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संवेदना / क्यों पैदा होती है ईर्ष्या और क्या हैं इससे बचने के उपाय, यहां जानें

हम कई बार अपने मन में ईर्ष्या, नफरत, क्रोध आदि को जन्म दे देते हैं और फिर बाद में पछताते हैं। आखिर ये भाव कहां से जन्म लेते हैं? क्या इनसे छुटकारा मिल सकता है? इस बारे में कई लोगों के विचार अलग-अलग होते हैं, लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि जब तक आप भीतर से अधूरापन महसूस करते रहेंगे, तब तक किसी इंसान के पास आपके अनुसार अपने से थोड़ा सा भी ज्यादा दिखने पर जलन महसूस होगी।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं जब आप बहुत खुश होते हैं, तब क्या आपके भीतर कोई जलन होती है? नहीं। जब आप नाखुश होते हैं, तभी आपके भीतर ईर्ष्या जन्म लेती है। आप ईर्ष्या की चिंता मत कीजिए। अगर जीवन के हर पल में, आपके भीतर की ऊर्जा परम आनंद से भरी है, तो जलन कैसे टिक सकती है? जलन से लड़ने से बेहतर होगा कि अपने जीवन के अनुभव को संपूर्ण बना लीजिए।

स्वभाव नहीं है ईर्ष्या

किसी चीज को छोड़ने से आजादी नहीं मिलेगी, क्योंकि छोड़ने के लिए है ही क्या? इस समय, आपके भीतर कोई ईर्ष्या नहीं है। यह आपके स्वभाव का अंग नहीं है। आप इसे समय-समय पर पैदा करते हैं। अगर आपने इसे इसलिए पैदा किया होता कि आप ऐसा करना चाहते थे, तो यह आपके लिए आनंददायक होता। अगर आपको गुस्से, जलन और नफरत से खुशी होती है तो उसे पैदा कीजिए। पर ऐसा नहीं है, वे आपके लिए ख़ुशी देने वाले अनुभव नहीं हैं। तो आपने उन्हें क्यों रचा है? आपने उन्हें रचा है क्योंकि आपके भीतर जरुरी जागरूकता की कमी है।

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अगर आप सही मायने में मुक्त होना चाहते हैं, तो आपको समझना चाहिए कि बंधन कहां है आपने किस चीज से अपनी पहचान जोड़ रखी है। जिस क्षण आप किसी पहचान से जुड़ेंगे, इस अस्तित्व से आपका टकराव होने लगेगा। यह सारा आध्यात्मिक सिलसिला इसलिए ही बना है कि आप अपनी पहचान को तोड़ सकें, ताकि आपका अस्तित्व से कोई टकराव न रहे। आप हर चीज को वैसे ही अनुभव कर रहे हैं, जैसी वह है, आप उसे अच्छे या बुरे किसी तरह का तमग़ा नहीं दे रहे, या उसे दैवीय या शैतानी बनाने की कोशिश नहीं कर रहे।

अपने स्वभाव के साथ चलें

आपके जितने भी भयंकर रूप हैं जैसे कि पक्षपात, ईर्ष्या, गुस्सा, नफरत आदि। कृपया देखें कि ये कितनी तीव्रता के साथ आपके भीतर घटते हैं। अगर उतनी ही गहराई से ध्यान हो पाता, तो यह सब कितना अद्भुत होता? वे सभी चीजें जो इन्सान को भयंकर बनाती हैं, वे सभी तीव्रता पर सवार होती हैं। अगर आपकी ईर्ष्या, गुस्सा, नफरत आदि दुर्बल होते, तो इनका कोई मतलब नहीं होता। जब वे आपके भीतर जलते हैं, तभी वे कुछ मायने रखते हैं। और वे आपके भीतर हमेशा पूरी तीव्रता से जलते हैं।

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आध्यात्मिकता का एक तत्व आपमें है, अब आपको बस इसका इस्तेमाल करना सीखना है। अगर आप कचरे को उठा कर जड़ों में डालें तो यह ठीक है। अगर आप इसे चेहरे पर मलें तो इसे सही नहीं माना जाएगा। अगर आपमें ये जागरूकता नहीं होगी तो आप जड़ों को सुगंध देने की कोशिश में पौधे को मार सकते हैं। आपको जड़ों में कचरा डालना होगा, सुगंध नहीं। पूरा विश्व इसी तरह काम करता है, और आपको भी ऐसे ही काम करना चाहिए।

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