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सीख : बिना इच्छाओं के ‘कुछ इस तरह रखें’ खुद को तरोताजा

प्रतीकात्मक चित्र।

कभी-कभी जब आप कोई काम करते हैं और आपका मन, जिसे हम इच्छा भी कहते हैं नहीं लगता है। तो ऐसे मे क्या करना चाहिए, ये एक ऐसा सवाल है जो बाद मे मन में जरूर आता है।

लेकिन,बिना इच्छा के बड़ी तेजी के साथ किसी काम करने का मतलब है कि वह इंसान या तो पागल हो गया है या फिर किसी चीज या किसी इंसान के प्यार में बुरी तरह पड़ा हो, या फिर ऐसा भी हो सकता है कि वह आत्म-ज्ञानी हो। इन चीजों के अलावा कोई और रास्ता है ही नहीं।

अब आप देखें कि आप इनमें से किस श्रेणी में आते हैं। आपको खुद को देखते रहना होगा। या तो आप पागल होंगे या किसी के प्यार में होंगे या आपको आत्म-ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होगी, तभी आप यह सब कर सकते हैं, नहीं तो आप बगैर इच्छा के यह सब नहीं कर पाएंगे।

बिना किसी जरूरत के लगातार उसी काम को करते जाने के लिए आपको इन तीन श्रेणियों में से किसी एक में होना होगा। इन तीनों चीजों को या कम-से-कम पहली दो चीजों को करने के लिए आपके भीतर एक खास किस्म का साहस होना चाहिए।

किसी चीज़ के पीछे पागलों की तरह पड़ने के लिए एक विशेष साहस होना चाहिए। किसी के प्यार में बुरी तरह पागल होने के लिए आपके भीतर एक खास तरह की हिम्मत होनी चाहिए। आत्म-ज्ञानी होने के लिए भी साहस की जरूरत है, लेकिन वह अलग तरह का साहस होगा।

एक बार आर्मी के तीन जनरल अपनी-अपनी शेखी बघार रहे थे कि उनकी रेजिमेंट के लोग कितने साहसी हैं। पहले जनरल ने अपनी बात साबित करने के लिए अपने एक जवान को बुलाया और कहा, ‘इधर आओ और इस गड्ढे को पार कर जाओ’। जवान बिना किसी हिचक के कूद गया, लेकिन गड्ढे को पार नहीं कर पाया। वह गिरकर मर गया।

जनरल ने कहा, ‘देखा, मेरी रेजिमेंट को!’ अब दूसरे जनरल ने अपने जवान को बुलाया और कहा, ‘हेडक्वॉर्टर के लिए एक संदेश है। मैं चाहता हूं कि तुम इस बारूदी सुरंग को पार कर तेजी से जाकर संदेश पहुंचाओ’। वह फौरन दौड़ पड़ा। आधे रास्ते में ही वह मारा गया।

दूसरे जनरल ने भी कहा, ‘देखा मेरे सिपाही को!’ अब तीसरे जनरल ने अपने जवान को बुलाया और वहां से थोड़ी दूरी पर तेज गति से बहती नदी और वहां मौजूद एक तेज झरने की ओर इशारा करके बोला, ‘जवान, तुम्हें इस नदी को पार करना है और तुम्हारे पास बस एक छोटी सी नाव होगी’।

जवान फौरन बोला, ‘लगता है आपने फिर पी ली है? आप पगला गए हैं क्या, जो आपको लगता है मैं ऐसा काम करूंगा? मैं यह काम नहीं करने वाला’। तीसरा जनरल अपने दोनों साथियों की ओर मुड़ा और बोला, ‘साहस इसे कहते हैं’।

तो साहस अलग-अलग तरह का होता है। लोग हमेशा खुद में क्रोध या उत्साह जगाकर ही साहस का काम करने की कोशिश करते हैं। आपने युद्ध नहीं देखा होगा। न ही देखें तो अच्छा है। फिल्में तो देखी ही होंगी। फिल्मों में भी अगर कोई किसी पर हमला करता है तो वह गुस्से से तेज आवाज निकालता है क्योंकि गुस्से या घृणा के दम पर ही लोग साहस बटोर पाते हैं। शांत रहते हुए साहस जुटा पाना पूरी तरह से एक अलग पहलू है।

जब आपका मन पूरी तरह से आपके काबू में हो ताकि वह उन चीजों की कल्पना न करें जो मौजूद नहीं हैं, केवल तभी मुमकिन है कि आप बिना गुस्से और नफरत के पूरी तरह साहसी हो सकते हैं, लेकिन चूंकि आपका मन मौजूदा चीजों के अलावा कुछ और देख ही नहीं सकता इसलिए भय हमेशा इस बात को लेकर रहता है कि अगले पल क्या होने वाला है।

अगर आपका मन अगले पल के बारे में योजनाएं नहीं बनाता, तो आपके पास साहस है। यह साहस भी नहीं है, यह तो बस निडरता है। आपने डर पैदा करना छोड़ दिया है। डर पैदा करना सिर्फ तभी बंद होता है, जब कोई इंसान खुद को वर्तमान पल में ले आता है।

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