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परंपरा / पूजा के समय हम क्यों स्मरण करते हैं अपने गोत्र का नाम

जब हम देवी या देवता की पूजा करते हैं तो पूजा की विधियों का अनुष्ठान करवाते पंडित जी पूछते हैं कि आपका नाम, नक्षत्र और गोत्र मन में उच्चारित कीजिए। आखिर ऐसा क्यों? अध्यात्मिक रूप से यह बेहद मायने रखते हैं, क्योंकि गोत्र हमारे पूर्वजों से जुड़ा हुआ है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है।

यदि हम बीते समय की दिव्य पुस्तकों का अध्ययन करें तो जिस समय देवी-देवताओं ने इंसान को एक खास तरह से रचा, ये सब चीजें बहुत अहमियत थीं। जिंदगी की जबरदस्त जटिलताओं के प्रति हमारी गहरी समझ के अनुसार भारतीय संस्कृति को रचा गया था। लेकिन आज यह एक जबरदस्त घालमेल बन गई है। इसका कारण रहा है पिछले 1800 सालों में इस देश पर बार-बार हुए हमले। इन हमलों में उन साधनों और संस्थाओं के साथ बहुत बुरी तरह से छेड़-छाड़ किया गया जो इस ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने वाले थे। अगर समझा जाए तो गोत्र एक बहुत प्रभावशाली विज्ञान है।

वो रखते थे आनुवंशिकी गहरी समझ

सदगुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं, ‘पुराने समय में जो भी मंदिर बनाए जाते थे, उनमें जीवन होता था। वे बड़े जीवंत होते थे, वह दिखावटी नहीं थे। जहां आप जाएं दर्शन और पूजा करें और वापिस आ जाएं। वहां अलग-अलग क्षमता, किस्म, और गुणों वाली एक जीवंत शक्ति पैदा की जाती थी। लोग हर मंदिर में नहीं जाते थे। कुछ मंदिर सबकी सामान्य भलाई के लिए बने होते थे, जहां सभी लोग जाया करते थे। पर खास मकसद के लिए वे अपने कुल-देवता के मंदिर में ही जाते थे। यह आनुवंशिकी यानी जेनेटिक्स की उनकी गहरी समझ की ओर इशारा करता है।’

वे बस अपनी उपस्थिति दर्ज करते थे, ‘यह मैं हूं, इस वंश का हूं, मेरा गोत्र यह है, मेरा नक्षत्र यह है, यह मेरा कुल है।’ दरअसल उनकी बात का मतलब होता था, ‘यह मेरा डीएनए है, मेरे लिए कुछ कीजिए।’ अपनी बात रखने का यह तरीका कितना वैज्ञानिक है! यह जिंदगी की बहुत गहरी और बढ़िया समझ है।

ताकि अच्छी होती रहे संतान

आज भले ही हम डीएनए टेस्टिंग के जरिए लोगों के बारे में काफी कुछ पता कर लें, लेकिन हजारों साल तक लोगों ने अपने तरीके से अपने जेनेटिक चिह्नों को गोत्र और कुल के रूप में बनाए रखा। इन वंश-चिह्नों को कभी बिगड़ने नहीं दिया, कभी कोई मिलावट नहीं की ताकि उनकी संतान अच्छी होती रहें। इतना ही नहीं, गोत्र के जरिए कुछ इस तरह की खास ऊर्जा भी आप तैयार कर सकते हैं जो उन वंश-चिह्नों के सहारे पूरे कुल में फैल सके। आपके कुल में हर एक को मंदिर जाने की जरूरत नहीं, आप अकेले वहां जा कर वह खास पूजा-विधि पूरी करें, हर किसी को उसका लाभ मिलेगा, क्योंकि आपके कुल के सारे लोग आपस में जुड़े हुए हैं।

इसलिए गोत्र है जरूरी

उस समय के लोगों ने यह बात अच्छी तरह से समझ ली थी और वे पूरी गंभीरता से आनुवंशिक या वंश से जुड़े चिह्नों को वंशवृक्षों में बनाए रखते थे। उस खास डीएनए और उस वंश से जुड़े रुझान के लिए खास ऊर्जा-स्रोत तैयार किया जाता था। मंदिर जाने पर लोग ऊपर बैठे भगवान को अपने कुल का बयान नहीं सुनाते थे, वे बस अपनी उपस्थिति दर्ज करते थे, ‘यह मैं हूं, इस वंश का हूं, मेरा गोत्र यह है, मेरा नक्षत्र यह है, यह मेरा कुल है।’ दरअसल उनकी बात का मतलब होता था, ‘यह मेरा डीएनए है, मेरे लिए कुछ कीजिए।’ अपनी बात रखने का यह तरीका कितना वैज्ञानिक है! यह जिंदगी की बहुत गहरी और बढ़िया समझ है।

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