपति बुद्धि के मामले में सबसे तेज व योग्य समझे जाते हैं। वह इतने बुद्धिमान माने जाते हैं कि देश के तमाम पुराण और ग्रंथ उन्हीं के द्वारा लिखे हुए माने जाते हैं।

जब उन्होंने लिखना शुरु किया तो उन्होंने लिखवाने वाले लोगों को चुनौती दी और कहा, ‘जब आप कुछ बोल कर लिखवाना शुरू करें तो आप बीच में एक पल के लिए भी नहीं रुकेंगे, अगर आप बीच में रुक गए तो मैं फिर आगे आपके लिए काम नहीं करूंगा।’

दरअसल, उनके ऐसा कहने के पीछे भाव था कि वह सामने वाले से एक खास स्तर की बुद्धिमानी की अपेक्षा कर रहे थे। एक तरह से वह कहना चाहते थे कि मैं बेवकूफों के साथ काम नहीं करूंगा।

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