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प्रक्रिया / क्यों होती है दीक्षा की जरूरत, और क्या है इसका आध्यात्मिक महत्व

अध्यात्म की दुनिया में दीक्षा शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। अध्यात्म की प्रक्रिया की शुरुआत दीक्षा से की जाती है। क्या दीक्षा के बिना भी प्रगति की जा सकती है? क्यों होती है दीक्षा की जरूरत, और क्या है इसका महत्व ? इस बारे में सद्गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं…

दीक्षित करने के लाखों तरीके हैं। जीवन के हर पहलू का इस्तेमाल किसी व्यक्ति के जीवन को प्रेरित करने के लिए, उसे रूपांतरित करने के लिए किया जा सकता है। बात सिर्फ इतनी है कि कुछ लोगों के साथ यह औपचारिक तौर पर किया जाता है और बाकियों के साथ यह कई अलग-अलग तरीकों से होता है। अब जैसे आश्रम में शाम के समय ‘दर्शन’ होता है।

हालांकि दर्शन का मतलब कोई प्रवचन या भाषण नहीं है, लेकिन अफसोस की बात है कि हमारा यह कार्यक्रम बातचीत से ही खत्म होता है, क्योंकि ज्यादातर लोग यह जानते ही नहीं कि सहज रूप से कैसे बैठा जाए। इसलिए बोलना पड़ता है। वैसे दर्शन का मतलब तो होता है बस देखना। भारतीय संस्कृति में कोई भी व्यक्ति मंदिर प्रार्थना करने के लिए नहीं जाता, बल्कि लोग दर्शन के लिए जाते हैं। वे मंदिर में उस ऊर्जा स्वरूप के दर्शन के लिए जाते हैं, ताकि वे उसे अपने भीतर आत्मसात कर सकें। वे अपने भीतर उस स्वरूप को इसलिए आत्मसात करना चाहते हैं, ताकि यह स्वरूप उनके भीतर रह सके और उनके लिए आंतरिक तौर पर काम कर सके। दर्शन भी एक तरह की दीक्षा ही है।

एक किक की तरह है दीक्षा

इसे समझने के लिए एक इंडक्शन मोटर का उदाहरण लेते हैं। एक इंडक्शन मोटर में अगर सभी जरूरी पार्ट्स हों और आप उसमें बिजली देते हैं, फिर भी वह काम नहीं करता। दरअसल, उसे काम करने के लिए इंडक्शन, जिसे बाहरी प्रेरक की जरूरत होती है। दरअसल, हम जिसे इंडक्शन कहते हैं (जिसे बाह्य प्रेरणा कह सकते हैं), उसकी कोई आदर्श वैज्ञानिक व्याख्या नहीं है। यह एक खास तरह की किक है, खास तरह की प्रेरणा है जिससे कोई चीज काम करना अचानक शुरू कर देती है।

इसी तरह से जो मेरे भीतर है, वह आपके भीतर भी है, फिर भी यह बिना इंडक्शन के काम नहीं करता। हम लोग यह इंडक्शन कई तरीकों से कर सकते हैं। हम इसे बेहद सौम्य तरीके से कर सकते हैं। अगर यह आपके लिए प्रभावशाली नहीं हुआ तो हम इसे औपचारिक तरीके से करेंगे। उसके बाद भी अगर आप पर यह काम नहीं किया तो हम आपको घुमाकर किक मार सकते हैं। आदि शंकराचार्य ने कहा था ‘योगरतोवा भोगरतोवा’। जिसका मतलब है कि किसी भी तरह से इसे किया जाए।

दीक्षा के अलग-अलग तरीके

इंसान केवल आध्यात्मिक अनुभव ही नहीं चाहता, वह कुछ खास करने की दक्षता भी हासिल करना चाहता है। इस तरह हम अलग अलग लोगों को अलग-अलग तरीकों से दीक्षित करते हैं। ब्रह्मचारियों के लिए अलग तरह की दीक्षा होती है, भैरागिनी मां के लिए एक अलग तरह की दीक्षा होती है, इसी तरह ऐसी बहुत सारी दीक्षाएं हैं। कुछ दीक्षाएं तो मैं अनौपचारिक तौर पर भी देता हूं।

जब हमने पहली बार लोगों तक आध्यात्मिक प्रक्रिया को पहुंचाने के लिए कुछ लोगों को प्रशिक्षित किया तब हमने औपचारिक दीक्षा की शुरुआत की। अगर यह काम सिर्फ मुझे ही करना होता तो मैंने कोई औपचारिक दीक्षा शुरु नहीं की होती। लेकिन दीक्षा को एक औपचारिक रूप इसलिए देना पड़ा ताकि उसे हर किसी के लिए संभालना सहज हो पाए और उसे सही तरह से बार-बार दोहराया जा सके। ऐसा इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हम अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचना चाहते हैं।

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