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वायु प्रदूषण : खतरनाक है लेकिन, समाधान यहां है

चित्र : वायु प्रदूषण।

वायु प्रदूषण रोकने का एक ही समाधान है और वो है हम पर्यावरण में कम से कम जहरीली गैसों का उत्सर्जन करें। हम यानी इंसान और कम करने का मतलब पब्लिक ट्रांसपोर्ट यूज करें। यदि आप टू या फॉर व्हीलर चलाते हैं तो उससे कम से कम प्रदूषण हो, यह खुद सुनिश्चित करें।

वायु प्रदूषण रोकने के बारे में दुनिया में बहुत सी बातें कही जा रही हैं, कुछ अमल हो रही हैं, कुछ किताबों में सिमटी उस वक्त सिहर उठती है जब वायु प्रदूषण के कारण किसी रिपोर्ट से खुलासा होता है कि वायु प्रदूषण के कारण ये या वो बीमारी हो रही है।

साल 2021 में सेव द चिल्ड्रन इंटरनेशनल ने ‘सिटीज 4 चिल्ड्रन’ रिपोर्ट जारी की थी, इसके मुताबिक हर साल लगभग 2,37,000 से अधिक बच्चों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से होने वाले सांस के संक्रमण के कारण होती है।

बच्चे जब गर्भ में होते हैं तब वायु प्रदूषण और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। ऐसे बच्चे भविष्य में तनावपूर्ण जीवन जीते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्भाशय प्रदूषण के खतरे और भ्रूण के विकास, जन्म के समय और बचपन में फेफड़ों के कार्य के विकास के बीच संबंध पाया गया है।

तो वहीं, समय के थोड़ा पीछे जाएं तो स्वास्थ्य प्रभाव संस्थान (HEI) की ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020’ रिपोर्ट के अनुसार, उस साल PM2.5 और PM10 के उच्च स्तर के कारण 1,16,000 से अधिक भारतीय शिशुओं की मृत्यु हुई। इनमें से आधे से अधिक मौतें PM2.5 से जुड़ी थीं, जबकि अन्य इंडोर प्रदूषण जैसे, खाना पकाने के लिये कोयला, लकड़ी और गोबर आदि के उपयोग से होने वाले प्रदूषण से जुड़ी हुई थीं।

लगभग 3.8 मिलियन लोगों की असामयिक मृत्यु

लैंसेट प्लेनेटरी हेल्थ जर्नल द्वारा प्रकाशित ‘2017 ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़’ रिपोर्ट कहती है कि भारत, जहां वैश्विक आबादी का तकरीबन 18 प्रतिशत हिस्सा निवास करता है, में वैश्विक स्तर पर वायु प्रदूषण के कारण होने वाली कुल असामयिक मौतों में से 26 प्रतिशत मौतों के मामले दर्ज किये जाते हैं।

साल 2017 में भारत में प्रत्येक आठ मौतों में से एक मौत के लिये वायु प्रदूषण प्रत्यक्ष तौर पर उत्तरदायी था और अब वायु प्रदूषण देश में धूम्रपान से भी अधिक लोगों की जान लेता है। रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू वायु प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष लगभग 3.8 मिलियन लोगों की असामयिक मृत्यु होती है।

ये तीन रिपोर्ट इस बात की गंभीरता बताने के लिए काफी है कि वायु प्रदूषण कितनी बड़ी समस्या है। हम यहां समस्या से ज्यादा समाधान पर बात करें तो वायु प्रदूषण रोकने की शुरूआत आपको अपने आप से शुरू करनी होगी।

क्या करना होगा?

घरेलू स्तर पर सबसे पहले अपने वाहनों का रख-रखाव सही तरीके से करें। यदि धुआं छोड़ते हैं तो जांच और ठीक करवाएं। जब जरूरत हो तभी निजी वाहन का प्रयोग करें। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का यूज करें। जब कूलर और पंखा एक बेहतर विकल्प है तब घरों/ऑफिस में एसी का प्रयोग तभी करें जब बहुत ज्यादा जरूरत हो। घर या कार्यस्थल के आस-पास पेड़-पौधे लगाएं। प्लास्टिक, टायर या किसी अपशिष्ट पदार्थों को जलाएं नहीं बल्कि उनसे सही निपटान के लिए अन्य विकल्प आजमाएं। ध्रूमपान ना करें।

कमर्शियल स्तर पर वायु प्रदूषण रोकने के लिए कारखानों की चिमनियों में तकनीक का यूज कर जहरीली गैसों को बहार ना जाने दें इसे चिमनियों में ही फिल्टर कर ठोस बनाएं, ताकि इसका दूसरे अन्य सुरक्षित तरह से निपटान किया जा सके।

पराली से प्रदूषण की समस्या ऐसे होगी खत्म

पराली, वायु प्रदूषण के लिए बड़ी समस्या बनकर उभरा है। यह पहले से है, लेकिन वायु प्रदूषण के अन्य कारणों के कारण यह भी समस्या बना हुआ है और इस समस्या का समाधान मौजूद है। यदि धान या गेहूं या अन्य फसलों की कटाई के बाद किसान पराली को खेत में न जलाएं बल्कि उचित ढंग से उसका प्रबंधन कर सकें इसके लिए सरकार आर्थिक सहायता भी मुहैया कराएगी।

किसान पराली को खेत में न जलाते हुए। उससे भूसा तैयार कराकर गोशालाओं को भिजवा दें। इस पर आने वाला खर्च का भुगतान ग्राम पंचायतें से राज्य वित्त आयोग से मिली धनराशि करती हैं। इसके अलावा अनेक ऐसे विकल्प भी हैं जिससे किसान बड़ी आसानी से पराली का उपयोग हरी खाद के तौर पर कर सकते हैं। इससे उनके खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी।

पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए कई उपाय किये जा रहे हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), दिल्ली के इन्क्यूबेशन सेंटर से जुड़े एक स्टार्टअप ने अब फसल अपशिष्टों से ईको-फ्रेंडली कप और प्लेट जैसे उत्पाद बनाने की पद्धति विकसित की है।

लैब्स नामक स्टार्टअप के सीईओ अंकुर कुमार ने बताते हैं, ‘इस तकनीक की मदद से किसी भी कृषि अपशिष्ट या लिग्नोसेल्यूलोसिक द्रव्यमान को होलोसेल्यूलोस फाइबर या लुगदी और लिग्निन में परिवर्तित कर सकते हैं। लिग्निन को सीमेंट और सिरेमिक उद्योगों में बाइंडर के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। फिलहाल, हम धान के पुआल से बनी लुगदी से टेबलवेयर बना रहे हैं।’

वायु प्रदूषण के बहुत सारे कारण हैं, जिसे यहां लिखने और आपके पढ़ने से ज्यादा, इन्हें कम करने की जरूरत है जिसे हम अपने अपने स्तर पर सभी मिलकर कम कर सकते हैं।

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