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आत्म ज्ञान / अध्यात्म की पहली पाठशाला है ‘श्मशान’, क्यों और कैसे? यहां जानें

इंसान कभी भी भगवान के बारे में सोचकर आध्यात्मिक नहीं बनता। अगर आप भगवान के बारे में सोचते तो आमतौर पर आप सिर्फ अपने को बचाने के बारे में ही सोचते हैं। दुनिया की 98% प्रतिशत प्रार्थनाओं में लोग यही मांगते हैं, ‘हे ईश्वर मुझे यह दो, वह दो, मेरी रक्षा करो आदि।’ यह कोई आध्यात्मिकता नहीं है, यह तो बस अपने जीवन को सुरक्षित रखना है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं कि आप आध्यात्मिकता के बारे में तभी सोचते हैं, जब मौत से आपका सामना होता है। जब आपको इस बात का पता चलता है और अहसास होता है कि आप नश्वर हैं, आप मर सकते हैं, कल सुबह भी आप मर सकते हैं तब आप जानना चाहते हैं कि आखिर ये सब क्या चीज है? तब आप जानना चाहते हैं कि ‘मैं जो हूं’ उसकी असली प्रकृति क्या है? आप जानना चाहते हैं कि आप कहां से आए हैं और आप कहां जाएंगे? इस सोच के साथ ही आध्यात्मिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

हर दिन खुद को याद दिलाना होगा

बीसवीं सदी में एक असाधारण इंसान और मस्तमौला आध्यात्मिक गुरु हुए- गुरजिएफ। वो कहते थे, ‘अगर आप मानव शरीर में एक नया अंग लगा दें, जिसका असली काम लगातार आपको याद दिलाना हो कि आप भी एक दिन मर जाएंगे, तब पूरी दुनिया को आत्मज्ञान हो जाएगा।’

अगर हर इंसान खुद को रोजाना याद दिलाता रहे कि उसे मरना है तो इससे उसका काफी भला हो सकता है। कुछ साल पहले की बात है, मैं बेंगलूरु में था। एक दिन मैं यूं ही सब्जीमंडी में घूम रहा था। अचानक मेरी नजर एक सब्जी बेचने वाले पर पड़ी। मैं उसे देखता ही रह गया, उसके अन्दर एक जबर्दस्त चमक थी। मैं उसे देखकर हैरान था। एक ऐसा व्यक्ति यहां बैठकर सब्जियां बेच रहा है।

‘खुद को बस रोजाना यह याद दिलाने से कि आप नश्वर हैं, आप खुद को आध्यात्मिक होने से नहीं रोक सकते। ज्यादातर योगी अपने जीवन के शुरुआती दिन श्मशान में बिताते हैं।’

तभी हमारी आंखें एक दूसरे से मिलीं और हम एक दूसरे को देखते रहे। मैं खुद को हंसने से नहीं रोक पाया, वह भी जोर से हंसने लगा। फिर मैं उसकी तरफ बढ़ गया। उसने मुझे अपनी दुकान के भीतर बुलाया। मैं भीतर जाकर बैठ गया और मैंने उससे पूछा, ‘आप यहां सब्जी क्यों बेच रहे हैं?’ तब उस आदमी ने मुझे अपनी कहानी सुनाई।

मृत्यु को स्वीकार करने से मिला आत्म-ज्ञान

वह सब्जी बेचा करता था। एक बार वह बुरी तरह बीमार पड़ गया। कई महीने हो गए, लेकिन उसकी तबियत ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी। इस बीमारी के इलाज में उसके सारे पैसे खत्म हो गए। उसकी कमाई का साधन खत्म हो गया, बीमारी के चक्कर में उसकी पत्नी बच्चों समेत उसे छोडक़र चली गई। अब उसका कोई नहीं बचा था। किसी ने दया खाकर उसे सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया। जहां वह चार महीने तक भर्ती रहा, रोज उसे लगता रहा कि अब वह मरने वाला है। उसे लगा- लगातार मौत के साथ रहते हुए भी सब ठीक ही है, क्योंकि खोने को बचा क्या है, सब कुछ खो दिया, अब मर ही जाता हूं। फिर अचानक उस इंसान में कुछ बेहद जबरदस्त चीज घटित हुई। वह बिस्तर से उठ बैठा और फिर एक हफ्ते के भीतर वह ठीक हो गया और अस्पताल से बाहर आ गया।

यह पूरा नया अनुभव या घटना, जिसके बारे में उसने कभी अपने जीवन में कल्पना भी नहीं की थी, उसके भीतर घटित हो गई। चूंकि वह कुछ और करना नहीं जानता था, इसलिए वह वापस सब्जी बेचने के धंधे में लौट गया। उसने अपनी नई दुकान खोल ली! उसने कहा, ‘अब मेरी दुकान में कोई भी आता है तो मैं उसे आशीर्वाद देता हूं कि वे कम से कम चार महीने बुरी तरह से बीमार पड़ें, क्योंकि इसी बीमारी ने मेरे साथ यह चमत्कार किया।’

श्मशान एक पवित्र जगह मानी जाती है

खुद को बस रोजाना यह याद दिलाने से कि आप नश्वर हैं, आप खुद को आध्यात्मिक होने से नहीं रोक सकते। ज्यादातर योगी अपने जीवन के शुरुआती दिन श्मशान में बिताते हैं। मृत्यु अपने आप में संपूर्ण होती है, यह जब भी होती है तो आपको इसके बारे में सोचना नहीं पड़ता, आपको इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी होती, जबकि नश्वरता, जो जीवन की प्रकृति है, उसके बारे में आपको सोचना होता है। इसीलिए श्मशान को बेहद पवित्र जगह के तौर पर देखा जाता था।

‘अगर आप काशी जाएं तो वहां आपको यह चीज और स्पष्ट नजर आएगी। काशी को ‘महाश्मशान’ के तौर पर भी जाना जाता है। वहां की मुख्य जगह है- मणिकर्णिका घाट, जहां हर वक्त कम से छह-सात चिताएं जलती रहती हैं।’

जब कोई भी मरता है तो आपकी नश्वर प्रकृति आपके शरीर को कहीं न कहीं छूती है, यह भावनात्मक प्रतिक्रिया से कहीं ज्यादा होती है। भले ही आप मरने वाले व्यक्ति को नहीं जानते हों, लेकिन जब आप किसी को मरा हुआ देखते हैं तो यह चीज आपको कहीं न कहीं आघात पहुंचाती है। किसी मरे हुए इंसान को देखकर मानसिक व भावनात्मक प्रतिक्रिया तो होती है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चीज है कि शरीर अपने तरीके से जीवन को आत्मसात करता है।

चामुंडी श्मशान घाट जाने का सिलसिला

तब शायद मैं नौ साल का रहा होऊंगा, जब मैंने अपने दादाजी की मृत्यु को देखा था। ऐसा नहीं था कि उनकी मौत से मैं भावनात्मक तौर पर दुखी था, मेरे भीतर एक जबरदस्त जिज्ञासा भर गई थी। वह एक बेहद तंदुरुस्त इंसान थे और अचानक वे मर गए। मैं बस यह जानना चाहता था कि आखिर वह कहां गए। इसी चीज ने मुझे बेहद चिंतित कर दिया और इसके चलते मेरे भीतर एक बड़ी प्रक्रिया शुरू हो गई। जब मैं दस या ग्यारह साल की उम्र में पहुंचा तो मैंने नियमित तौर पर श्मशानों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। कभी-कभी तो मैं पूरी रात वहां बिता देता। उस समय हम मैसूर में रहा करते थे। जब भी मैं मैसूर की चामुंडी पहाड़ी पर घूमने या ट्रेकिंग के लिए जाता तो उस पहाड़ी की तलहटी में शहर का मुख्य श्मशान था। आप वहां कभी भी चले जाइए, कम से कम चार से पांच चिताएं जलती हुई मिलेंगी। मैं वहां जाकर बस बैठ जाता था और जलती हुई चिताओं को व श्मशान में चारों तरफ देखा करता। मैं बस जानना चाहता था कि इन मरे हुए लोगों के साथ क्या हो रहा है?

महाश्मशान काशी का मणिकर्णिका घाट

अगर आप काशी जाएं तो वहां आपको यह चीज और स्पष्ट नजर आएगी। काशी को ‘महाश्मशान’ के तौर पर भी जाना जाता है। वहां की मुख्य जगह है- मणिकर्णिका घाट, जहां हर वक्त कम से छह-सात चिताएं जलती रहती हैं। वहां अंतिम संस्कार को बड़े सामान्य ढंग से लिया जाता है, एक कारोबार की तरह। मान लीजिए कि अगर कोई चिता आधी ही जली है और इसी बीच दूसरा शव आ जाता है और खाली जगह उपलब्ध नहीं है, तो वे अधजले शव को गंगा में फेंक देते हैं। आपके लिए यह देखना बहुत अच्छा रहेगा कि मरने के बाद लोग आपके साथ कैसा व्यवहार करेंगे।

‘एक बार अगर आप उस शरीर की जगह खुद को रखकर देख लेंगे और उसके बाद भी आप वहां बैठते हैं तो आपके भीतर मौत को लेकर एक गहरी स्वीकृति का भाव आ जाएगा। एक बार आपमें मृत्यु को लेकर स्वीकृति का गहन भाव आ गया तो फिर आपके भीतर जीवन की प्रक्रिया जबरदस्त ढंग से घटित होने लगेगी।’

श्मशान में बस यूं ही सहज भाव से जाकर बैठ जाना और अपने आसपास हो रही चीजों को देखना आपके भीतर एक जबरदस्त बदलाव लाएगा। ऐसी तमाम चीजें जो आपने खुद को लेकर कल्पना कर रखी हैं, वे सारी चीजें श्मशान की अग्नि में भस्म हो जाएंगी, अगर आप वहां जाकर बैठते हैं और देखते हैं कि वहां आसपास क्या चल रहा है। यहां होने वाला अनुभव आपके भीतर एक अलग तरह की जागरूकता का भाव लेकर आता है। बहुत से गुरुओं ने तो इसे एक प्रक्रिया के तौर पर इस्तेमाल किया है।

मुर्दा शरीर में खुद को देखने की प्रक्रिया

गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं के लिए यह एक जरुरी नियम बना दिया था कि अगर वे उनसे दीक्षा लेना चाहते हैं तो वे कम से कम तीन महीने तक आसपास के सबसे व्यस्त श्मशान में जाकर बैठें और बस देखें कि वहां शरीर के साथ क्या हो रहा है। आपको इसके बारे में सोचना नहीं है, बस सारी चीजों को गौर से देखना है। कुछ देर बार आप उन शवों में खुद को पाएंगे। आपको खुद में और उनमें कोई फर्क ही नहीं लगेगा। आपको वहां खुद अपना शरीर महसूस होगा। एक बार अगर आप उस शरीर की जगह खुद को रखकर देख लेंगे और उसके बाद भी आप वहां बैठते हैं तो आपके भीतर मौत को लेकर एक गहरी स्वीकृति का भाव आ जाएगा। एक बार आपमें मृत्यु को लेकर स्वीकृति का गहन भाव आ गया तो फिर आपके भीतर जीवन की प्रक्रिया जबरदस्त ढंग से घटित होने लगेगी।

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