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अड़चन : ‘पराली से बनेगी उर्जा, नहीं होगा प्रदूषण’ लेकिन कैसे?

बेलर मशीन जो परिवहन में आसानी के लिए धान के ठूंठ को बंडलों में कंप्रेस करती है। चित्र : मनु मौदगिल

  • मनु मौदगिल।

पंजाब में 97.50 मेगावाट की कुल क्षमता के 11 बायोमास बिजली संयंत्र हैं, जिसमें हर साल 880,000 मीट्रिक टन पराली की खपत होती है। धान की भूसी का उपयोग बायोगैस बनाने या अन्य ईंधन बनाने के लिए भी किया जा सकता है। हालांकि, पराली की चर्चा अक्सर प्रदूषण की वजह से ही होती है। बायोमास संयंत्रों को सौर और पवन ऊर्जा से कड़ी प्रतिस्पर्धा के अलावा परिचालन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

सर्दियों की शुरुआत में धान की कटाई और उससे जुड़े अवशेष की खूब चर्चा होती है। इस पुआल या पराली का निपटारा किसानों के लिए मुश्किल होता है। देश के विभिन्न हिस्सों से इसे जलाने की शिकायत आती रहती है। दिल्ली सहित आसपास के शहरों में प्रदूषण के लिए भी इसी पराली जलाने को जिम्मेदार ठहराया जाता है। 

सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (सफर-इंडिया) के आंकड़ों से पता चलता है कि बीते साल दिल्ली की हवा में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 में खेतों में लगी आग का योगदान 6 से 48 प्रतिशत के बीच था। 1 से 15 नवंबर के बीच। पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के मुताबिक खेतों में आग की संख्या 8 नवंबर को 5,430 तक पहुंच गई थी। यह इस सीजन का रिकार्ड था। यह आंकड़ा पिछले साल 4,500 के करीब थी। 

नवंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को दोषी ठहराने और धान के भूसे के प्रबंधन के लिए मशीन उपलब्ध नहीं कराने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी। 

इस बीच धान के अवशेषों जैसे पराली और धान के भूसे को कई तरह से खपाने की कोशिशें चल रही हैं। खेतों में ही अवशेषों के प्रबंधन के अलावा, बायोमास बिजली संयंत्रों और बायोगैस इकाइयों में ऊर्जा का उत्पादन करने के लिए भूसे का उपयोग करने, इसे ईंधन पैलेट और ब्रिकेट (एक तरह का कोयला) में बदलने के विकल्पों पर भी काम हो रहा है। 

बायोमास उपलब्धता और विकल्प

भारत परंपरागत रूप से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बायोमास पर निर्भर रहा है। घरेलू मिट्टी के चूल्हे और छोटी भट्टियों में लकड़ी, झाड़ियों, पुआल और गोबर झोंककर ऊर्जा की जरूरत पूरी होती रही है। बायोमास बिजली संयंत्र इसी कड़ी में एक आधुनिक संयंत्र है जहां एक नियंत्रित वातावरण में भाप टर्बाइन चलाया जाता है जिससे बिजली पैदा होती है। बायोमास बिजली पैदा करने में श्रमिकों की अधिक जरूरत होती है जिससे इस क्षेत्र में रोजगार की भरपूर संभावना है। हालांकि, ईंधन खरीदने में इस क्षेत्र मे काफी लागत लगती है, इसलिए सौर और पवन ऊर्जा क्षेत्र से इसे कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। 

ऊर्जा क्षेत्र में सक्रिय स्वतंत्र सलाहकार मंजुश्री बैनर्जी ने बताया कि भारत में 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य है, ऐसे में बायोमास क्षेत्र में तरक्की की काफी संभावना है। वर्तमान में, अधिकांश बायोमास ऊर्जा उत्पादन कैप्टिव है, जिसका अर्थ है कि उद्योग अपनी जरूरतों के लिए बायोमास का उपयोग कर रहे हैं। ऐसा खासकर उन राज्यों में हो रहा जहां बिजली का औद्योगिक टैरिफ बहुत अधिक है। चीनी मिलें इस क्षेत्र में आगे हैं क्योंकि उनके पास पहले से ही चीनी बनाने की प्रक्रिया के खोई के रूप में जलाने के लिए उत्पाद उपलब्ध होता है। इसका बिजली उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में पुन: उपयोग किया जा सकता है। 

पंजाब एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी  के संयुक्त निदेशक (बायोमास) आर.के. गुप्ता ने बताया कि केंद्र सरकार के अक्टूबर 2021 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में अक्षय ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता के 103 गीगावॉट में बायोमास आधारित बिजली की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत (10.1 गीगावॉट) से अधिक थी। वास्तव में, पंजाब में देश में बायोमास से सबसे अधिक 3,172 मेगावाट  बिजली की क्षमता है। यहां करीब 20 लाख टन धान के भूसे का उत्पादन होता है। पर यहां बिजली बनाने की स्थापित क्षमता काफी कम है। “हमारे पास राज्य में 11 बायोमास बिजली संयंत्र हैं जिनकी कुल क्षमता 97.50 मेगावॉट है। इन संयंत्रों में हर साल 8,80,000 मीट्रिक टन पराली की खपत होती है। आने वाले समय में चार मेगावाट और दस मेगावाट क्षमता के दो और बिजली संयंत्र स्थापित करने की योजना है।

लेकिन बायोमास बिजली संयंत्रों को चलाना आसान नहीं है क्योंकि उनमें लगने वाले फ़ीड या ईंधन की खरीद, भंडारण और दिन-प्रतिदिन चलने वाली लागत में काफी पूंजी की जरूरत होती है। बायोमास से बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी चुनौती है फ़ीड यानी कच्चा माल। इसको विकसित करने और रखने के लिए बड़े स्तर पर जमीन की जरूरत होती है। इसकी लागत स्थानीय स्थिति पर निर्भर करती है जैसे कितनी दूरी से खरीद करनी पड़ रही है। इस प्रकार रोजमर्रा का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण है। 

धान के पुआल या पराली से चलने वाले संयंत्र को चलाने में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसका थोक घनत्व कम होता है और राख की मात्रा अधिक होती है। इसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है और क्षारीय तत्व भी होता है, जिसके परिणामस्वरूप यह पूरी तरह नहीं जलता और इसका संयंत्र के उपकरणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

पंजाब के फिरोजपुर के पास सुखबीर एग्रो एनर्जी लिमिटेड के 18 मेगावाट के बायोमास प्लांट में हर साल लगभग 200,000 टन धान की पराली की खपत होती है। प्लांट के महाप्रबंधक अरविंद बेदी ने शिकायत की, ‘सौर ऊर्जा पार्क के विपरीत, जो एकमुश्त निवेश है, हमें खरीद और भंडारण जैसे दिन-प्रतिदिन के मुद्दों से निपटना पड़ता है। हालांकि हम तकनीकी खामियों को दूर करने में सक्षम हैं, लेकिन अन्य चुनौतियां भी हैं जैसे हम अधिक नमी वाले भूसे का उपयोग नहीं कर सकते क्योंकि इससे मशीनरी को नुकसान होता है।’

अगस्त 2021 में पंजाब सरकार की कैबिनेट ने धान की पुआल आधारित बॉयलर लगाने वाले पहले 50 उद्योगों को 25 करोड़ रुपए के फंड को मंजूरी दी। मंत्रि-परिषद ने धान की भूसी के भंडारण हेतु पंचायत भूमि को 33 वर्ष तक के लीज एग्रीमेंट के साथ उद्योगों को उपलब्ध कराया। इसके अलावा उन क्षेत्रों में पराली प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराने का भी निर्णय लिया जहां बॉयलर में पुआल का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है।

बायोमास बिजली संयंत्रों के अलावा, पंजाब ने एक हाइब्रिड बायोगैस संयंत्र को भी मंजूरी दे दी है, जबकि एक बायो-सीएनजी संयंत्र अगले साल की शुरुआत में काम करना शुरू कर देगा, जहां दोनों तरह के ईंधन का उपयोग होगा।

राज्य के फाजिल्का जिले में एक मेगावाट का बायोगैस बिजली संयंत्र पहले से ही चालू है। यहां उत्पादित उर्जा ग्रिड में जमा होती है। फाजिल्का प्लांट की दक्षता बढ़ाने का काम करने वाले आईआईटी दिल्ली के ग्रामीण विकास एवं प्रौद्योगिकी केंद्र के असिस्टेंट प्रोफेसर राम चंद्रा ने कहा कि धान के भूसे से निपटने का सबसे साफ तरीका बायोगैस है क्योंकि इसमें जलाने की जरूरत नहीं होती, बल्कि सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर घोल भी मिलता है। इसे जैव-उर्वरक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अन्य सभी बिजली उत्पादन विधियों में बॉयलरों से उत्सर्जन होगा। काफी राख निकलेगी। इस प्रक्रिया में पुआल या भूसे के पोषक तत्व जो वापस मिट्टी में चले जाने चाहिए थे, खो जाते हैं।

टैरिफ के लिए संघर्ष

सौर और पवन जैसे अन्य नवीकरणीय स्रोतों से कड़ी प्रतिस्पर्धा भी बायोमास आधारित बिजली उत्पादकों के लिए एक चुनौती साबित हो रही है।मंजूश्री बैनर्जी ने जोर देकर कहा, ‘फोटोवोल्टिक तकनीक और बैटरी की लागत कम होने के कारण सौर ऊर्जा की उत्पादन लागत कम हो रही है, लेकिन बायोमास के मामले में लागत अधिक हो रही है।पंजाब में भी टैरिफ को लेकर खींचतान जारी है।

आरके गुप्ता बताते हैं कि बिजली का शुल्क घटकर 2.25-2.50 प्रति यूनिट लेकिन बायोमास के लिए, यह लगभग 8 रुपए है। अधिकांश डिस्कॉम (बिजली वितरण कंपनियां) और राज्य इतनी ऊंची दर पर खरीदने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन हमें बायोमास बिजली संयंत्रों की आवश्यकता है क्योंकि इसे वायु प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है। 

गुप्ता आगे कहते हैं कि पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड 4 रुपये (प्रति यूनिट) की दर से खरीदने के लिए तैयार है, लेकिन डेवलपर्स की लागत 8 रुपये (प्रति यूनिट) है। इस अंतर को भरने के लिए, हम केंद्र से अनुरोध कर रहे हैं कि वह हमें 5 रुपये प्रति यूनिट वायबिलिटी गैप फंडिंग के रूप में प्रदान करे। जब तक इस कमी को पूरा नहीं किया जाता, कोई भी डेवलपर इस तरह के और प्लांट लगाने के लिए आगे नहीं आएगा। हालांकि मौजूदा बायोमास बिजली संयंत्र पुराने बिजली खरीद समझौतों (पीपीए) द्वारा शासित होते हैं, जिसमें 8.36 रुपये प्रति यूनिट तक की मांग होती हैं। राज्य सरकार अब दरों को एक रुपये प्रति यूनिट कम करने पर विचार कर रही है।

मशीनों की वजह से बढ़ता कर्ज

यह केवल उत्पादन और प्रतिस्पर्धा की उच्च लागत नहीं है जो चिंता का विषय है। अन्य मुद्दे भी हैं। बेलर और रेक मशीन का उपयोग आसान परिवहन के लिए पुआल को बंडलों या गांठों में इकट्ठा करने और कंप्रेस करने के लिए किया जाता है।

पंजाब में इस समय करीब 500 ऐसी मशीनें काम कर रही हैं। जबकि इन मशीनों के मालिक और संचालन करने वाले बायोमास संयंत्रों को पुआल की गांठें बेचकर कमाते हैं। किसानों को कुछ नहीं मिलता है और कई बार खेत साफ करने के नाम पर उन्हें 500 रुपए प्रति एकड़ की दर से भुगतान भी करना पड़ता है। खेत साफ करने में 2-3 दिन लग सकते हैं और कभी-कभी किसान इतना लंबा इंतजार करने के लिए तैयार नहीं होते हैं, और पराली जलाना उन्हें आसान तरीका लगता है। 

एक कपड़ा कंपनी में लगे कैप्टिव बायोमास बिजली को बंडल स्ट्रॉ की आपूर्ति करने वाले हरभजन सिंह कहते हैं कि इस व्यवसाय में अधिक लाभ नहीं है। मशीनों, ईंधन, परिवहन और मजदूरी देने में खर्चा आता है, इसलिए हम किसान को भुगतान नहीं कर सकते हैं। खेत और बिजली संयंत्र के बीच की दूरी अधिक होने पर उनसे पैसा लेना पड़ता है।

हम पिछले साल तक 135-150 प्रति क्विंटल पुआल बेचते थे। अक्सर भुगतान में भी देरी होती है। इस साल, हमने बेलर मालिकों का एक संघ बनाया और बिक्री मूल्य 174 रुपये पर तय किया। इसके अलावा, हमने किसानों से शुल्क नहीं लेने का फैसला किया। वजह धान की कटाई में देरी हुई थी और वे अधिक समय बर्बाद करने को तैयार नहीं थे।

प्लांट मैनेजरों का मानना ​​है कि सरकार को किसानों को प्रोत्साहन देना चाहिए और बड़ी मशीनों को भी सब्सिडी देनी चाहिए। अरविंद बेदी बताते हैं कि अगर किसान पराली जलाते हैं तो हमें ईंधन की कमी का सामना करना पड़ता है। अगर वित्तीय सहायता मिलती है, तो आग की घटनाएं कम हो जाएंगी।

उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य को बड़ी बेलर मशीनों को भी सब्सिडी देनी चाहिए जो एक दिन में लगभग 100 एकड़ जमीन साफ ​​कर सकती हैं, क्योंकि धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच काफी कम समय बचता है। लेकिन इस क्षेत्र में अनिश्चितताएं कईयों के लिए नुकसान का सौदा साबित हो रही हैं। पटियाला के पास पंजाब बायोमास पावर लिमिटेड द्वारा स्थापित 12-मेगावाट बायोमास-आधारित बिजली संयंत्र 2017 में घाटे में चलने के बाद बंद हो गया, जिससे कई किसान कच्चे माल की आपूर्ति कर रहे थे।

पटियाला जिले के मगर गांव के सुखचैन सिंह कहते हैं कि उन्होंने हमें उच्च लागत वाली मशीनें खरीदने के लिए प्रेरित किया लेकिन कंपनी ने कुछ वर्षों के बाद भुगतान में देरी करना शुरू कर दिया। हमने मशीनों में निवेश करने के लिए कर्ज लिया और पुआल के संग्रह और परिवहन पर पैसा खर्च किया। बेलर मशीन की कीमत उस समय 9-10 लाख थी। हम दो भाइयों के पास दो मशीनें हैं और कंपनियों से 20 लाख रुपए लेना बचा है।

हम कर्ज नहीं चुका सके और एक एकड़ जमीन बेचनी पड़ी। हम कह सकते हैं कि बायोमास प्लांट ने हमारी एक एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया। कंपनी ने अभी तक क्षेत्र के लगभग 50 किसानों के चार करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया है। जब संयंत्र चालू था, तो इसने क्षेत्र में खेत की आग को 75 प्रतिशत तक कम करने में मदद की और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार भी पैदा किया। लेकिन अब किसान पराली जलाने को मजबूर हैं। 

हमने जब अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, लेकिन उनके आधिकारिक संपर्क नंबर पर बार-बार प्रयास करने के बावजूद उन तक नहीं पहुंच जा सका।

भूसी के छर्रे और ब्रिकेट

अन्य उपायों के अलावा, पुआल को ब्रिकेट (पुआल को कंप्रेस कर ईंट की शक्ल देना) और छर्रों में बदलने के लिए कुछ प्रयोग चल रहे हैं। इससे उद्योगों में जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में उपयोग के लिए पुआल का थोक घनत्व और कैलोरी मान बढ़ जाता है।

पंजाब स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी की कार्यकारी निदेशक जतिंदर कौर अरोड़ा ने कहा कि हम ब्रिकेट बनाने में सक्षम हैं जिनका उपयोग औद्योगिक बॉयलरों और ईंट भट्टों में आग लगाने के लिए किया जा सकता है। धान की पराली का प्रसंस्करण एक बड़ी चुनौती है क्योंकि इससे मशीनरी में भारी टूट-फूट होती है। हम तकनीकी नवाचारों के माध्यम से उस पर काबू पाने की कोशिश में हैं। ये ब्रिकेट पारंपरिक ईंट भट्टों में जीवाश्म ईंधन की जगह ले सकते हैं और अब औद्योगिक बॉयलरों में इसपर परीक्षण जारी है। 

हालांकि, वर्तमान में  केवल बड़ी कंपनियां जिन्होंने विशेष रूप से बायोमास-आधारित बॉयलर स्थापित किए हैं, धान के पुआल ब्रिकेट का उपयोग करने में सक्षम हैं। मौजूदा बॉयलरों को धान के भूसे का उपयोग करने में सक्षम होने के लिए बदलावों की आवश्यकता है।

साथ ही, धान के भूसे से बने छर्रे उद्योगों के लिए वैकल्पिक ईंधन का एक अन्य स्रोत हो सकते हैं। एटूपी एनर्जी सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुखमीत सिंह ने बताया कि हम आमतौर पर फार्मास्युटिकल, फूड प्रोसेसिंग और रंगाई उद्योगों को सेवा देते हैं, जो इन पेलेट्स का उपयोग भाप बनाने और टर्बाइन चलाने के लिए कर रहे हैं।”

वर्तमान समय में, नए हरित विकल्पों की तलाश करने वाले जिम्मेदार ब्रांड हमारे ईंधन का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन हमें बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की आवश्यकता है। हम उन निवेशकों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और जो लंबी अवधि के लिए हैं। ऐसे निवेशक केवल रिटर्न के बजाय टिकाऊ समाधान पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। 

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