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फिल्म 83 : उस पल के रोमांच को, फिर से देखने का अहसास

चित्र : पूर्व भारतीय कप्तान कपिल देव और अभिनेता रणवीर सिंह।

  • अखिल पाराशर, बीजिंग, चीन।

भारतीय क्रिकेट टीम ने पहली बार वर्ल्ड कप 1983 में जीता था। उस पल के रोमांच को फिर से जिंदा करने वाली फिल्म 83 के निर्देशक कबीर खान से चीन में द फीचर टाइम्स के संवाददाता ने विशेष मुलाकात की।

कबीर खान ने ’83’ के अलावा ‘न्यूयार्क’, ‘एक था टाईगर’, ‘बजरंगी भाई जान’ का निर्देशन कर चुके हैं। वो बताते हैं कि सुनील गावस्कर की भूमिका के लिए अभिनेता का चुनाव सबसे ज्यादा मुश्किल था। कई महीने कोशिश करने के बाद इस रोल के लिए ताहिर हुसैन भसीन को चुना गया जिन्होंने नंदिता दास को फिल्म ‘मंटो’ में बेहतरीन अभिनय से हमें प्रभावित किया था। इंडियन क्रिकेट टीम के बाकी सदस्यों की कास्टिंग में एक साल लग गए। दो हजार कलाकारों के ऑडिशन के बाद यह काम पूरा हुआ।

कबीर आगे बताते हैं क्रिकेट मेरा सब्जेक्ट कभी नहीं रहा। जब यह फिल्म मेरे पास आई तो मैंने दो साल इस विषय पर रिसर्च किया। मैं इससे पहले कई डॉक्यूमेंट्री बना चुका था। लेकिन 1983 के क्रिकेट वर्ल्ड कप के हर महत्वपूर्ण क्षण को दोबारा फिल्म में जीवंत करना एक बड़ी चुनौती थी। खिलाड़ियों के कपड़े, जूते, गेंद, बल्ले, बोलने और चलने के अंदाज से लेकर उनकी सोच मे उतरना जोखिम भरा था। हमने अपने सहयोगियों से कहा कि हमें तथ्यों के साथ कोई छूट नहीं लेनी है। हर चीज वैसी ही चाहिए जैसी 1983 में थी।

चीनी दर्शकों को लुभाती, भारतीय फिल्में

पिछले कुछ समय से चीन में भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता बढ़ रही है। एक के बाद एक भारतीय फिल्में चीन के सिनेमाघरों में चीनी दर्शकों को लुभा रही हैं। चीन में सफल साबित हुई ‘बजरंगी भाईजान’ फिल्म के निर्देशक कबीर खान ने कहा कि चीन की फिल्म इंडस्ट्री पिछले कुछ सालों में बहुत तेजी से बढ़ रही है। चीन के पास 60 हजार स्क्रीन है, जबकि भारत में हिन्दी फिल्मों के लिए करीब 5 हजार स्क्रीन है। दोनों देशों की फिल्म इंडस्ट्री बहुत बड़ी है, उन्हें सहयोग करना चाहिए जिससे दोनों को ही लाभ मिलेगा।

चित्र : कबीर खान।

चाइना पीकोक मांउटेन ग्रुप, चीन का जाना-माना प्रोडक्शन हाऊस है जिसके डायरेक्टर प्रसाद शेट्टी, चीन में आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ और ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ रिलीज करवाई। प्रसाद बताते हैं कि चीनी दर्शक दुनिया में सबसे ज्यादा परिपक्व हैं। उन्हें हर किस्म की फिल्म पसंद आती है। यहां (चीन) जापानी, कोरियाई, स्पैनिश हर भाषा की फिल्म, हर क्षेत्र की फिल्म, हर शैली व प्रकार की फिल्में पसंद की जाती है।

अलग है यूरोपियन दर्शकों का नज़रिया

भारत में क्षेत्रीय फिल्मों में सिर्फ उसी क्षेत्र के दर्शक ही फिल्में देखते हैं, लेकिन हिन्दी फिल्में या हॉलीवुड फिल्में कुछ ही क्षेत्रों में चलती हैं। फ्रेंच फिल्में या स्पैनिश फिल्में कभी नहीं चलती। चीन में फिल्मों के चलने का कोई फॉर्मूला नहीं है, बस फिल्म कंटेंट अच्छा होना चाहिए।

वहीं, कबीर खान कहते हैं कि चीनी दर्शक बहुत खुली सोच रखते हैं, इतना भारत के दर्शक भी नहीं रखते। हमारे लोग खुद की क्षेत्रीय फिल्में नहीं देखते, बाहर की फिल्में देखना तो दूर की बात है। हिन्दी भाषी दर्शक केवल हिन्दी फिल्में और हिन्दी फिल्मों के अभिनेताओं की फिल्में ही देखते हैं, जबकि चीनी दर्शकों को फिल्मों की कहानी से लगाव होता है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र, भाषा, या फिर किसी भी अभिनेता की फिल्म ही क्यों न हो।

आंखों के लिए नहीं, दिलों के लिए हैं फिल्में

कबीर खान बताते हैं कि भारतीय फिल्मों में इमोशनल और नाटकीय हिस्सा बहुत ज्यादा होती है। इसलिए एशियाई, अफ्रीकी क्षेत्रों में बहुत पसंद की जाती हैं, लेकिन यूरोप में नजरिया थोड़ा अलग होता है। वहां चीज़ों को अलग ढंग से देखा जाता है।

चित्र : फिल्म 83 के सभी 11 अभिनेता।

फिल्ममेकर प्रसाद बताते हैं, ‘हॉलीवुड फिल्में आंखों के लिए बनाई जाती हैं, जबकि भारतीय फिल्में दिलों के लिए बनाई जाती हैं।’ भारतीय फिल्में चीनी दर्शकों के दिलों को लुभाती हैं। लोग हॉलिवुड फिल्मों का आनंद लेते हैं, लेकिन भारतीय फिल्मों को प्यार करते हैं।

कबीर खान के निर्देशन में बनी फिल्म 83 रिलीज हो रही है। वो कहते हैं उस समय भारतीय क्रिकेट टीम ने वर्ल्ड की नम्बर एक टीम वेस्टइंडीज को हराकर वर्ल्ड कप जीता, यह एक सुखद आश्चर्य था, जिसे वो अब बड़े पर्दे पर उतारने जा रहे हैं।

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