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विमर्श / पुलिस कार्रवाई में ‘सहानुभूति और करुणा’ क्यों है जरूरी

चित्र: कोरोना काल में भारतीय पुलिस एक वृद्ध महिला की मदद करते हुए।

  • दलाई लामा, तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं।

चीन दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, इसकी प्राचीन संस्कृति है और पारंपरिक रूप से वह बौद्ध मताबलंबी बहुल देश है। लेकिन वहां कोई आजादी नाम की चीज नहीं है। यह एक अधिनायकवादी शासन है। दूसरी ओर, भारत में वास्तविक स्वतंत्रता और लोकतंत्र है। दुनिया के सभी प्रमुख धर्म यहां फल-फूल रहे हैं।

जब मैं भारतीय मुसलमानों से मिलता हूं, तो पाता हूं कि शिया और सुन्नियों के बीच यहां कोई विवाद नहीं है। हजारों वर्षों से भारतीयों ने ‘अहिंसा’ और ‘करुणा’ का पालन किया है। ये कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जिनका अनुसरण यह देश करता आया है और इन्हीं सिद्धांतों का आश्रय लेकर यहां का लोकतंत्र पनपा और उम्मीद है आगे भी रहेगा।

भारत की धार्मिक परंपराएं, स्थानीय समुदाय, विभिन्न भाषाएं और लेखन के तरीके सभी मान्यता प्राप्त हैं और यहां के रहने-वाले सभी लोग (कुछ अपवादों को छोड़कर) खुशी के साथ रहते हैं। यह पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण है। यहां विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों वाले लोग एक साथ रह सकते हैं और भारतीय पुलिस अहिंसा और करुणा की रक्षक है जो इस भावना को पूरा करती है।

मैं भारतीय पुलिस से बहुत खुश हूं। मैं उनसे नहीं डरता। हर सुबह जब मैं अपने घर से बाहर निकलता हूं तो मुझे वहां पुलिस अधिकारी दिखाई देते हैं जो दिन-रात मेरी रक्षा करते हैं। मैं उनका अभिवादन करता हूं और हम अमूमन एक-दूसरे को चुटकुले सुनाते हैं। इसलिए मैं आपको जो बताना चाहता हूं, वह यह है कि भारतीयों की वर्तमान युवा पीढ़ी को ‘अहिंसा’ और ‘करुणा’ पर अधिक ध्यान देना चाहिए। इन सिद्धांतों की पूरी दुनिया को बहुत जरूरत है। यह कुछ बातें हैं जो मैं आपको बताना चाहता हूं। अंग्रेजों ने आधुनिक शिक्षा और तकनीकी विकास की शुरूआत की। यह उपयोगी हैं। लेकिन भारतीयों को अपनी खुद की परंपराओं को भी संरक्षित करना चाहिए जो हजारों साल पुरानी हैं।

पिछली शताब्दी में महात्मा गांधी ने जिस तरह से स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अहिंसा का प्रयोग किया, उससे दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला से लेकर अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग तक, बहुत प्रभावित हुए। इस सदी में भी भारत में जहां विभिन्न भाषाओं, विभिन्न धर्मों और अन्य मतों के लोग शांति के साथ रहते हैं, वह बाकी दुनिया के लिए एक उदाहरण है। ऐसी दुनिया में जहां नस्ल, राष्ट्रीयता और धर्म के मतभेदों पर बहुत अधिक ध्यान दिया जा रहा है, भारत लोगों और राष्ट्रों के बीच सद्भाव को बढ़ावा दे सकता है।

आज दुनिया में सात अरब से ज्यादा लोग रहते हैं और मनुष्य होने के नाते ये सभी समान हैं। हम सभी को इस ग्रह पर एक साथ रहना होगा। हम एक वैश्विक अर्थव्यवस्था में रहते हैं। हम ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं का सामना करते हैं जो हम सभी को प्रभावित करती हैं। हमारे बीच के जो अंतर हैं, वे छोटे हैं। मानवता की एकता को पहचानने के लिए ये बातें बहुत ही महत्वपूर्ण है।

मैं वास्तव में भारतीय पुलिस की सराहना केवल इसलिए नहीं करता हूं कि वे केवल राष्ट्र की रक्षा करते हैं। बल्कि इसलिए भी कि वे अहिंसा, करुणा और सद्भाव के सिद्धांतों की रक्षा भी करते हैं। किसी भी कार्रवाई की गुणवत्ता उसके पीछे के मकसद पर निर्भर करती है। कभी-कभी अच्छे कारणों के लिए कठोर उपायों की आवश्यकता हो सकती है। जो भारतीय पुलिस बखूभी कर रही है। तिब्बती मंदिरों में चित्रित कई देवताओं में से कुछ उग्र और क्रोधी हैं। हालांकि, वे सभी दया के भाव हैं। किसी विशेष स्थितियों के मद्देनजर सबसे महत्वपूर्ण है कि सकारात्मक प्रेरणा का होना और व्यापक दृष्टिकोण से लक्ष्य को द़ृष्टि में रखना।

सीमाओं पर पहरा देने वाले पुलिस और सेना के जवान न केवल भारत की भूमि की रक्षा कर रहे हैं, वे सिद्धांतों की रक्षा में अपना बलिदान कर रहे हैं। इसलिए, उन्हें साहसी होना चाहिए और आगे बढ़ने के लिए दृढ़ निश्चयी होना चाहिए। चूंकि भारतीय पुलिस स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा कर रही है, ऐसे मौके भी हो सकते हैं जब कठोर उपायों की आवश्यकता हो। महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपनी प्रेरणा की जांच करें और खुद उन सिद्धांतों को याद करें, जिन पर वे कार्यरत हैं।

व्यापक दृष्टिकोण अपनाकर पुलिस के काम को तनावमुक्त और अनुशासित किया जा सकता है। कभी-कभी सख्त होना पड़ता है। मेरे बचपन की एक घटना को उदाहरण के तौर में बताऊं तो मेरे शिक्षक युवा दलाई लामा की बुद्धि और ऊर्जा को शरारती होने की प्रवृत्ति से पहचानते थे। उन्होंने एक दूसरे शिक्षक को मुझे सख्त और कठोर अनुशासन में रखने के लिए निगरानी के लिए रखा। लेकिन, मैं मानता हूं उस समय की कठिन परिस्थितियों में युवा लड़के दलाई लामा के ही दीर्घकालिक हित छिपे हुए थे।

जब हम चीजों को व्यापक दृष्टिकोण से देखते हैं तो पाते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं। यहां तक कि व्यक्तियों के रूप में हम उस समुदाय पर निर्भर होते हैं, जिस समुदाय में हम रहते हैं। इसलिए, अपने समुदाय के सदस्यों के प्रति करुणा और चिंता दिखाना अंततः हमारे लिए भी अच्छा है। यदि हम इसके बजाय स्वार्थी हैं तो हम खुश नहीं हैं।

करुणा मानव का मूल स्वभाव है। यह सामान्य ज्ञान की बात है कि साधारण करुणा से समुदाय को लाभ होता है। इन सकारात्मक गुणों को मजबूत करने के लिए हमें आधुनिक शिक्षा के साथ ‘अहिंसा’ और ‘करुणा’ के प्राचीन भारतीय सिद्धांतों को संयोजित करने की आवश्यकता है।

जैसा कि हम सब जानते हैं कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए शारीरिक स्वच्छता आवश्यक है, वैसे ही हमें विध्वंसात्मक भावनाओं का नाश करने के लिए भावनात्मक स्वच्छता को अपनाने की जरूरत है। अगर हम अपने मन की शांति को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें अपनी विनाशकारी भावनाओं से निपटना सीखना होगा। चूंकि हम सभी खुश रहना चाहते हैं, इसलिए हम सभी को यह जानना आवश्यक है कि हम आंतरिक शांति को कैसे प्राप्त करें। चाहे हम किसी धार्मिक मत को मानते हों या नहीं।

भारत में धर्मनिरपेक्षता की परंपरा है। यहां सभी धर्मों के लिए सम्मान दिखाना महत्वपूर्ण है। धार्मिक रिवाजों का पालन करना व्यक्तिगत मामला है, जबकि करुणा की भावना पूरे समुदाय को प्रभावित करती है। इससे भी अधिक करुणाजनित प्रेरणा को बनाए रखना धर्म के पालन का ही एक हिस्सा है। यह सकारात्मक और आशावादी बने रहने का तरीका है।

जनता के विश्वास को प्रेरित करने के लिए पुलिस को अपने कार्यों के साथ करुणा को बुद्धिमत्ता को जोड़ना होगा। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को लोकतांत्रिक मूल्यों से प्रेरणा ग्रहण कर आगे बढ़ने की जरूरत है। साथ ही साथ ‘अहिंसा’ और ‘करुणा’ के साथ संबंध बनाए रखना है। व्यावहारिक होना भी महत्वपूर्ण है। भारत स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश है, इसका मतलब यह नहीं है कि सिर्फ इसलिए हर कोई नैतिक सिद्धांतों से प्रेरित है। जब कुछ लोग स्वार्थी और दुर्व्यवहार करते हैं, तो बड़े पैमाने पर समाज के भीतर शांति और सद्भाव की रक्षा के लिए सख्त उपाय आवश्यक हो सकते हैं।

बौद्ध धर्म की न्याय प्रणाली कहती है, ‘आमतौर पर बौद्ध धर्म का पालन व्यक्तिगत मामला है। यदि एक भिक्षु मुख्य उपदेशों में से एक को तोड़ता है,तो उसे मठवासी समुदाय से निष्कासित किया जा सकता है। लेकिन कोई अन्य दंड नहीं हैं। अन्य धार्मिक परंपराएं आचरण और आचार संहिता के नियमों को लागू कर सकती हैं, लेकिन बौद्ध धर्म मुख्य रूप से मन को प्रशिक्षित करने के साथ- मानसिक परिवर्तन, करुणा और आत्म-अनुशासन जैसे आंतरिक मूल्यों पर ही जोर देता है। ऐसी प्रणाली में प्रशिक्षित व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अधिक करुणामय होंगे।’

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