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समाधान / आध्यात्मिक रूप से ‘पानी’ क्यों है महत्त्वपूर्ण

भारत में पानी का संकट इतना तेजी से बढ़ रहा है कि आने वाले दिनों में यह संकट एक विकराल समस्या के तौर पर हमारे सामने मौजूद होगी। पिछले साल चैन्नई में पानी का संकट था, अनुमान लगाया जा रह है कि दक्षिण भारत के बेंगलुरू अब अगले पायदान पर है। पानी का हम कितना और कैसे उपयोग करते हैं इस बात को आज हमने गंभीरता से नहीं लिया तो आने वाला कल काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

यदि ऐसा ही चलता रहा तो भारत में हमारी पवित्र गंगा नदी भी बहनी बंद हो सकती है। इस बारे में सद्गुरु बताते हैं कि चाहे वह व्यक्तिगत मानवीय शरीर हो या विशाल ब्रह्मांडीय शरीर, सब कुछ मूल रूप से पांच तत्वों से बना है मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश। और इन पांच तत्वों की भी अपनी अलग स्मृति है। यही कारण है कि वे एक विशेष ढंग से व्यवहार करते हैं।

आज ऐसे बहुत सारे वैज्ञानिक सबूत मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि बस एक विचार या भावना के साथ आप पानी की रासायनिक संरचना को बदले बिना, उसकी आण्विक संरचना को बदल सकते हैं। बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के, वही पानी विष भी बन सकता है और जीवन का अमृत भी। यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें किस प्रकार की स्मृति है।

भारत के परंपरावादी घरों में लोग पीतल के अच्छे बर्तन रखते हैं, जिन्हें वे रोज धो कर साफ करते हैं, उनकी पूजा करते हैं और तब ही उनमें पीने का पानी भरते हैं। मंदिरों में जब तीर्थप्रसाद के रूप में एक बूंद भी पानी देते हैं तो हम सभी, करोड़पति धनवान भी, उसे अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ ग्रहण करते हैं क्योंकि वैसा पानी आप किसी भी कीमत पर कहीं से खरीद नहीं सकते। ये पानी ही है जो दिव्यता की स्मृतियां रखता है। यही तीर्थ है। लोग इसे पीना चाहते हैं जिससे ये उनको, उनके अंदर की दिव्यता याद दिलाए।

भारत में आज ऐसे बहुत से शहर हैं जहां लोग तीन दिनों में एक बार ही नहा पाते हैं। भारत की संस्कृति, हमारी परंपराएं ऐसी हैं कि चाहे कुछ भी हो, चाहे हम खाए नहीं, पर स्नान अवश्य करते हैं।

आप को लगता था ये सब अंधश्रद्धा है पर अब वैज्ञानिक भी यही बातें कर रहे हैं। वैज्ञानिकों ने यह शोध किया है कि जब पानी जबरदस्त रूप से पम्पिंग कर के ऊपर चढ़ाया जाता है तथा लेड और प्लास्टिक के पाईपों में से, कई बार मुड़ते हुए,ऊपर नीचे होते हुए गुज़रता है और आप के घरों तक आता है तो उसकी आण्विक संरचना बदल जाती है। इन सब मोड़ों और झुकावों के कारण पानी पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

पानी में याददाश्त है, स्मृतियां हैं और आप के भौतिक अस्तित्व का, आप के शरीर का 72% भाग पानी ही है। आप बस एक लंबी बोतल हैं। तो अगर आप एक बर्तन में रखे पानी को सुखमय, आनंदमय बना सकते हैं तो क्या अपने शरीर के अंदर के पानी को सुखमय, आनंदमय नहीं बना सकते? यही योग का विज्ञान है।

क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि अगर गंगा बहनी बंद हो जाये तो भारत के जनमानस पर इसका क्या असर पड़ेगा? गंगा हमारे लिए केवल एक नदी नहीं है। आज कुछ आध्यात्मिक समूह हैं जो गंगा को बचाने के, उसे पुनर्जीवित करने के प्रयत्नों में लगे हुए हैं और वे इस बात से बहुत चिंतित हैं कि गंगा को किस तरह बचाया जाये, कैसे उसे संभाला जाये? भारतीय लोगों का गंगा से एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव है।

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