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समाधान : मुगल सैनिकों की ‘कनात’, बुझा रही बुरहानपुर की प्यास

बुरहानपुर का कुंडी भंडार नेटवर्क। शहर में 102 ऐसी कुंडी (कुआं) मौजूद हैं। यह कुएं अंडरग्राउंड नहर से जुड़े हुए हैं। चित्र : लोकेंद्र ठक्कर।

  • मनीष चंद्र मिश्रा।

साल 2016-17 में प्रकाशित एक सरकारी रिपोर्ट कहा गया कि मध्य प्रदेश का बुरहानपुर, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने वाले जिलों में शामिल है। आने वाले वक्त में इस शहर में जल संकट और गंभीर हो सकता है। इस समस्या का एक अनूठा समाधान मिला है। शहर में मौजूद 400 साल पुराने अंडरग्राउंड वाटर सप्लाई सिस्टम को दोबारा चलन में लाने की कोशिश हो रही है। जल संकट से निपटने के लिए मुगलों ने इस संरचना का विकास किया था।

जल आपूर्ति के इस तंत्र को कुंडी भंडार कहते हैं जिससे शहर के एक बड़े इलाके में पानी की आपूर्ति होती रही है। कुंडी भंडार जैसा पारंपरिक जल आपूर्ति का तंत्र मध्य प्रदेश सहित देश के कई पुराने शहरों के लिए जल संकट का एक समाधान हो सकता है।

पुरानी इमारतें, विशाल दरवाजों और दीवार से घिरा शहर बुरहानपुर मुगलकालीन विरासत को आज भी सहेजे हुए हैं। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से तकरीबन 300 किलोमीटर दूर स्थित इस शहर को, मुगलों ने दक्षिण भारत की ओर साम्राज्य फैलाने के लिए, अपना सैन्य ठिकाना बनाया था। हालांकि, समय के साथ शहर की शान-ओ-शौकत भी खत्म हुई और विरासतों की चमक भी फीकी पड़ गयी।

लेकिन इसी विरासत में ताप्ती नदी के किनारे बसे बुरहानपुर को अपनी सबसे बड़ी समस्या का समाधान मिला है। नदी के किनारे बसे होने के बावजूद भी यह शहर जल संकट की समस्या से दो-चार होता रहा है। जलवायु परिवर्तन और तेजी से हो रहे शहरीकरण की वजह से यह समस्या और विकृत ही होती जा रही है। मध्य प्रदेश सरकार ने 2016-17 में एक रिपोर्ट जारी की जिसमें बुरहानपुर को जलवायु परिवर्तन से दस सबसे अधिक प्रभावित शहरों में शामिल किया गया।

एक वक्त ऐसा भी आया जब गर्मी के दिनों में पानी के लिए लंबी कतारें लगने लगीं, फिर नीति निर्माताओं को अपनी विरासत याद आई। सनद रहे कि यहां की मिट्टी में 400 साल पुराना जल आपूर्ति का एक समूचा तंत्र दबा हुआ है। हाल के कुछ वर्षों में इस पुरानी व्यवस्था को जीवंत करने का काफी प्रयास हुआ और इससे बुरहानपुर शहर की जल आपूर्ति में काफी सुधार आया है।

जल जीवन मिशन के डैशबोर्ड के मुताबिक इस वर्ष सौ फीसदी घरों में नल जल पहुंचाने के मामले में बुरहानपुर मध्य प्रदेश का पहला जिला बन गया। जिले में 1,01,952 परिवार हैं जिसमें से 1,01,905 घरों में नल कनेक्शन दिया जा चुका है। यह सब कैसे संभव हुआ इसको समझने के पहले हमें मुगलों के समय की बनाई एक खास संरचना को समझना होगा।

मुगल सैनिकों के लिए बना था कुंडी भंडारा

बुरहानपुर शहर को 15वीं से 17वीं सदी के दौरान विकसित किया गया। कहा जाता है कि मुगल साम्राज्य के दो लाख सैनिक इस शहर में रहते थे। उस वक्त यहां 35,000 नागरिक रहते थे। पानी की मांग को पूरा करने के लिए यहां कुंडी भंडार नामक एक अंडरग्राउंड नेटवर्क बनाया गया। इसे ‘कनात’ के नाम से भी जानते हैं।

जिला पुरातत्व समिति से जुड़े बुरहानपुर निवासी शालिकराम चौधरी बताते हैं कि कुंडी भंडार को मुगल सुबेदार अब्दुल रहीम खान खाना ने 1615 ईस्वी में विकसित किया था। बुरहानपुर में इस तकनीक से बनाए गए कुंडी भंडार, जली करंज, मूल भंडारा और शकर तालाब सहित कई जल स्रोत हैं, लेकिन उनमें से कुंडी भंडार ही ठीक हालत में है।

बुरहानपुर में मौजूद 400 साल पुराना मुगलों का बनाया कुंडी भंडार शहर की जल समस्या दूर कर रहा है। चित्र : शालिकराम चौधरी।

उन्होंने कुंडी भंडार को समझाते हुए कहा कि इसमें कुंओ और जमीन के भीतर एक बड़े नहर का जाल होता है। संगमरमर से बने विशाल पाइप से सभी कुएं आपस में जुड़ते हैं। इसकी शुरुआत शहर के साथ लगे सतपुड़ा पहाड़ी पर 30 मीटर ऊंचाई से होती है और शहर के बड़े हिस्से में 102 कुंडी या कुएं के साथ यह जुड़ी हुई है। कुओं की गहराई 6 मीटर से लेकर 24 मीटर तक है और उनकी गोलाई 0.75 से 1.75 मीटर तक है। इसे इस तरह बनाया गया है कि पानी की सप्लाई बिना बिजली के हो जाती है। गुरुत्वाकर्षण बल और हवा के दबाव से पानी शहर भर में जाता है।

कुंडी भंडार का निर्माण अरब/फारस खाड़ी क्षेत्र के निर्माणों से प्रेरित होकर किया गया था। यह भूमिगत नहर की तरह होता है जिसका कुछ हिस्सा कुंडी (कुएं) के रूप से जमीन के ऊपर होता है।

वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के सीनियर मैनेजर-क्लाइमेट सारांश बाजपेयी बताते हैं कि इसे इस तरीके से डिजाइन किया गया है कि इसमें पानी की सप्लाई के लिए ऊर्जा या बिजली की जरूरत नहीं होती। पहाड़ी पर जो बारिश का पानी जमा होता है वह भंडार यानी भूमिगत नहर के जरिए शहर मे मौजूद 102 कुओं तक पहुंचता है। इस जल स्रोत से बुरहानपुर शहर के 15 फीसदी परिवारों को पानी मिलता है।

बुरहानपुर को पानी की अबाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने कुंडी भंडार सहित दूसरे पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई ताकि बरसात के पानी को अच्छे से संचय किया जा सके। इस काम को वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत जारी एक प्रोजेक्ट के तहत किया गया।

बाजपेयी कहते हैं कि इसके तहत 3500 घरों को सीधे तौर पर और 10 से 15 हजार घरों को अप्रत्यक्ष तौर पर पानी की सुविधा मिली। मार्च 2019 में शहर को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए सक्षम बनाने की कोशिशें शुरू हुईं। इसे फरवरी 2021 तक पूरा करने की योजना थी। कोविड-19 महामारी की वजह से काम में देरी हुई, लेकिन काम का मुख्य हिस्सा पूरा हो चुका है। सिर्फ दो या तीन कुंडी में सफाई का काम बचा है।

अमित वहरवाग और अल्पना डोंगरे ने कुंडी भंडार पर एक अध्ययन एमडीपीआई जर्नल में प्रकाशित किया। उन्होंने पाया कि कुंडी भंडार का पानी शहर के मुख्य स्थान जैसे हमाम, बगीचा, मस्जिद और लोगों के रहने के इलाके में पहुंचता था। शहर में कुंडी भंडार के अलावा सूका भंडारा, त्रिकुटी भंडारा, मूल भंडारा और चिंताहरण जैसे कई जल स्रोत मौजूद थे।

कुछ साल पहले तक बुरहानपुर के कुंडी भंडार को देश का इकलौता कनात सिस्टम माना जाता था। हालाकिं, हाल ही में कर्नाटक में भी एक कनात खोजा गया है। यह 15वीं शताब्दी में बीदर किले में बनाया गया था। तीन किलोमीटर में यह कनात बना था। कनात की तरह का निर्माण केरल के कासरगोड में भी दिखता है। इसे यहां सुरंग के नाम से जानते हैं।

पारंपरिक जल स्रोतों को बचाने की कवायद

लोकेंद्र ठक्कर बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट के तहत 71 कुओं या कुंडी को ठीक किया गया। इसके अलावा शहर में 250 इमारतों पर रेनवाटर हार्वेस्टिंग किया गया, जिनमें से अधिकतर सरकारी इमारतें थीं। एक और महत्वपूर्ण काम शहर से सटे जंगल में किया गया। वह है पौध-रोपण और घास के मैदानों का संरक्षण। यहां से ही कुंडी भंडार को पानी मिलता है।

इस प्रोजेक्ट को लेकर हुआ पर्यावरण प्रभाव आंकलन (इआईए) में पाया गया कि बुरहानपुर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन 13.75 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) पानी की आपूर्ति करता है। जबकि यहां 32.5 एमएलडी पानी की मांग है। इस तरह रोजाना 18.65 एमएलडी पानी कम पड़ता है। इस प्रोजेक्ट के पूरा हो जाने के बाद स्थिति में काफी सुधार होगा।

प्रोजेक्ट रिपोर्ट के मुताबिक चार चरणों में इस प्रोजेक्ट को पूरा किया गया। इसमें रेनवाटर हार्वेस्टिंग, कैचमैंट एरिया में इको-रिस्टोरेशन और आम लोगों के सहयोग शामिल है। लोकेंद्र आगे बताते हैं कि प्रोजेक्ट के जरिए हर साल 17.23 लाख रुपए बचाया जा सकता है, जो कि म्यूनिसिपैलिटी को पंपिंग के लिए करना होता है।

संरक्षण के काम में खर्च की जानकारी देते हुए लोकेंद्र कहते हैं कि क्लाइमेट चेंट एक्शन प्रोग्राम के तहत प्रोजेक्ट के लिए पांच करोड़ तक खर्च हो सकते हैं। इस काम में कई चुनौतियां हैं जैसे झाड़ियों को साफ करना और जल स्रोतों को बिना नुकसान पहुंचाए साफ करना।

बुरहानपुर के स्थानीय निवासी गजानन वारुडे कहते हैं कि कुंडी भंडार साफ होने से लालबाग इलाके में पानी की दिक्कत दूर हो गई है।हालांकि, स्थानीय जानकार मानते हैं कि कुंडी भंडार के अलावा दूसरे पुराने जल स्रोतों की सफाई भी जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन से जूझने में मददगार पारंपरिक जलस्रोत

भारतीय शहर जलवायु परिवर्तन का खामियाजा भुगत रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप पानी की मांग और आपूर्ति के बीच व्यापक अंतर है। मध्य प्रदेश के अधिकांश शहरी क्षेत्र पर्यावरणीय चुनौतियों और जल संकट का सामना कर रहे हैं। स्थायी तरीके से निवासियों की बढ़ती पानी की जरूरतों को पूरा करना एक चुनौती है।

लोकेंंद्र ठक्कर बताते हैं कि यह परियोजना बुरहानपुर शहर की जलवायु परिवर्तन को जूझने के लिए सक्षम बनाने के लिए एक प्रभावी तरीका लगता है जिसमें पारंपरिक जल प्रबंधन तकनीक को शामिल किया गया है। ऐसी परियोजना राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी बनाई जा सकती है। विशेष रूप से पश्चिमी भाग और मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में जहां पारंपरिक जल संरचनाओं जैसे बावड़ियों (कदम कुओं), पुराने कुएं काफी मात्रा में हैं।

सतपुड़ा पहाड़ी के इस जंगल से कुंडी भंडार को पानी मिलता है। चित्र : लोकेंद्र ठक्कर।

शहरी क्षेत्रों में यह प्रोजेक्ट कम लागत वाला एक मॉडल है। बुरहानपुर परियोजना को इंदौर में भी लागू किया जा रहा है। मध्य प्रदेश के पश्चिमी जिलों जैसे धार, रतलाम, शाजापुर, खंडवा, खरगोन, बड़वानी आदि में इसी तरह का हस्तक्षेप किया जा सकता है। इंदौर में बुरहानपुर जैसी परियोजना लागू की जा रही है, जहां सामुदायिक भागीदारी से लगभग 300 पारंपरिक जल स्रोतों को बहाल किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य मौजूदा जल वितरण प्रणाली पर बोझ को कम करना है।

परियोजना के कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मध्य प्रदेश के हाइड्रोजियोलॉजिस्ट अनिल जायसवाल कहते हैं कि हम इस समाधान को अन्य शहरों में भी दोहरा सकते हैं, लेकिन हमें अलग-अलग शहरों के लिए तरीके को बदलने की जरूरत है। जैसे मैंने खंडवा प्रशासन के साथ काम किया जहां मिट्टी की संरचना बुरहानपुर से अलग है।

खंडवा के लिए सबसे अच्छा उपाय बोरवेल को ठीक करना और वर्षा जल का संचयन करना था। ओरछा, छतरपुर, टीकमगढ़ जैसे शहरों में पारंपरिक कुएं अधिक सफल हैं, जिनमें कुएं जैसी पुरानी जल संरचनाएं हैं। इसलिए हमें जल संकट को खत्म करने के लिए उन शहरों में पुराने ढांचे को बहाल करने की जरूरत है। वैसे, बुरहानपुर शहर की मिट्टी कठोर है और इसलिए कनात प्रणाली की जरूरत हुई।

तो वहीं, बुरहानपुर निवासी शालिकराम चौधरी कहते हैं कि कुंडी भंडार बुरहानपुर के पूरे कनात नेटवर्क का एक छोटा सा हिस्सा है। अपनी हाल की यात्राओं में मैंने पाया कि पूरे नेटवर्क को फिर से जीवंत करने के लिए बड़े पैमाने पर काम की जरूरत है।

This article first appeared on Mongabay.

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