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समाधान / रिश्तों को बिखरने से कुछ इस तरह बचाएं

आधुनिक समय यानी हर व्यक्ति और उसकी आकांक्षाएं तेजी से बदल रही हैं। इसका सीधा असर हमारे रिश्तों पर पढ़ता है, वो रिश्ते जो सदियों से हमें जोड़े रखे हुए हैं। दुख में, सुख में और जैसा भी समय हो यह साथ रहते हैं। जैसे कि प्रेम का रिश्ता क्योंकि प्रेम कोई ऐसी चीज नहीं है जो आप करते हैं। प्रेम ऐसी चीज है, जिसमें आप होते हैं।

अगर आप दो लोगों में समानता ढूंढ रहे हैं, तो वह रिश्ता हमेशा टूट जाएगा। आखिरकार एक पुरुष और एक स्त्री इसीलिए साथ आते हैं क्योंकि वे अलग हैं। यह फर्क ही आपको साथ ले कर आया है और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, यह फर्क अधिक स्पष्टता से उभर कर सामने आ सकता है। अगर आप इस अंतर का आनंद लेते हुए आगे बढ़ना नहीं सीखेंगे, तो स्वाभाविक रूप से रिश्ते में दूरी आएंगी।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, ‘हमें समझना चाहिए कि रिश्ते कुछ जरूरतों की वजह से बनते हैं शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक जरूरतों की वजह से। चाहे रिश्ता कैसा भी हो, बुनियादी पहलू यह है कि आपको अपनी कोई जरूरत पूरी करनी है। क्योंकि इंसान अपने अंदर एक खास तरह की अपूर्णता व अधूरापन महसूस करता है। यही अपूर्णता उसके रिश्तों की बुनियाद है।

जब टूट जाती हैं उम्मीद

अमूमन देखा गया है कि जितना ज्यादा द्वंद आज घर के भीतर देखने को मिलता है, उतना दुनिया में कहीं नहीं मिलता। बस गनीमत इतनी है कि बमबारी नहीं हो रही है! इसका कारण है उम्मीद, हमने एक दूसरे से उम्मीद इतनी ज्यादा रखी है कि यह सब कुछ देखने को मिल ही जाता है। खासकर पुरुष और स्त्री के संबंधों में उम्मीदें इतनी ज्यादा हैं कि अगर आपकी शादी किसी देवी या देवता से भी हो गई तो भी वह असफल ही साबित होगी।

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ऐसा ही सार्वजनिक तौर पर होता है। जो लोग हमारी उम्मीदों के अनुसार नहीं होते, वे हमें बेवकूफ दिखाई देते हैं। आप इस बात को मत भूलिए कि इसी कारण से आपको भी बेवकूफ के रूप में देखने वाले सौ लोग होंगे।

सब कुछ परिवर्तनशील है इसे अनुभव करो

ओशो कहते हैं, ‘परिवर्तन के द्वारा परिवर्तन को विसर्जित करो।’ बुद्ध कभी दूसरा हिस्‍सा नहीं कहते। यह दूसरा हिस्‍सा बुनियादी रूप से तंत्र से आया है। बुद्ध इतना ही कहेंगे। कि सब कुछ परिवर्तनशील है इसे अनुभव करो और तुम्‍हें आसक्‍ति नहीं होगी और जब आसक्‍ति नहीं होगी तो धीरे-धीरे अनित्‍य को छोड़ते-छोड़ते तुम अपने केंद्र पर पहुंच जाओगे। जो नित्‍य है। शाश्‍वत है। परिवर्तन को छोड़ते जाओ और तुम अपरिवर्तन के केंद्र पर, चक्र के केंद्र पर पहुंच जाओगे।

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गौतम बुद्ध ने चक्र को अपने धर्म का प्रतीक बनाया है। क्योंकि चक्र चलता रहता है, लेकिन उसकी धुरी जिसके सहारे चक्र चलता है, ठहरी रहती है। वह स्‍थाई है, लेकिन चलती रहती है। इसी तरह संसार चक्र चलता रहता है। तुम्‍हारा व्‍यक्‍तित्‍व ‘चक्र’ की भांति बदलता रहता है। ऐसा ही रिश्तों में हैं, धुरी यानी आप स्थिर हैं। आपसे रिश्ते जुड़ते जाएंगे, लेकिन यह आप पर निर्भर है उन रिश्तों को आप बेहतर तरीके से कैसे निभा सकते हैं और एक दिन इन्हीं रिश्तों के बीच जीवन यापन करते हुए आप पंचतत्व में विलीन हो जाओगे।

बात उतनी ही पुरानी है जितनी कि ये पहाड़ियां

रिश्तों के बारे में जे कृष्णमूर्ति कहते हैं, ‘जब आप खुद को ही नहीं जानते, तो प्रेम व संबंध को कैसे जान पाएंगें? हम रूढ़ियों के दास हैं। भले ही हम खुद को आधुनिक समझ बैठें, मान लें कि बहुत स्वतंत्र हो गए हैं, परंतु गहरे में देखें तो हम रूढ़िवादी हैं, इसमें कोई संशय नहीं है क्योंकि छवि-रचना के खेल को आपने स्वीकार किया है और परस्पर संबंधों को इन्हीं के आधार पर स्थापित करते हैं। यह बात उतनी ही पुरानी है जितनी कि ये पहाड़ियां। यह हमारी एक रीति बन गई है। हम इसे अपनाते हैं, इसी में जीते हैं और इसी से एक दूसरे को यातनाएं देते हैं। तो क्या इस रीति को रोका जा सकता है?’

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आप कई रिश्तों से जुड़े होते हैं। अगर आप यह तुलना करें कि किसी से शारीरिक जुड़ाव और भावात्मक जुड़ाव में से कौन अधिक समय तक टिकता है, तो आप पाएंगे कि भावात्मक जुड़ाव की अवधि अधिक होती है और जब भावनात्मक रूप से किसी से भी आप जुड़ते हैं तो यह रिश्ते कभी नहीं बिखरते हैं। बिखरते रिश्तों को बचाने का इससे बेहतर कोई उपाय नहीं।

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