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स्वच्छता / हरियाणा के प्रदीप हिमालय की वादियों को बना रहे मनमोहक

हरियाणा के प्रदीप सांगवान वर्ष 2016 में पहली बार हिमाचल प्रदेश आए तो उनसे यहां की गंदगी देखी नहीं गई। उसके बाद से वह पहाड़ों में सफाई अभियान चलाकर प्रकृति को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इलस्ट्रेशन- मोहित नेगी

स्निग्धा नलिनी औरेया।

  • हिमाचल प्रदेश में वेटलैंड को साफ करने वाले हरियाणा के प्रदीप सांगवान कभी फौज में जाने का सपना रखते थे। हिमाचल यात्रा के दौरान उन्हें खूबसूरत पहाड़ को साफ करने का विचार आया।
  • पहली बार वर्ष 2016 में बतौर पर्यटक ट्रैकिंग के वास्ते प्रदीप हिमाचल आए। यहां की गंदगी देखी और तब से इसे साफ करने में लगे हैं।
  • पर्यटकों द्वारा फैलाए कचरे की सफाई के साथ साथ प्रदीप सांगवान पहाड़ पर जल स्रोतों की सफाई भी करते हैं।
  • राज्य में उन्होंने कचरा प्रबंधन दुरुस्त करने के लिए अपने कचरा संग्रह केंद्र बना रखे हैं। इसका उद्देश्य लोगों को कचरा फेंकने में सहूलियत पहुंचाना है।

हिमाचल की खूबसूरत वादियों का लुत्फ लेने देश-दुनिया से लाखों लोग हर साल आते हैं। शहर की भागदौड़ से परेशान लोग यहां चैन की तलाश में आते हैं पर लौटते वक्त जो कचरा वहां छोड़ आते हैं वह इस प्राकृतिक सुंदरता को काफी नुकसान पहुंचाता है। कुछ ऐसा ही नजारा था जब हरियाणा के प्रदीप सांगवान हिमाचल प्रदेश में बतौर पर्यटक आए।

बर्फीली वादियों में उन्होंने गंदगी और प्रदूषण का ऐसा नजारा देखा कि उनका मन विचलित हो गया। बड़ी बात यह रही कि अपने परेशान मन के साथ सांगवान आगे नहीं बढ़ गए। बल्कि इन्होंने वहीं ठहरकर इस समस्या से निपटने की ठानी और पहाड़ों में गंदगी और प्रदूषण को साफ करने का संकल्प लिया।

हरियाणा में बचपन गुजारने वाले प्रदीप सांगवान के लिए हिमाचल के पहाड़ों में घूमना सपना सरीखे था। जब सांगवान राजस्थान के सैनिक स्कूल से पढ़ाई कर रहे थे तो उनकी इच्छा थी कि फौज में जाएं और देश की सेवा करें। पर ऐसा संभव नहीं हो पाया।

सैनिक स्कूल से अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद सांगवान आगे की पढ़ाई के लिए पंजाब आ गए। वर्ष 2016 में अपने दोस्तों के साथ ट्रैकिंग के लिए हिमाचल की वादियों में घूमने आए और फिर एक नई शुरुआत हुई।

हिमालय की दुर्दशा देखकर उन्होंने ‘हीलिंग हिमायल’ नाम से एक समूह की शुरुआत की। नाम के मुताबिक इस समूह का काम हिमाचल की वादियों की साफ-सफाई करना है ताकि हिमालय को स्वस्थ बनाया जा सके। क्लीन अप ट्रैक नाम से एक मुहिम के तहत इस समूह ने पर्यटकों के आने-जाने वाले स्थानों पर कचरे की सफाई करनी शुरू की।

बात हिमाचल प्रदेश की करें तो जैव विविधता के मामले में यह राज्य काफी समृद्ध है। जगह बदलने पर यहां की आबो-हवा भी बदलती है। इन जैव-विविधता वाले क्षेत्र में वेटलैंड्स का महत्वपूर्ण स्थान है। हिमाचल के स्थानीय लोग तालाबों से धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर भी जुड़े हैं।

इन तालाबों की खूबसूरती और अपनी आस्था से प्रेरित होकर हजारों-लाखों सैलानी इधर आते हैं। मसलन वर्ष 2019 में यहां एक करोड़ 70 लाख सैलानी आए। जबकि  यहां की आबादी 60 लाख (2011 जनगणना) है। पर्यटकों की इतनी अधिक आमद से हिमालय के नाजुक वातावरण को काफी नुकसान हो रहा है। पर्यटकों द्वारा फैलाए कचरे का प्रबंधन भी एक बड़ी समस्या है।

जब सांगवान ने हिमालय के प्राकृतिक माहौल को बचाने के प्रयास शुरू किये तो कचरा प्रबंधन की शुरुआत पहाड़ चढ़ने के रास्तों से की। ऐसा करने के पीछे इनकी कोशिश यह भी थी कि अन्य पर्यटकों को भी पहाड़ चढ़ने का एक मकसद दिया जाए। इस तरह समूह बनाकर रास्तों की सफाई करनी शुरू की। पहली यात्रा में ही उन्होंने अपने दोस्तों के साथ चार बोरे भर कचरा पहाड़ से नीचे उतारा।

वो कहते हैं कचरे का वजन अधिक नहीं था लेकिन वह काफी फैला हुआ था। कचरे में सबसे अधिक मात्रा प्लास्टिक की थी। ट्रैक रूट यानी पहाड़ी पर चढ़ने के रास्ते में नदियां भी आती है। यह कचरा अंततः नदियों में ही जाकर गिरता है और इससे जलीय जीवन प्रभावित होता है। 

पर्यटन स्थल की सफाई के बाद सांगवान को इस समस्या के मूल से निपटने का विचार आया। कुछ ऐसा किया जाए जिससे कचरे को फैलने से रोका जा सके। इसके लिए उन्होंने कचरा संग्रह केंद्र बनाये और लोगों को प्रेरित किया कि कचरा वहीं फेंके। कचरे को दोबारा इस्तेमाल में लाने के लिए उन्होंने रक्षम गांव में एक केंद्र बनाया।

धार्मिक महत्व के तालाबों की सफाई

वैसे तो हिमाचल के लगभग सारे तालाब आकर्षण का केंद्र हैं पर धार्मिक महत्व वाले तालाबों पर भीड़ ज्यादा होती है। हिमाचल में ऐसे पवित्र तालाबों की भरमार है। सांगवान ने इन तालाब और झीलों को भी अपने अभियान से जोड़ा। मंडी जिले का पाराशर ऋषि झील समुद्र तल से 2730 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर्यटकों का रेला लगा रहता है।

सांगवान अपनी टोली लेकर यहां सफाई अभियान चलाते हैं। मार्च-अप्रैल और अक्टूबर से पहले, साल में दो बार झील की सफाई की जाती है। इस काम में स्थानीय लोगों का भी सहयोग जाता है।

सांगवान के साथ जुड़े एक स्थानीय कार्यकर्ता विकास कुमार कहते हैं कि पाराशर झील एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। लोग अपनी आस्था की वजह से यहां आते हैं और अपना कचरा छोड़ जाते हैं। बिना पहाड़ की चिंता किए हुए। नतीजा यह हुआ कि यह खूबसूरत स्थान बेहद खराब हालत में है,

वर्ष 2012 में पवन कुमार अत्री और उनके सहयोगी ने एक शोध किया जिसमें सामने आया कि इस झील के आसपास 38 तरीके के पेड़ और पौधे पाए जाते हैं। इस इलाके में जंगली बिल्ली, हिमालय का काला भालू, भेड़िया, गोरल, लाल मुंह वाले बंदर और लंगूर पाए जाते हैं। शोध में सामने आया कि इस इलाके में 11 पक्षियों की प्रजाति भी पाई जाती है। इस इलाके में शोध के समय अच्छी सड़क नहीं थी। अब सड़क की स्थिति सुधर जाने के बाद पर्यटकों की संख्या बढ़ गई है।सांगवान ने लाहौल स्पीति के चंद्रताल और सूरज ताल की सफाई भी की है। 

प्रकृति संवारने में स्थानीय लोगों का भी साथ

किसी गांव में सफाई अभियान चलाने से पहले सांगवान इलाके में जागरुकता अभियान चलाते हैं। वो कहते हैं हम जब भी किसी गांव में जाते हैं और वहां के लोगों को इस काम के बारे में बताते हैं। हम उन्हें सिर्फ ज्ञान नहीं देना चाहते बल्कि उनका साथ लेकर सफाई करना चाहते हैं।

सांगवान बताते हैं कि अबतक सात हजार से अधिक लोगों ने सफाई अभियान में जमीन पर काम किया है, जबकि 1.5 लाख लोग सोशल मीडिया के जरिए सांगवान के साथ हैं। उन्होंने खीरगंगा, श्रीखंड महादेव, हडिंबा मंदिर, जोगिनी झरणा जैसे स्थानों की सफाई की है। चितकुल, रक्षम, बठसेरी, किन्नौर और कांगरा और जैसे गांव की सफाई भी उनके समूह ने की है।

प्लास्टिक पर प्रतिबंध कितना कारगर

अत्री कहते हैं कि हिमाचल प्रदेश में सिंगल यूज प्लास्टिक यानी एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है।बैन के बावजूद सांगवान का अनुभव कहता है कि यह कारगर नहीं हुआ है। उन्होंने अबतक 8,00,000 किलो प्लास्टिक कचरा पर्यटन स्थल से जमा किया है।

आईआईटी मंडी के द्वारा किए एक शोध से पता चलता है कि पहाड़ चढ़ने वाले रास्तों पर प्लास्टिक के पैकिंग में लोग सामान लाते हैं और खाने के बाद उन्हें वहीं छोड़ देते हैं। पहले इन स्थानों पर खाना पारंपरिक बर्तनों में लाया जाता था। वर्ष 2018 में नीति आयोग की एक रिपोर्ट ने हिमालय में टिकाऊ पर्यटन की सिफारिश की थी। जानकार मानते हैं कि हिमालय क्षेत्र में पर्यटन को टिकाऊ बनाने की जरूरत है नहीं तो आने वाले समय में समस्या और गंभीर होगी।

हिमालय क्षेत्र में वेटलैंड

मैदानी इलाकों की तुलना में हिमालय का वेटलैंड काफी अलग होता है। यहां बर्फ पिघलने पर पानी जमा होता है। ऊंचाई पर होने की वजह से यहां बड़े पेड़ नहीं बल्कि घास उगते हैं। हिमाचल प्रदेश में 271 झील हैं जिनका विस्तार 575 हेक्टेयर इलाके में है। राज्य में कांगरा का पोंग जैम, सिरमौर का रेनुका झील और लाहौल स्पीति चंद्रताल रामसर स्थल है।

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