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व्यथा / ग्रामीण भारत में ‘कोरोना का प्रकोप’, इलाज के लिए भटकते मरीज

मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले की तहसील चंदेरी से महज 40 किमी दूर ललितपुर जिले (उप्र) के 13 गांवों की हालत बहुत खराब है। इन गांवों की आबादी 1 से 7 हजार तक की है। इन सभी गांवों में लोग थोक में बीमार पड़ रहे हैं। 500 आदमियों के गांव में 400 आदमी बीमार हो गए हैं।

बड़े गांवों में पहले हफ्ते-दो हफ्ते में एक मौत की खबर आती थी। अब रोज ही वहां शवों की लाइन लगी रहती है। अगर आप लोगों से पूछें कि इतने लोगों को क्या हुआ है? तो वे कहते हैं कि खांसी-बुखार है। पता नहीं यह खांसी-बुखार उनकी जान क्यों ले रहे हैं? उनसे पूछो कि आप लोग जांच क्यों नहीं करवाते? तो वे कहते हैं कि यहां गांव में आकर उनकी कौन डॉक्टर जांच करेगा?

डॉक्टर तो 50-60 किमी दूर कस्बे या शहर में बैठता है। 50-60 किमी दूर मरीज को कैसे ले जाया जाए? साइकिल पर वह जा नहीं सकता। इसीलिए गांव में रहकर ही खांसी-बुखार का इलाज करवा रहे हैं। उनसे पूछा कि इलाज किससे करवा रहे हैं तो उनका जवाब है कि जिलों की ओपीडी तो बंद पड़ी हैं। यहां जो झोला-छाप पैदली डॉक्टर घूमते रहते हैं, उन्हीं की गोलियां अपने मरीजों को हम दे रहे हैं।

वे 10 रु. की पेरासिटामोल 250 रुपए में दे रहे हैं। कुछ गांवों के सरपंच कहते हैं कि हमारे गांव में कोरोना-फोरोना का क्या काम है? लोगों को बस खांसी-बुखार है। यदि वह एक आदमी को होता है तो घर में सबको हो जाता है। जब सर्दी-जुकाम की सस्ती दवा की कालाबाजारी गांवों में इतनी बेशर्मी से हो रही है तो कोरोना की जांच और इलाज के लिए हमारे ग्रामीण भाई हजारों-लाखों रु. कहां से लाएंगे?

ऐसा लगता है कि इस कोरोना-काल में हमारी सरकारों और राजनीतिक दलों को बेहोशी का दौरा पड़ गया है। जनता की लापरवाही इतनी ज्यादा है कि उप्र के पंचायत चुनावों में सैकड़ों चुनावकर्मी कोरोना के शिकार हो गए लेकिन जनता ने कोई सबक नहीं सीखा।

दिल्ली से करीब 70 किमी दूर बुलंदशहर के परवाना गांव में पिछले दो हफ़्ते के भीतर 30 से ज़्यादा लोगों की मौत का दावा किया जा रहा है। ग्रामीणों का दावा है कि मरने वाले हर उम्र के हैं लेकिन बुज़ुर्गों की संख्या ज़्यादा है। स्थानीय लोग कहते हैं कि हैं, ‘एक दिन में सात लोगों की मौत से गांव की गलियां सुनसान हो चली हैं। ग्रामीणों का दावा है कि पंचायत चुनाव में लोग दिल्ली, गाजियाबाद से वोट डालने के लिए गांव आए थे। यही कारण है कि गांव में संक्रमण फैल गया। हालांकि मौत का कारण क्या है, इस बारे में गांव वालों में अपने-अपने मत हैं।

गोरखपुर के ही एक बीजेपी नेता 14 अप्रैल को फेसबुक पर पोस्ट डालते हैं कि ‘हम पूरे परिवार के साथ कोरोना संक्रमण से पॉजिटिव हैं। मेरे संपर्क में जो लोग भी रहे हों, वो कृपया सतर्क हो जाएं।’ 14 अप्रैल के पहले उन्होंने जमकर प्रचार भी किया। जाहिर है, कई और लोग भी संक्रमित हुए होंगे, लेकिन जांच न होने के कारण कुछ भी पता नहीं चला। नेताजी की 20 अप्रैल को मृत्यु हो गई।

उत्तरप्रदेश के बेसिक शिक्षक संघ ने तो चुनाव आयोग और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चुनाव ड्यूटी में लगे 700 से ज्यादा शिक्षकों की कोरोना संक्रमण से मौत के संबंध में पत्र भी लिखा था जिससे हंगामा खड़ा हो गया। यही हाल मध्यप्रदेश का है यहां भी कोरोना ड्यूटी कर रहे 500 से ज्यादा टीचर अब तक मृत्यु हो चुकी है।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक बताते हैं कि राजस्थान के सीकर जिले के खेवरा गांव में सामने आया। गुजरात से 21 अप्रैल को एक संक्रमित शव गांव लाया गया। उसे दफनाने के लिए 100 लोग पहुंचे। उन्होंने कोई सावधानी नहीं बरती। उनमें से 21 लोगों की मौत हो गई। ऐसी हालत उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश के कई अन्य गांवों में भी हो रही है लेकिन उसका ठीक से पता नहीं चल रहा है।

देश के गांवों को सिर्फ सरकारों के भरोसे कोरोना से नहीं बचाया जा सकता। न ही उन्हें भगवान भरोसे छोड़ा जा सकता है। मध्यप्रदेश सरकार ने इस मामले में एक अच्छी पहल की है उन्होंने किल कोरोना अभियान चलाया, जहां ग्रामीणों को घर घर जाकर उन्हें कोरोना महामारी के बारे में बताने का काम आंगनवाड़ी कार्यकर्ता या अन्य शासकीय कर्मचारी कर रहे हैं।

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