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कोयला खनन / आशंकाओं के अंधकार में, छत्तीसगढ़ के ‘हसदेव अरण्य का भविष्य’

हसदेव वन में एक वो भी वक्त था, जब यहां कोई गैर वन संबंधी गतिविधि नहीं हो सकती थी। खनन से यहां की संवेदनशील जलवायु प्रभावित होगी। चित्र : मयंक अग्रवाल।

  • मयंक अग्रवाल।

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य की गिनती प्राचीन जंगलों में होती है। एक अध्ययन के सामने आने के बाद यह जंगल फिर से चर्चा में है। इस अध्ययन में यहां खनन की सिफारिश की गई है। साथ ही, यह भी स्वीकार किया गया है कि यह सघन जैव-विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र का क्षेत्र है।

सरकारी संस्था के द्वारा किये गए इस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि खनन के लिए मूलभूत ढ़ांचा बनाने और खनन से प्राकृतिक आवास पर नकारात्मक असर पड़ेगा और इस नुकसान की भारपाई एक बड़ी चुनौती होगी। कानूनी जानकार और सामाजिक कार्यकर्ता पिछले कई वर्षों से इस इलाके के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि हसदेव के किसी एक हिस्से पर भी खनन शुरू हुआ तो धीरे-धीरे पूरा जंगल खनन के लिए खुल जाएगा।

छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य के जंगल काफी प्रचीन है। जैव-विविधता और पारिस्थितिकी से संपन्न। कोयला खनन को लेकर पिछले एक दशक से यह जंगल बहस के केंद्र में रहा है। भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) के एक अध्ययन के सामने आने के बाद जंगल में खनन को लेकर चर्चा फिर गरम हुई है। इस संस्था की रिपोर्ट खनन के पक्ष में दिखती है, बशर्ते इस दौरान संरक्षण का भी ख्याल रखा जाए। हालांकि, संस्था के इस अध्ययन पर कानूनी जानकार और हसदेव जंगल से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अपनी कड़ी प्रतिक्रिया जता रहे हैं।

एक वक्त ऐसा था जब हसदेव जंगल को खनन से अछूता रखा गया था और यहां खनन सहित किसी भी विकास की परियोजनाओं पर प्रतिबंध था। लेकिन, इलाके में मौजूद खनिज की वजह से देश के शीर्ष उद्योगपतियों की नजर यहां जमी रही है।

आईसीएफआरई अध्ययन के मुताबिक हसदेव अरण्य का कोयला क्षेत्र 1,879.6 वर्ग किलोमीटर (रायपुर से आठ गुना अधिक क्षेत्रफल) में फैला है। इसमें 23 कोल ब्लॉक शामिल हैं। अप्रैल 2010 में छत्तीसगढ़ सरकार ने परसा इस्ट और कांता बसन (पीईकेबी) में 1,898.328 हेक्टेयर जंगल की जमीन के उपयोग की सिफारिश की। अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ की तत्कालीन सरकार ने परसा इस्ट एंड कांता बसन (पीईकेबी) को राजस्थान राज्य विद्युत उत्पाद निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को सौंप दिया।

जून 2011 में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन की फॉरेस्ट पैनल ने इस इलाके को पारिस्थितिकी तौर पर महत्वपूर्ण मानते हुए इसमें खनन की सिफारिश के खिलाफ अपना मत दिया। इस दौरान काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या को देखते हुए पैनल ने संरक्षण के लिहाज से यह फैसला लिया। उस वक्त के मंत्री जयराम रमेश ने इस निर्णय को नजरअंदाज करते हुए राज्य सरकार के खनन की सिफारिश को माना और जो इलाके अपेक्षाकृत कम घने और कम जैवविविधता वाले हैं वहां खनन की अनुमति दे दी।

इस निर्णय को 2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चुनौती दी गई और आदेश के बाद आरआरवीयूएनएल द्वारा किए जा रहे खनन को स्थगित किया गया। साथ ही वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और आईसीएफआरई जैसी संस्थाओं के विशेषज्ञों द्वारा यहां अध्ययन की बात भी कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश के उस हिस्से पर रोक लगा दी जिसमें आरआरवीयूएनएल द्वारा किए जा रहे कामों को रोका गया था।

एनजीटी के 2014 के आदेश के तहत आईसीएफआरई का अध्ययन होना था लेकिन 2019 तक यह काम शुरू नहीं हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस अध्ययन के बारे में पूछा था। मई 2019 में संस्था ने जमीन पर काम शुरू किया जो कि फरवरी 2021 में संपन्न हुआ। इस अप्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि खनन संबंधी काम से जंगल पर नकारात्मक प्रभाव होंगे।

अध्ययन में जोर देकर कहा गया है कि जंगल में बीच-बीच में हरियाली खत्म होगी जिससे जानवरों के आने जाने का गलियारा प्रभावित होगा। खनन से यहां का संवेदनशील जलवायु प्रभावित होगा। नतीजतन घुसपैठिए प्रजाति के वनस्पति जंगल में प्रवेश करेंगे। अध्ययन ने चेताया है कि खनन की वजह से जो मूलभूत ढ़ांचे का विकास होगा इसका असर भी प्राकृतिक आवास पर पड़ेगा और स्थिति को ठीक करने में काफी मुश्किलें आएंगी। अध्ययन में बताया गया है कि, ‘खनन का सीधा असर हाथियों के इलाके पर तो नहीं पड़ेगा लेकिन इसकी वजह से इंसान और हाथियों के बीच संघर्ष बढ़ सकता है।’

लेमरू हाथी अभयारण्य के तौर पर हसदेव के एक हिस्से को अधिसूचित करने का निर्णय भी इसी संघर्ष को रोकने की एक पहल थी जो कि लंबे समय से अटका है। अध्ययन कहता है कि खनन संबंधी कार्यों से काफी मात्रा में जंगल की जमीन का उपयोग गैर वन संबंधी काम में होगा जिससे जमीन के भीतर कई बदलाव होंगे और इसका असर पास बहने वाली नदियों पर भी हो सकता है।

अध्ययन  के मुताबिक, ‘कोल ब्लॉक के कोर और बफर जोन से होकर बहने वाले अधिकतर नाले, बड़ी नदियों के प्राथमिक और माध्यमिक सहायक जलस्रोत हैं। इनका बहाव अगर रुका या कम हुआ तो आगे नदी में भी इसका असर दिखेगा।’ साल 2014 में एनजीटी में इस मामले को ले जाने वाले वकील और कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव ने बताया कि आईसीएफआरई के अध्ययन का निचोड़ यह है कि पूरा जंगल ही पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील है।

कोयला खनन की सिफारिश

इस अध्ययन से पता चला है कि इलाके के 90 प्रतिशत परिवार आजीविका के लिए खेती और जंगल से मिलने वाले वनोपज पर निर्भर हैं। यह जंगल स्थानीय लोगों के लिए पानी और दूसरी वातावरण संबंधी जरूरतों को तैयार करने में मददगार है। इससे खेती और दूसरे काम होते हैं। खनन की वजह से इन्हें विस्थापित करना होगा जिससे समुदाय की आजीविका, पहचान और संस्कृति खतरे में आ जाएगी।

अध्ययन में पाया गया है कि 14 खनन परियोजनाओं को चलाने की सिफारिश नहीं की जा सकती। इन इलाकों में साल के वन हैं जो हाथियों का निवास स्थान है। जिन चार ब्लॉक तारा, परसा, पीईकेबी और केंते एक्सटेंशन कुछ ऐसे खनन क्षेत्र हैं जहां या तो खनन शुरू हो गया है या फिर अनुमति मिलने के आखिरी चरण में हैं, वहां जल और जैव-विविधता संरक्षण के कड़े प्रबंध कर खनन किया जा सकता है।

ये कोयला खदान कुल 80.95 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं जो कि हसदेव अरण्य कोल फील्ड का पांच फीसदी हिस्सा है। यहां लगभग 1143.49 मीट्रिक टन का खनिज भंडार है। अध्ययन में जंगल को खनन से होने वाले नुकसान का जिक्र है। बावजूद इसके, इसमें खनन की सिफारिश की गई है। इस बात को लेकर इसकी काफी आलोचना हो रही है।

सुदीप बताते हैं कि यह कमेटी का काम नहीं कि वहां खनन गतिविधियों की सिफारिश करे, सिर्फ इसलिए कि चार ब्लॉक में काम काफी आगे बढ़ गया है। उन्हें पर्यावरण संबंधी नतीजों को जारी कर देना चाहिए, जैसा कि एनजीटी ने उनसे करने को कहा था।

दरअसल, तारा ब्लॉक देश के 602 कोल ब्लॉक में सबसे अधिक सघन वन में स्थित है। सघन वन की संख्या देश में काफी कम है और उन्हें इस तरह की गतिविधियों से दूर रखना चाहिए। वहीं केटे एक्सटेंशन में 98 प्रतिशत सघन वन है। आईसीएफआरई का अध्ययन ही कहता है कि इन चार ब्लॉकों सहित इस क्षेत्र में वन्यजीव प्रबंधन योजना की कमी है। अध्ययन सिर्फ इतना कहा गया है कि संरक्षण को बेहतर करना होगा, जबकि इसे कैसे किया जाए इसका उल्लेख नहीं किया है।

पर्यावरण और समुदाय पर खनन के दुष्प्रभावों पर काम करने वाली संस्था छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला ने भी इस रिपोर्ट की आलोचना की है। वो गंभीरता से कहते हैं, ‘आईसीएफआरई की रिपोर्ट बेतुकी है और इसे दिए गए आदेश से परे है। यह रिपोर्ट खनन कंपनियों के दबाव में तैयार की गई प्रतीत होती है। हसदेव वन को एक बार एक नो-गो क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया था, लेकिन ऐसे क्षेत्रों की रक्षा के लिए नीति की कमी और खनन लॉबी के दबाव के बाद ऐसा नहीं हो सका।’

राजनीति में उलझा हसदेव अरण्य में खनन मामला

बीते वर्षों में हसदेव अरण्य में खनन की अनुमति का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। इस इलाके में स्थानीय लोगों के द्वारा कई विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। विरोध करने वालों में आदिवासी समाज भी शामिल है। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने वादा किया था कि अगर उन्हें जिताया गया तो बिना ग्रामीणों की अनुमति के खनन के लिए जमीन नहीं दी जाएगी। दिसंबर 2018 में कांग्रेस सरकार राज्य में आ गई लेकिन यह विवाद इसके बाद भी बना रहा।

आलोक बताते हैं कि चाहे वह भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस, किसी ने भी इस इलाके को बचाने की नहीं सोची। अगर इस रिपोर्ट की सिफारिश मान ली जाती है तो यह पूरा इलाका खनन के लिए खोल दिया जाएगा। अगर हसदेव में खनन हुआ तो इस नुकसान की भारपाई नहीं हो पाएगी। यह आदिवासी समुदाय की मर्जी के खिलाफ वन्यजीव से भरे इलाके को नुकसान पहुंचाना हुआ।

तो वहीं, सुदीप श्रीवास्तव ने कहते हैं कि इस पूरे मामले पर अंतिम निर्णय छत्तीसगढ़ सरकार का है। अगर राज्य सरकार चाहे तभी हसदेव अरण्य में खनन हो सकता है। किसी परियोजना के लिए मंजूरी मिल जाने का बहाना नहीं चलने वाला।

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