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चिंतन / शून्य में शिव तत्व का रहस्य जानने की ये है प्रक्रिया

जब तक आप अपना आत्म साक्षात्कार नहीं करते, तब तक अपनी आत्मा को नहीं पहचान सकते हैं। खुद को जान लेने के बाद ही आप शिव तत्व को जान सकते हैं। खुद को जानना है तो आपको योग, ध्यान, भक्ति और अध्यात्म की शरण में जाना होगा।

हर व्यक्ति दुनिया में खुद के अस्तित्व को समझने के लिए प्रयास करता है, जो नहीं करते वो एक तरह के भ्रम में जिंदा है। विज्ञान भी पूरे जोर-शोर अस्तित्व जानने की कोशिश करता रहा है। लेकिन हमारे देखने, सुनने स्पर्श करने की शक्तियां और यहां तक मन भी सिर्फ भौतिक चीज़ों को ही समझ पाता है। हमारे द्वारा बनाया गया कोई भी उपकरण भी सिर्फ भौतिक चीज़ों को समझ सकता है, तो फिर वह जो भौतिक से परे है, उसकी प्रकृति क्या है? यही शिव तत्व है जो बहुत कम लोग जान पाते हैं।

अगर आप भौतिकता से थोड़ा आगे जाएं, तो सब कुछ शून्य हो जाता है। शून्य का अर्थ है पूरा खालीपन यानी एक ऐसी स्थिति जहां भौतिक कुछ भी नहीं है। जहां भौतिक कुछ है ही नहीं, वहां आपकी ज्ञानेंद्रियां भी बेकाम की हो जाती हैं। अगर आप शून्य से परे जाएं, तो आपको जो मिलेगा, उसे हम शिव के रूप में जानते हैं।

यह बेहद सीमित तरीका है

शिव का अर्थ है, जो नहीं है। जो नहीं है, उस तक अगर पहुंच पाएंगे, तो आप देखेंगे कि इसकी प्रकृति भौतिक नहीं है। इसका मतलब है इसका अस्तित्व नहीं है, पर यह धुंधला है, अपारदर्शी है। ऐसा कैसे हो सकता है? यह आपके तार्किक दिमाग के दायरे में नहीं है। आधुनिक विज्ञान मानता है कि इस पूरी रचना को इंसान के तर्कों पर खरा उतरना होगा, लेकिन जीवन को देखने का यह बेहद सीमित तरीका है।

सृष्टि दिमाग में फिट नहीं हो सकती

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं संपूर्ण सृष्टि मानव बुद्धि के तर्कों पर कभी खरी नहीं उतरेगी। आपका दिमाग इस सृष्टि में फिट हो सकता है, यह सृष्टि आपके दिमाग में कभी फिट नहीं हो सकती। तर्क इस अस्तित्व के केवल उन पहलुओं का विश्लेषण कर सकते हैं, जो भौतिक हैं। एक बार अगर आपने भौतिक पहलुओं को पार कर लिया, तो आपके तर्क पूरी तरह से उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर होंगे।

शिव पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव एक-दूसरे से उत्पन्न हुए हैं। वो एक-दूसरे को धारण करते हैं।एक-दूसरे के अनुकूल रहते हैं। भक्त सोच में पड़ जाते हैं। कहीं किसी को ऊंचा बताया जाता है, तो कहीं किसी को। विष्णु शिव से कहते हैं, ‘मेरे दर्शन का जो फल है वही आपके दर्शन का है। आप मेरे हृदय में रहते हैं और मैं आपके हृदय में रहता हूं। भगवान श्री कृष्ण, भगवान शिव से कहते हैं, ‘मुझे आपसे बढ़कर कोई प्यारा नहीं है, आप मुझे अपनी आत्मा से भी अधिक प्रिय हैं।

शिव क्यों है मृत्युंजय

संसार में निरंतर तीन प्रकार के कार्य चलते रहते हैं उत्पत्ति, पालन और संहार। इन्हीं तीन भिन्न कार्यों के लिए तीन नाम दे दिए गए हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश। विष्णु सतमूर्ति हैं, ब्रह्मा रजोगुणीमूर्ति और शिव तामसमूर्ति हैं। एक-दूसरे से स्नेह के कारण एक-दूसरे का ध्यान करने से शिव गोरे हो गए और विष्णु का रंग काला हो गया। शिव तामसी गुणों के अधिष्ठाता हैं। तामसी गुण यानी निंदा, क्रोध, मृत्यु, अंधकार आदि।

तामसी भोजन यानी कड़वा, विषैला आदि। जिस अपवित्रता से, जिस दोष के कारण किसी वस्तु से घृणा की जाती है, शिव उसकी ओर बिना ध्यान दिए उसे धारण कर उसे भी शुभ बना देते हैं। समुद्र मंथन के समय निकले विष को धारण कर वे नीलकंठ कहलाए। मंथन से निकले अन्य रत्नों की ओर उन्होंने देखा तक नहीं। जिससे जीव की मृत्यु होती है, वे उसे भी जय कर लेते हैं। तभी तो उनका नाम मृत्य़ु़ंजय है।

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