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Indian Media

भारतीय मीडिया का यह सबसे त्रासद समय है। छीजते भरोसे के बीच उम्मीद की लौ फिर भी टिमटिमा रही है। उम्मीद है कि भारतीय मीडिया आजादी के आंदोलन में छिपी अपनी गर्भनाल से एक बार फिर वह रिश्ता जोड़ेगा और उन आवाजों का उत्तर बनेगा जो उसे कभी पेस्टीट्यूट, कभी…
हिंदी के एक बड़े लेखक अशोक वाजपेयी कह रहे हैं कि, ‘पत्रकारिता में विचार अक्षमता बढ़ती जा रही है, जबकि उसमें यह स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। हिंदी में यह क्षरण हर स्तर पर देखा जा सकता है। हिंदी के अधिकांश अखबार और समाचार-पत्रिकाओं का भाषा बोध बहुत शिथिल और…
प्रतीकात्मक चित्र। एक समय में प्रिंट मीडिया ही सूचनाओं का वाहक था, वही विचारों की जगह भी था। 1990 के बाद टीवी घर-घर पहुंचा और उदारीकरण के बाद निजी चैनलों की बाढ़ आ गई। इसमें तमाम न्यूज चैनल भी आए। जल्दी सूचना देने की होड़ और टीआरपी की जंग ने…

भेदभाव / दुनिया में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर ये क्या हो रहा है?

अखिल पाराशर, लेखक चीन के बीजिंग शहर में रहते हैं वो चाइना मीडिया ग्रुप में वरिष्ठ पत्रकार हैं। हिन्दी में एक प्रसिद्ध दोहा है, ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’, यानी जैसी आपकी सोच होती है, वैसे नजरिए से ही आप दूसरों को देखते हैं। हम वह…

चुनौती / तो क्या भारतीय बाजार से लुप्त हो जाएंगे अखबार?

दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों से सूचनाएं मिल रही हैं कि प्रिंट मीडिया पर संकट के बादल हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि बहुत जल्द अखबार लुप्त हो जाएंगे। वर्ष 2008 में जे. गोमेज की किताब ‘प्रिंट इज डेड’ इसी अवधारणा पर बल देती है। इस किताब के…

मुद्दा / सोशल मीडिया के युग में ‘मीडिया और संचार की दुनिया’

ये मोबाइल का समय है और इस दौर में जब हर व्यक्ति कम्युनिकेटर, कैमरामैन और फिल्ममेकर होने की संभावना से युक्त हो, तब असल खबरें गायब क्यों हैं? सोशल मीडिया के आगमन के बाद से मीडिया और संचार की दुनिया के बेहद लोकतांत्रिक हो जाने के ढोल पीटे गए और…

बाजारवाद / गहरे असमंजस में है मीडिया की दुनिया!

मीडिया की दुनिया में आदर्शों और मूल्यों का विमर्श इन दिनों चरम पर है। विमर्शकारों की दुनिया दो हिस्सों में बंट गयी है। एक वर्ग मीडिया को कोसने में सारी हदें पार कर दे रहा है तो दूसरा वर्ग मानता है जो हो रहा वह बहुत स्वाभाविक है तथा काल-परिस्थिति…

चिंतन / बौद्धिक विमर्शों से नाता तोड़ चुके हैं हिंदी के अखबार

हिंदी पत्रकारिता को यह गौरव प्राप्त है कि वह न सिर्फ इस देश की आजादी की लड़ाई का मूल स्वर रही, बल्कि हिंदी को एक भाषा के रूप में रचने, बनाने और अनुशासनों में बांधने का काम भी उसने किया है। हिंदी भारतीय उपमहाद्वीप की एक ऐसी भाषा बनी, जिसकी…

फानी / तबाही के बाद कुछ सवाल और वो तस्वीरें जो हैरान कर देंगी

रविकांत द्विवेदी बीते दो-तीन दशकों में देश गवाह रहा है कि प्राकृतिक आपदाओं में लाखों लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी है और करोड़ों का नुकसान हुआ है। कुछ की भरपाई तो जैसे-तैसे करने की कोशिश की गई लेकिन कुछ की भरपाई शायद मरते दम तक शायद ना हो सके।…

रिपोर्ट / धर्म की दुनिया में आखिर क्या है ‘दुनिया का धर्म’

भारत में धर्म का बिजनेस ‘दिया तले अंधेरा ‘मुहावरे की तरह है, यह कितना बड़ा  बिजनेस बन चुका है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां राजनेता ही नहीं बल्कि मीडिया, कॉर्पोरेट जगत की आला कंपनियां भी भागीदार हैं। हालही में कोबरापोस्ट के स्टिंग…