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प्रकृति / सूक्ष्म शरीर को क्यों रहता है ‘आध्यात्मिक मृत्यु’ का इंतजार

मुत्यु कोई आश्चर्य नहीं है। आप मरेंगे या नहीं, यह जानने के लिए कोई बहुत ज्यादा बुद्धिमानी, रिसर्च या फिर शिक्षा की जरूरत नहीं है। जब हमारा सूक्ष्म शरीर मां के गर्भ में पल रहे जीव के रूप में होता है तो उसका सीधा संबंध ब्रह्मांड से रहता है, वहीं से पोषण मिलता है। वहीं से ऊर्जा लेकर जीवन शरीर रूप में बढ़ता रहता है। यही जन्म का कारण होता है। जब मृत्यु होती है तो यही ब्रह्मांड की शक्तियां वापिस चली जाती है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं कि जब आप ब्रश से पेंट को फैलाते हैं तो रंग शुरु में बहुत गाढ़ा या सुर्ख होता है, फिर हल्का, और हल्का, और ज्यादा हल्का यानी सूक्ष्म रंग होता चला जाता है और आखिर में रंगहीन हो जाता है। कुछ इसी तरह जीवन भौतिक-शरीर से शुरू होकर मानसिक-शरीर फिर ‘प्राणिक-शरीर’ तक स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्मतर होता चला गया है। भौतिक-शरीर और मानसिक-शरीर की अपेक्षा ज्यादा स्थूल है। प्राणिक-शरीर वह ऊर्जा है जो इन सबको चलाती है और यही है जो आपको शरीर से जोड़कर रखती है।

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार आध्यात्मिक मृत्यु के बाद नया जन्म नहीं होता और आत्मा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है यानी आध्यात्मिक मृत्यु मोक्ष का द्वार होती है।

बुद्ध ने किया था सदेह निर्वाण

गौतम बुद्ध ने कहा था देह में रहकर भी देह से परे चले जाना संभव है। हालांकि उसके लिए लंबी साधना और नैतिक आचरण की जरूरत होती है। मोक्ष और निर्वाण दोनों ही अवस्थाओं में जीव जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा पा लेता है, लेकिन मोक्ष मृत्यु के पार की अवस्था है। जबकि निर्वाण के लिए जीवन का अंत अनिवार्य नहीं। बुद्ध ने सदेह अवस्था में निर्वाण प्राप्त किया था।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, ‘मृत्यु को पूरे खुले तौर से देखना और समझना चाहिए। मृत्यु से आपका या आपके बच्चों का परिचय जीवन के शुरूआत में ही हो जाना चाहिए।’ बच्चों को आप अहसास कराते रहें, ‘मृत्यु स्वाभाविक है, जो हर हाल में होनी है। यह कोई आपदा या त्रासदी नहीं है, बल्कि जीवन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।’

मुक्ति तक पहुंचने का मार्ग है सहजयोग

जैन दर्शन के प्रवर्तक महावीर स्वामी भी जीते जी कैवल्य-अवस्था को पा चुके थे, लेकिन सभी तो उनके जैसे तपस्वी-साधक नहीं हो सकते। तब आम इंसान क्या करें। तो उसके लिए सभी धर्म-दर्शनों में एक ही मंत्र दिया गया है और वह है ‘अनासक्ति’ यानी संसार में रहकर भी संसार के बंधनों से मुक्ति, धन-संपत्ति की लालसा, संबंधों और मोहमाया के बंधनों से परे हो जाना, अपने-पराए के अंतर से छुट्टी पा लेना, जो भी अपने पास है उसको परमात्मा की अनुकंपा की तरह स्वीकार करना और अपनी हर उपलब्धि को ईश्वर के नाम करते जाना, यही मुक्ति तक पहुंचने का सहजमार्ग है। इसी को सहजयोग कहा गया है।

ओशो ने कहा था, ‘जिस दिन मृत्यु झूठ हो गई, उस दिन जीवन भी झूठ हो जाएगा। उस दिन कुछ प्रकट होता है, जो मृत्यु और जीवन दोनों से अतीत है। उस अतीत का नाम ही परमात्मा है, जो न कभी पैदा होता, न कभी मरता, जो सदा है।’

तीन तरह की होती है मृत्यु

वैदिक ग्रंथों में मृत्यु के तीन प्रकार बताए गए हैं जोकि क्रमशः भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक हैं। किसी दुर्घटना या बीमारी से मृत्यु का होना भौतिक कारण की श्रेणी में आता है। इस समय भौतिक तरंग अचानक मानसिक तरंगों का साथ छोड़ देती है और शरीर प्राण त्याग देता है।

जब अचानक किसी ऐसी घटना-दुर्घटना के बारे में सुनकर, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, मौत होती है तो ऐसे समय में भी भौतिक तरंगें मानसिक तरंगों से अलग हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह मानसिक मृत्यु कहलाती है और तीसरी तरह की आध्यात्मिक मृत्यु होती है।

जब आध्यात्मिक साधना में मानसिक तरंग का प्रवाह जब आध्यात्मिक प्रवाह में समा जाता है, तब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है क्योंकि भौतिक शरीर अर्थात भौतिक तरंग से मानसिक तरंग का तारतम्य टूट जाता है। ऋषि मुनियों ने इसे ‘महामृत्यु’ कहा है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार महामृत्यु के बाद नया जन्म नहीं होता और आत्मा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है यानी यही मृत्यु मोक्ष का द्वार होती है।

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