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भोपाल की गलियां-2: भोपाली बोली से रू-ब-रू होने का यहां मिलेगा मौका

यात्रा में अब तक: मैं उस लड़के की बात को आज भी नहीं भूला हूं, जो भट सुअर के पीछे लटक कर ज़ोर से चिल्लाया था ‘जान दो…जान दो…सनन जान दो…।’ भोपाली ज़बान समझने का जुनून मुझे ऐसा लगा कि मैं ‘भट सुअर’ और ‘को खां’ जैसे नए शब्दों से यहां वाकिफ हुआ। अब आगे…

उस वक़्त मेरी प्राथमिकता हिन्दी और ख़ासकर उर्दू का शब्द ज्ञान बढ़ाने की थी। रेडियो में भाषा की शुध्दता पर विशेष ध्यान दिया जाता है और रेडियो में यह मेरे करियर का शुरूआती दौर था। अपने रेडियो में होने का लाभ उठाकर मैं हिन्दी और उर्दू के विद्वानों के बीच बैठकर लाभांवित हो सकता था। किन्तु मैंने अपने इस ज्ञानी विचार को सख्ती के साथ दबा दिया और पिछले छ: दिनों में भोपाली ज़बान संबंधी अपने अर्जित ज्ञान को दोहराने लगा। यहां ‘विद्यालय’ को ‘विधालय’ कहा जाता है। महाराष्ट्र का भी प्रभाव है जैसे ‘अठ्ठारह’ को ‘अठरा’, ‘कृति’ को ‘क्रुति’। ‘मैं’ और ‘हैं’ में ‘अं’ की मात्रा ग़ायब होती है, लेकिन ऐसा अधिकतर नए भोपाल में होता था।

लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हें

मज़ेदार चीज़ें तो पुराने भोपाल में होती हैं। यहां आकर तो ऐसा लगता है कि कई ‘स्वर’ भोपाल पहुंच ही नहीं पाए हैं। एक पुराने भोपाली अनाउन्सर ने ख़ुद से कम उम्र के एक नए नवेले डयूटी ऑफिसर को देखकर कहा ‘एसे एसे केसे केसे हो।’ उस वक़्त मैं उसकी व्यथा भूलकर उसके द्वारा कहे गए शेर को उसी लहजे में पकड़ने की कोशिश करने लगा। मुझे इसमें मज़ा आने लगा था फिर डयूटी के दौरान जितने भी फिल्मी गाने बजे मैंने उनको भोपालियों की तरह गुनगुनाने कोशिश की की थी ‘एक में ओर एक तू दोनों मिले इस।’ या फिर ‘केसे केसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हें।’

हटो मेरी ‘और’ मत आना

जिसने भी शोले देखी है उसे ‘सूरमा भोपाली’ का चरित्र याद रहता है। मुझे भी था लेकिन यहां आकर पता लगा कि शोले के ‘सूरमा भोपाली’ तो कहीं लगते ही नहीं हैं। जगदीप ने उस चरित्र में ‘ऐ’ की मात्रा की जगह एक मात्रा ‘ए’ और ‘औ’ की जगह ‘ओ’ का इस्तेमाल किया था। जैसे ‘एसे केसे पेसे दे दिंगे हम ?’ या फिर ‘अरे ख़ां ये ओरतें-मोरतें मरद की बराबरी नहीं कर सकती क़सम से।’ यहां आकर पता चला कि कभी कभी इसके उलट भी होता है। यानि एक ‘और’ एक नहीं बल्कि एक ‘ओर’ एक दो होगा। मज़े की बात यह है कि जहां ‘ओर’ कहना होगा वहां यह ‘और’ हो जाएगा। जैसे हटो मेरी ‘और’ मत आना। मैं इतना ही दोहरा पाया था कि कंडक्टर ज़ोर से चिल्लाया ‘दो नम्बर वाले बड़ लो…बड़ लो…’ दो नम्बर आ चुका था और बस से उतरते ही एक दुकान पर लिखा था ‘दो नम्बर दूध की डेरी।’

यहां चार नम्बर ग़ायब है

मुझे परसाई जी की कहानी ‘नम्बर दो की आत्मा’ याद आ गई। अगर यह दूधवाला कुछ गड़बड़ कर भी दे तो इस पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। यह तो पहले ही चेता चुका है ‘दो नम्बर दूध’…। इस तरह में लोकेन्द्र के घर पहुंचा और उनसे बातचीत के दौरान पता लगा कि न्यू मार्केट से आने वाली बसों के स्टाप के नाम पर आस-पास की बस्तियों और बाज़ारों के नाम पड़ गए हैं। जैसे दो नम्बर…पांच नम्बर, सात नम्बर, दस नम्बर, ग्यारह नम्बर आदि। चार नम्बर ग़ायब है, लेकिन ‘सवा चार’ और ‘साढ़े चार’ है हालांकि इस रूट पर अब बसें नहीं चलती। ‘सवा छ:’ और ‘साढे छ:’ भी है। ‘छ: नम्बर का मार्केट’ और ‘दस नम्बर का मार्केट’ इस इलाक़े के बड़े मार्केट हैं। ‘पांच नम्बर पेट्रोल पंप’ का असली नाम शायद ही कोई जानता हो वगैरह वगैरह।

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भोपाली ज़बान के साथ-साथ नामकरण

उस शाम लोकेन्द्र की बातें सुनकर मुझे भोपाली ज़बान के साथ-साथ नामकरण की इस विचित्र परम्परा के प्रति भी भारी आकर्षण महसूस होने लगा। पहले मुझे लगा कि भोपाली शायद नामकरण के मामले में आलसी रहे होंगे लेकिन भोपाल में महीना भर निकलते-निकलते मुझे अहसास हो गया कि भोपाली उच्चारण के मामले में ही नहीं बल्कि नामकरण के मामले में भी विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं।

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यहां नामकरण की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। नाम और गुण का बहुत गहरा रिश्ता है। नाम के अनुरूप गुण न होने पर नाम प्रचलित हो ही नहीं सकता भले ही वह कितना भी ख़ूबसूरत क्यूं न हो।

क्रमशः

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