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वेदांत / यहां जानें, संवाद में क्रोध का क्या है ‘अर्थ’ और क्या है अध्यात्म का ‘मूल मंत्र’

जब दो लोगों या समूह में संवाद हो रहा हो तो यह जरूरी होता है कि बातचीत किस तरह की होनी चाहिए? सभ्य और व्यवाहारिक तौर पर देखा जाए तो यह बातचीत ऐसी होनी चाहिए जो गु्स्सा या प्रतिकार पैदा न करे। वैसी ही बात को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

हमारे धर्म और आध्यात्म का मूल मंत्र ही यही है कि ‘क्रोध और वाणी पर नियंत्रण रखना’, जिसने दोनों पर नियंत्रण कर लिया, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता है, जिसका इस पर नियंत्रण नहीं, वह ज्ञानी होकर भी अज्ञानी बन जाता है। इसका सबसे सटीक उदाहरण है आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच हुआ शास्‍त्रार्थ।

आज के समय में यह प्राचीन उदाहरण एक सीख है, जिसे जिंदगी के हर मोढ़ पर याद रखना चाहिए। आदि शंकराचार्य दक्षिण भारत के कालडी में जन्में थे, वह अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रणेता थे, जो धार्मिक कर्मकांडों को अधिक महत्‍व नहीं देते थे. जबकि मंडन मिश्र उत्तर भारत के स्थापित बुजुर्ग विद्वान थे, जो प्राचीन परंपरा और अनुष्‍ठानों के अनुयायी थे। यहां तक कि वह पशु बलि में भी विश्‍वास करते थे।

मुक्ति के लिए कर्मकांड आवश्‍यक नहीं

आदि शंकराचार्य इन कर्मकांडों की उपयोगिता, महत्व और आवश्यकता पर चर्चा और बहस के माध्‍यम से यह स्‍थापित करना चाहते थे कि मुक्ति के लिए कर्मकांड आवश्‍यक नहीं हैं। इसके माध्यम से वह धर्म को आडंबर से दूर करने के बारे में सामान्य जन को संदेश देकर जागरुक करना चाहते थे। इस कार्य के लिए वह देश भर में विद्वानों से शास्त्रार्थ कर अपने विचारों का प्रचार कर रहे थे।

तो वहीं, मंडन मिश्र उत्तर भारत के स्थापित विचारक थे, अत: उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित करने के अर्थ एक बड़े समूह में एक ही झटके में अपने विचारों का प्रचार करना होता। इसी उद्देश्य से वह मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने आए थे।

दूसरी ओर मंडन मिश्र, आदि शंकराचार्य को पराजित कर अपनी इस विचारधारा को और मजबूती से स्थापित करना था कि कर्मकांड न सिर्फ हमारी प्राचीन परंपरा है, बल्कि दैनिक जीवन के लिए भी जरूरी है।

हुआ यूं कि आदि शंकराचार्य देश के बड़े हिस्से में अपने मत का प्रचार कर यहां आए थे। अत: उन्हें पराजित करने से कर्मकांड वाली विचारधारा को अधिक मजबूती मिलनी तय थी। दोनों प्रकांड विद्वान थे और अपनी-अपनी विचारधारा को लेकर अतिउत्साही थे, इसलिए दोनों के बीच शास्त्रार्थ हुआ था।

प्राचीन भारत की यह बड़ी खूबी थी कि बड़े से बड़े संवेदनशील मुद्दों को भी वार्ता के द्वारा ही सुलझा लिया जाता था। ऐसे मुद्दे सड़कों पर या ताकत से तय नहीं होते थे।

क्रोध की वजह से हुई मंडन मिश्र की हार

मंडन मिश्र, जो उच्‍च्‍कोटि के विद्वान थे, तो आदि शंकराचार्य एक युवा, उन्होंने कहा कि मंडन मिश्र से उनकी समानता नहीं है, इसलिए वे अपनी पंसद के किसी व्‍यक्ति को पंच चुन लें। आदि शंकर ने और बड़ा व उदार फैसला करते हुए मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती जो स्वयं विदुषी थीं, उन्हें पंच के रूप में चुन लिया।

अब सबसे कठिन परीक्षा पंच की ही होने लगी। शास्त्रार्थ में पति को हारा हुआ घोषित करने का मतलब था कि वह उन्हें खो देंगी, इसलिए उन्होंने ऐसा रास्ता निकाला कि जिसमें उनके लडख़ड़ाने का खतरा ही खत्म हो गया। इसके लिए उन्होंने मंडन मिश्र और शंकराचार्य, दोनों से ताजे फूलों के हार पहनने के लिए कहा और कहा कि उसके बाद ही शास्‍त्रार्थ शुरू होगा।

‘संवाद के दौरान क्रोध का अर्थ है ‘तर्क की कमी’ यानी जब हमारा मस्तिष्क किसी भी रूप में सामने वाले को तर्कपूर्ण जवाब व आचारण करने में असमर्थ पाता है, तब नाराजगी का भाव पैदा होता है। इसलिए कहा गया है है कि बातचीत बिना क्रोध और तनाव के शांतचित्त मन से होनी चाहिए।’

उन्होंने कहा कि जिसके फूलों के हार की ताजगी समाप्‍त हो जाएगी उसे ही पराजित घोषित किया जाएगा। ऐसा क्‍यों? क्‍योंकि आप दोनों में जिसे क्रोध आ जाएगा उसका शरीर गर्म हो जाएगा, जिसके कारण माला के फूलों की ताजगी समाप्‍त हो जाएगी। क्रोध स्‍वयं ही पराजय का संकेत है।

इसी तर्क पर मंडन मिश्रा को शास्‍त्रार्थ में पराजित घोषित किया गया और उन्‍होंने संन्‍यास अपना लिया और आदि शंकराचार्य के शिष्‍य बन गए।

कहने का आशय यह है कि संवाद के दौरान क्रोध का अर्थ है ‘तर्क की कमी’ यानी जब हमारा मस्तिष्क किसी भी रूप में सामने वाले को तर्कपूर्ण जवाब व आचारण करने में असमर्थ पाता है, तब नाराजगी का भाव पैदा होता है। इसलिए कहा गया है है कि बातचीत बिना क्रोध और तनाव के शांतचित्त मन से होनी चाहिए।

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