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विश्वास / यकीन कीजिए! आप भी बन सकते हैं बुद्ध, लेकिन करना होगा ये

यदि आप अध्यात्म के रास्ते पर निकल पड़े हैं, तो गौतम बुद्ध को अनदेखा नहीं कर सकते। इसकी वजह है गौतम बुद्ध का अध्यात्म में किया गया अनंत चिंतन, जिसके कारण वह बुद्धत्व को प्राप्त हुए और गौतम बुद्ध बनकर दुनिया को अपने आध्यात्मिक ज्ञान से राह दिखाई।

इसकी शुरूआत उनके समय में हो चुकी थी। उस समय करीब चालीस हजार भिक्षु दुनिया भर के उन देशों में जाकर ज्ञान और आध्यात्मिक प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे थे, जिन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी। इस तरह गौतम बुद्ध का आध्यात्मिक ज्ञान लोगों के बीच पहुंचता गया। लोग उनके अनुयायी बनते गए और फिर बौद्ध धर्म का उदय हुआ।

कौन हैं बुद्ध

आम तौर पर बुद्ध शब्द को गौतम के साथ जोड़ते हैं, लेकिन वह इकलौते बुद्ध नहीं हैं। इस धरती पर हजारों बुद्ध हुए हैं और आज भी हैं। दरअसल, बुद्ध शब्द में ‘बु’ का अर्थ है, बुद्धि। जो अपनी बुद्धि से ऊपर उठ चुका है, जो अब अपने मन या दिमाग का हिस्सा नहीं है, वह बुद्ध है। इस तरह कोई भी व्यक्ति जो अध्यात्म और इस तरह की परिस्थितियों से ऊपर उठ जाता है बुद्ध बन जाता है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, ‘बुद्ध पूर्णिमा को गौतम बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के दिन के रूप में देखा जाता है। जब लगभग आठ साल की घनघोर साधना के बाद गौतम बहुत कमजोर हो गए थे। चार साल तक वह समाना (श्रमण) की स्थिति में रहे। समाना (श्रमण) के लिए मुख्य साधना बस घूमना और उपवास रखना था, वे कभी भोजन की तलाश नहीं करते थे। इससे गौतम का शरीर इतना कमजोर हो गया कि वह मौत के काफी करीब पहुंच गए।

इस दौरान वह निरंजना नदी के पास पहुंचे, जो प्राचीन भारत की कई नदियों की तरह सूख चुकी है और लगभग विलुप्त हो चुकी है। उस वक्त यह नदी एक बड़ी जलधारा थी, जिसमें घुटनों तक पानी तेज गति से बह रहा था। गौतम ने नदी पार करने की कोशिश की, लेकिन आधे रास्ते में ही उन्हें इतनी कमजोरी महसूस हुई कि उन्हें लगा कि अब एक कदम भी आगे बढ़ पाना संभव नहीं है, लेकिन वह हार मानने वाले शख्स नहीं थे। उन्होंने वहां पड़ी पेड़ की एक शाखा को पकड़ लिया और बस ऐसे ही खड़े रहे। हो सकता है, वह कई घंटे खड़े रहे हों। यह भी हो सकता है कि वे कुछ पल ही खड़े रहे हों, क्योंकि कमजोरी की ऐसी हालत में घंटों जैसे लग सकते हैं।

उस पल उन्हें अहसास हुआ कि वह जो खोज रहे हैं, वह तो उनके भीतर ही है। फिर ये सब संघर्ष करने का क्या फायदा! जिस चीज की आवश्यकता है, वह है अपने भीतर पूर्ण रूप से राजी हो जाना और ऐसा तो यहीं और अभी हो सकता है। फिर मैं उसे पूरी दुनिया में खोजता क्यों घूम रहा हूं? जब उन्हें इस बात का अहसास हुआ, तो उन्हें हिम्मत और ताकत मिली और उन्होंने एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए नदी पार कर ली।

इसके बाद वह एक पेड़ के नीचे बैठ गए, जिसे अब ‘बोधि वृक्ष’ के नाम से जाना जाता है। वह इस पेड़ के नीचे इस संकल्प के साथ बैठे, ‘जब तक मुझे परम ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, मैं यहां से नहीं उठूंगा या तो मैं यहां से एक प्रबुद्ध व्यक्ति के रूप में उठूंगा या फिर इसी अवस्था में प्राण त्याग दूंगा और एक ही पल में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो गई, क्योंकि इसके लिए बस इसी चीज की जरूरत होती है।’

जो चीज आप चाहते हैं, वह आपकी प्राथमिकता बन जानी चाहिए फिर वह एक पल में हो जाती है। पूरी साधना, पूरी कोशिश बस इसी के लिए होती है। लोग इधर-उधर इतने बिखरे हुए और अस्त व्यस्त हैं कि उन्हें एकत्रित करने और एक समग्र इकाई बनाने में बहुत लंबा समय लग जाता है। ये लोग अपनी पहचान तमाम चीजें के साथ बना लेते हैं। इसलिए पहली चीज है, खुद की तलाश करें।

गौतम बुद्ध ने बताए थे ये 4 सत्य

बुद्ध के अध्यात्म के बारे में आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर कहते हैं, ‘बुद्ध ने अकेले सत्य की तलाश शुरू की। इसके लिए उन्होंने अपना महल, पत्‍‌नी और बेटे को छोड़ दिया। उन्होंने वह सब कुछ किया, जो लोगों ने उन्हें बताया। इसके बाद ही वे चार सत्य जान पाए। पहला सत्य है कि दुनिया में दु:ख है। जीवन में सिर्फ दो संभावनाएं हैं पहली यह कि अपने आसपास के संसार में लोगों के दु:ख के अनुभव को देखकर समझ जाना।

दूसरी यह कि स्वयं उसका अनुभव करके समझना कि संसार एक दु:ख है। दूसरा सत्य यह है कि दु:ख के लिए कोई कारण होता है। आप बिना किसी कारण सुखी रह सकते हैं, परंतु दु:ख का कोई कारण अवश्य होता है। तीसरा सबसे महत्वपूर्ण सत्य यह है कि दु:ख का निवारण संभव है। और चौथा सत्य यह है कि दु:ख से बाहर निकलने के लिए एक रास्ता है।’

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