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करुणा / आपके ही पास है ‘आपकी हर समस्या का समाधान’

दलाई लामा ऑनलाइन प्रवचन देते हुए/ चित्र सौजन्य : तेनज़िन जैम्फेल।

  • दलाई लामा, लेखक आध्यात्मिक गुरू हैं।

तिब्बत में बौद्ध धर्म की स्थापना नालंदा परंपरा के आचार्य शांतरक्षित ने की थी। हम भारत से प्राप्त त्रिपिटकों का अध्ययन करते हैं और तीन प्रशिक्षणों की साधना में संलग्न होते हैं। यही वह प्रक्रिया है जिसका मैंने एक भिक्षु के रूप में भी पालन किया। मैंने त्रिपिटकों का अध्ययन किया, इससे मैंने जो समझा उसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश की और ध्यान के द्वारा इसके अनुभव को प्राप्त किया। आज मैं जो समझाने जा रहा हूं वह उस अनुभव पर आधारित है।

मैं सभी धार्मिक परंपराओं का सम्मान करता हूं। हमारे पास अलग-अलग अनुयायियों की योग्यता के अनुकूल अलग-अलग विचार और दार्शनिक दृष्टिकोण हैं। बुद्ध ने अपने शिष्यों की जरूरतों के अनुसार अलग-अलग व्याख्याएं भी दी हैं। हालांकि, ये सभी विभिन्न परंपराएं प्रेम, करुणा और अहिंसा को आगे बढ़ाने के महत्व पर जोर देती हैं। ऐतिहासिक रूप से कुछ लोग धर्म के नाम पर लड़े और मारे भी गए, लेकिन उस तरह का व्यवहार अब अतीत में छोड़ दिया जाना चाहिए।

दुनिया की सभी महान धार्मिक परंपराएं भारत में विकसित हुई हैं और परंपरागत रूप से एक-दूसरे को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यह एक ऐसा शिष्टाचार है, जिसे दुनिया के अन्य हिस्सों में भी अपनाया जा सकता है। बुद्ध अधर्म को पानी से नहीं धोते हैं, न ही वे अपने हाथों से प्राणियों के कष्टों को दूर करते हैं, न ही वे अपनी अनुभवों को दूसरों पर थोपते हैं। वे सत्त्व के सत्य की शिक्षा देकर (प्राणियों) को मुक्त करते हैं।

बुद्ध पहले बोधिचित्त के जागरूक मन को जाग्रत करते हैं। बुद्ध ने कहा, ‘आप अपने स्वामी खुद हैं। आप धर्म की साधना करना चाहते हैं या नहीं, यह आप पर ही निर्भर करता है।’

दु:ख का मूल हमारा चंचल मन है, इसलिए मन को नियंत्रित करने के लिए धर्म की साधना जरूरी है। करुणामय व्यक्ति कई माध्यमों से प्राणियों का प्रबोधन करते हैं। चूंकि प्राणी चीजों की प्रकृति से अनभिज्ञ हैं, इसलिए उन्होंने शून्यवाद का उपदेश दिया जो शांत और अजन्मा है। अपने दशकों के धर्म के अध्ययन के दौरान जो मैंने समझा उसे अपने जीवन में अपनाया और इससे मैंने अपने जीवन में परिवर्तन का अनुभव किया है।

मन को प्रशिक्षित करके प्रतिकूलताओं से पार पाना संभव है। हम नैतिकता की साधना के द्वारा अपने मन की एकाग्रता को विकसित करते हैं और फिर उस एकाग्र मन से देखते हैं कि वस्तु की वास्तविक स्थिति क्या है। इसके परिणामस्वरूप विकसित हुई अंतर्दृष्टि से हम पथ पर अग्रसर होते हैं।

बौद्ध धर्म का मूल आधार चार आर्य सत्य हैं। बुद्ध ने दु:ख और दु:ख के कारण के बारे में उपदेश दिया है। लेकिन उन्होंने यह भी बताया है कि दु:ख और उसके कारण को दूर किया जा सकता है, उससे मुक्ति मिल सकती है। उन्होंने शून्यवाद का उपदेश दिया। ‘हृदय सूत्र’ में बताया गया है कि ‘आत्मा शून्य है, शून्यता ही आत्मा है। शून्यता आत्मा से भिन्न नहीं है, आत्मा भी शून्यता से भिन्न नहीं है।’

मानवता मौजूदा समय में कोविड महामारी और जलवायु परिवर्तन सहित कई संकटों का सामना कर रही है। फिर भी उन्होंने कहा कि मनुष्य के रूप में हमें अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए अपनी अनूठी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। मुझे तिब्बत छोड़ने और शरणार्थी बनने के बाद से उन्हें कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। लेकिन इन कठिनाइयों ने वास्तव में मुझे धर्म की साधना में रचनात्मक योगदान दिया है।

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