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धरोहर / ऐसा दिखाई देता है स्वर्ग, देखना चाहें तो यहां जरूर जाएं

चित्र: बत्तीसी बावड़ी, चंदेरी

यदि आप प्राचीन इमारतों पर की गई नायाब कारीगरी देखने के शौकीन हैं तो चंदेरी की यात्रा जरूर कीजिए। मप्र के अशोकनगर जिले में चंदेरी एक प्राचीन शहर है। यह शहर महाभारत काल से अपनी ऐतिहासिक धरोहर को संवारे हुए है।

खिलजी वंश और मुगल काल में चंदेरी भारत का एक प्रमुख नगर हुआ करता था। 18वीं ई. के अंतिम चरण में, जब मुगल वंश का पतन हो रहा था, इस पर सिंधिया का अधिकार हो गया। चंदेरी की पहचान है यहां का ‘समृद्ध प्राचीन इतिहास और चंदेरी साड़ियां’,  प्रसिद्ध संगीतकार बैजू बावरा की समाधि, कटा पहाड़ (कटी घाटी) और राजपूत स्त्रियों के द्वारा किया गया सामूहिक आत्मदाह (जौहर) यहां देखने के लिए सबसे नायाब जगह हैं।

चंदेरी में हुआ था जौहर

कहते हैं मुगल वंश के संस्थापक बाबर ने यहां एक ही रात में अपनी सेना से पहाड़ी काट डालने का अविश्वसनीय कार्य करने को कहा और उसके सैनिकों ने यह कर दिखाया, जहां छैनी-हथोड़े के निशान आज भी देखे जा सकते हैं, जिसे आज ‘कटा पहाड़’ के नाम से जाना जाता है। सुबह होते ही उसने किले पर आक्रमण किया और जब रानियों को पता चला कि मुगल शासक ने हैवान की तरह उन पर हमला बोल दिया है तब रानियों ने अपनी दासियों और महिलाओं के साथ यहां जौहर किया था। भारत में राजस्थान के बाद चंदेरी ही ऐसा शहर है, जहां जौहर हुआ था।

चंद्रपुरी से चंदेरी

जनश्रुतियों को मानें तो चंदेरी की स्थापना संभवत: आठवीं सदी ई. में चंदेल राजपूतों ने की थी, जो चंद्रवंशीय क्षत्रिय माने जाते थे। इन्होंने इसका नाम ‘चंद्रपुरी’ रखा था। यह भी संभव है कि महाभारत कालीन ‘चेदि’ देश की राजधानी होने से इस नगरी को ‘चेदिपुरी’ या ‘चेदिगिरि’ कहा जाता था, जिसका अप्रभंश कालांतर में चंदेरी हो गया।

चंदेरी आएं तो क्या देखें

बूढ़ी चंदेरीः ओल्ड चंदेरी सिटी को बूढ़ी चंदेरी के नाम से जाना जाता है। 9वीं और 10वीं शताब्दी में बने जैन मंदिर यहां के मुख्य आकर्षण हैं, जिन्हें देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में जैन धर्म के अनुयायी आते हैं।

बत्तीसी बावड़ीः गोल, चौकोर और समकोण बावड़ियों से भरे इस नगर में ‘अफगान वास्तुकला’ की दूसरी जगमगाती निशानी चार मंजिला घाटों से सजी यह बावड़ी है। इसकी सुंदर सीढ़ियों के ऊपर, बीच में पटे हुए स्वागत द्वारों ने इसे भव्य बना दिया है। 60-60 फीट लंबी-चौड़ी इस बावड़ी पर लिखा है, ‘जो स्वर्ग की एक झलक देखना चाहता है, वह यहां आकर थोड़ा विश्राम करे, क्योंकि स्वर्ग इसी के समान हैं।’

परमेश्वर तालः इस खूबसूरत ताल को बुन्देला राजपूत राजाओं ने बनवाया था। ताल के निकट ही एक मंदिर बना हुआ है। राजपूत राजाओं के तीन स्मारक भी यहां पर देखे जा सकते हैं।

शहजादी का रोजाः यह स्मारक कुछ अनजान राजकुमारियों को समर्पित है। स्मारक के अंदरूनी हिस्से में शानदार सजावट है। स्मारक की संरचना ज्योमितीय से प्रभावित है।

जामा मस्जिदः चंदेरी की जामा मस्जिद मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। मस्जिद के गुम्बद और वीथिका काफी सुंदर हैं। यह भारत की एकमात्र बिना मीनार की मस्जिद है।

कोशक महलः इस महल को 1445 ई. में मालवा के महमूद खिलजी ने बनवाया था। यह महल चार बराबर हिस्सों में बंटा हुआ है। कहा जाता है कि सुल्तान इस महल को सात खंडों में बनवाना चाहते थे, लेकिन मात्र तीन खंड ही बनवा सके। महल के हर खंड में बालकनी, खिड़कियाँ और छत पर की गई शानदार नक्काशियां हैं।

कब जाएं: चंदेरी जाने के लिए सबसे बेहतर मौसम है जुलाई से फरवरी इस दौरान बारिश में प्राकृतिक सुंदरता के साथ ऐतिहासिक धरोहरों को आप निहार सकते हैं।

कैसे जाएं: भोपाल, चंदेरी से सबसे नजदीक एयरपोर्ट है। जो लगभग 230 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा सड़क मार्ग से आना चाहें तो भी बेहतर है। रेलमार्ग से जाना चाहें तो अशोक नगर, ललितपुर और मुंगावल चंदेरी का निकटतम रेलवे स्टेशन है। यहां से बस और टैक्सी से चंदेरी आया जा सकता है।

कहां रुकें: चंदेरी में मप्र पर्यटन विभाग का होटल ताना-बाना स्थित है। इसके अलाव कई प्राइवेट होटल्स भी यहां हैं। जहां आपके बजट में यहां कुछ दिन रुका जा सकता है।

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