Press "Enter" to skip to content

विचार / यदि एक बेहतर दुनिया चाहिए तो हमें क्या करना होगा?

  • दलाई लामा, लेखक आध्यात्मिक गुरू हैं।

स्थायी भविष्य की कुंजी एक परोपकारी मानसिकता में है जो प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग करती है और लोगों की भलाई के लिए काम करती हो। हम यहां जानेंगे कि, ‘कैसे 21वीं सदी में परोपकारी प्रेम का भाव रखने से हम अपने बीच के विभाजनों को ठीक कर सकते हैं और वास्तविक रूप से वैश्विक शांति, न्याय और खुशी की ओर बढ़ सकते हैं?’

मैंने अपने जीवनकाल में कई तरह के युद्धों में बहुत खून-खराबा देखा है। इस तरह की हिंसा का परिणाम सिर्फ पीड़ा और अधिक घृणा है। यह एक कारण है कि मैं यूरोपीय संघ की प्रशंसा करता हूं। इसके सदस्यों में कई ऐसे राष्ट्र शामिल हैं जो ऐतिहासिक रूप से सदियों से एक-दूसरे से लड़ते रहे हैं। इनमें फ्रांस और जर्मनी नियमित रूप से लड़ने-वालों में रहे हैं।

हालांकि, दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होंने महसूस किया कि अपने पड़ोसी को दुश्मन के रूप में देखना कोई अच्छी बात नहीं है। इस पर विचार करें कि उस भीषण युद्ध में कितने लोगों की जान चली गई है और इसके बाद के पिछले 70 सालों से अब तक के शांति काल में कितने लोगों की जान बची है।

आज, हमें पूरी मानवता के बारे में सोचना होगा। अपने राष्ट्र या महाद्वीप के बारे में सोचने भर से अब काम नहीं चलने वाला है। अब पूरी दुनिया के बारे में सोचना होगा। हमें यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि हम सभी वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं और हम सभी को जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से खतरा है।

हमें यह मानना होगा कि बुनियादी स्तर पर हम सभी मनुष्य समान हैं। हमारी त्वचा के रंग, हमारी आंखों के आकार या हमारी नाक के आकार में मामूली अंतर हो सकते हैं। लेकिन जब भावनाओं और चेतना की बात आती है, तो हम सब एकसमान हो जाते हैं, आपने कोरोना महामारी के समय यह देखा है।

मैं मानवता की एकता के बारे में व्यापक जागरुकता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हूं। जब मैं तिब्बत में था, मैं स्वीकार करता हूं कि मैं केवल अपने देशवासी तिब्बतियों के बारे में ही सोचता था। लेकिन भारत में निर्वासन में आने के बाद मैंने कई अलग-अलग जगहों के लोगों से मुलाकात की और उनसे दोस्ती की। मुझे अहसास हुआ कि इंसान होने के नाते हम सभी समान हैं।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम पूरी दुनिया के बारे में सोचते हैं। यह यथार्थवादी है। हमें मानवता की एकता को याद करने की आवश्यकता है। धर्म, नस्ल या राष्ट्रीयता को लेकर हमारे बीच के अंतर हमारे मानव होने की तुलना में दोयम दर्जे की बात है।

आप धार्मिक हैं या नहीं, यह आपका व्यक्तिगत मामला है। लेकिन सार्वभौम तथ्य यह है कि हमारी सभी धार्मिक परंपराएं प्रेमपूर्ण करुणा के महत्व का संदेश देती हैं। यही कारण है कि सभी धर्म एक साथ रह सकने में समर्थ हैं। इसलिए मैं विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव को प्रोत्साहित करने को लेकर प्रतिबद्ध हूं।

हम सभी मनुष्य एक समान ही हैं। हालांकि पुरुषों और महिलाओं के बीच थोड़ा सा अंतर है। जब शारीरिक ताकत के संदर्भ में तुलना की जाती है तो महिलाएं आमतौर पर इतनी मजबूत नहीं होती हैं। हालांकि बुद्ध ने पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार प्रदान किए और जहां तक बुद्धि और ज्ञान का सवाल है, इनके बीच कोई अंतर नहीं है, न ही पुरुषों और महिलाओं के दिमाग में ही कोई अंतर है।

हमें पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता लाने के लिए अधिक से अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। और इस समानता को लाने में जब धार्मिक विश्वास या पारंपरिक रीति-रिवाज बाधा बन रहे हों तो उन्हें बदलने का समय आ गया है। मोटे तौर पर पुरुषों और महिलाओं को एक-दूसरे की जरूरत होती है और दोनों की जरूरत बराबर होती है।

आप हमें फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और लिंक्डिन पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।

More from जीने की राहMore posts in जीने की राह »

Be First to Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *